दिल्ली विस्फोट में 13 निर्दोष लोगों की जान जा चुकी है। सरकार ने इस विस्फोट पर अपनी खुफिया विफलता स्वीकारने के बजाय हमेशा की तरह ‘दोषी बख्शे नहीं जायेंगे’ का राग छेड़ने का काम किया। 10 नवम्बर को विस्फोट के बाद जहां इसके कार की सीएनजी किट फटने से होने की संभावना जतायी जा रही थी वहीं एक दिन बाद इसे आतंकी घटना करार देते हुए इसके तार जम्मू-कश्मीर से जुड़े मुसलमान डाक्टरों से जोड़ दिये गये। जांच के इतने दिन बाद अभी भी सरकार यह नहीं बता पायी है कि कार में रखा विस्फोटक पदार्थ क्या था।
मोदी काल में अंधराष्ट्रवादी प्रचार व हल्ले का इस कदर असर पैदा कर दिया गया है कि हर बम विस्फोट, उसमें मारे जाते लोग संघ-भाजपा के लिए राजनैतिक लाभ पहुंचाने का जरिया बन चुके हैं। कहां तो इस बम विस्फोट पर सरकार की खुफिया व सुरक्षा विफलता पर सवाल उठाये जाने चाहिए थे कि देश के केन्द्र लाल किले तक विस्फोटक लिए कार कैसे पहुंची? पर ये सवाल उठाने के बजाय मीडिया मुसलमान डाक्टरों के पीछे पड़ आतंक की साजिश की सच्ची-झूठी कहानी सुनाने में जुटा रहा। किसी मीडिया चैनल की हिम्मत इस बात पर प्रश्न पूछने की नहीं हुई कि अगर यह आतंकी घटना थी तो कैसे ये आतंकी लाल किले तक बेरोकटोक पहुंचे? कि क्यों आतंकवाद पर सरकार की जीरो टालरेंस नीति के बावजूद आतंकवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा? क्यों कश्मीर में शांति का प्रचार अब दिल्ली में विस्फोटों के रूप में लोगों की जान ले रहा है?
दरअसल संघी फासीवादी अपनी सोच में ही इस प्रकार ढले होते हैं कि हर सामाजिक समस्या से उपजे असंतोष को वे कानून व्यवस्था की समस्या मानते हैं और कड़े कानून-कड़ी सजा-लाठी-गोली से उसे हल करना चाहते हैं। नक्सलवाद से लेकर कश्मीरी राष्ट्रीयता के प्रश्न की सामाजिक जड़ें ये न तो समझ सकते हैं और न समझना चाहते हैं। इसीलिए नक्सलवाद को भारी सैन्य अभियानों से और कश्मीर समस्या को धारा-370 हटाकर हल करने का यह समस्या के खात्मे का ऐसा ख्वाब पालते हैं और प्रचारित करते हैं जिसका विफल होना तय है। उल्टा ये शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों को भी कुचलकर जनता को चाहे न चाहे आतंकवाद की ओर धकेलने का काम करते हैं। निश्चय ही अपने साथ हो रहे अत्याचार के लिए आतंक की राह अपनाना व निर्दोषों की जान लेने की राह कहीं से भी ठीक नहीं है और इसे खारिज किया जाना चाहिए। पर सरकार पर यह बात प्रश्न चिन्ह छोड़ती ही है कि क्यों पढ़े-लिखे कश्मीरी डाक्टर आतंक की राह अपनाने को बढ़ रहे हैं। यह तथ्य ही कश्मीर मसले पर मोदी सरकार की विफलता को उजागर करने को काफी है।
अब हर आतंकी हमले के बाद की तरह मुसलमान व कश्मीर विरोध का तांडव पूंजीवादी मीडिया रच रहा है। इस तरह संघ-भाजपा की चाहत के मुद्दे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ाने में मीडिया जुटी है। जाहिर है इस सबका लाभ संघ-भाजपा को ही होना है।
पूंजीवादी मीडिया के इस प्रचार के शोर में आम जनता को यह वास्तविकता समझनी होगी कि किसी भी सामाजिक-राजनीतिक समस्या का हल लाठी-गोली से नहीं हो सकता। उसका हल सामाजिक-राजनीतिक ही हो सकता है। कश्मीर समस्या, आतंकवाद से लेकर जाति समस्या, बेरोजगारी आदि को राजनैतिक निर्णयों से ही हल किया जा सकता है न कि लाठी-गोली या कड़े कानून बनाकर। ऐसे में सरकार की लाठी-गोली की भाषा इन समस्याओं को खत्म करने के बजाय बढ़ा ही रही है। इसीलिए कश्मीर में शांति, आतंक के प्रति जीरो टालरेंस के सारे हल्ले के बावजूद आतंकी घटनाओं व उनमें मारे जाने वाले निर्दोष लोगों की संख्या बढ़ रही है। इन मारे जाने वाले निर्दोष लोगों की हत्या में भूमिका से मोदी सरकार खुद को बरी नहीं कर सकती। दिल्ली विस्फोट मोदी सरकार की विफलता का जीता जागता प्रमाण है। मोदी-शाह को इस विफलता का जिम्मेदार ठहराया ही जाना चाहिए।