इंकलाबी मजदूर केन्द्र की बलिया इकाई के जुझारू कार्यकर्ता कामरेड अर्जुन प्रधान का गत 22 मई 2026 को देहान्त हो गया। गाजीपुर-बलिया की सीमा पर स्थित ग्राम कमसड़ी (बखरिय डीह) के निवासी कामरेड अर्जुन प्रधान को 2 मई 2026 को लकवा मार गया था इसी के चलते इलाज की प्रक्रिया में ही उनका देहान्त हो गया।
65 वर्षीय अर्जुन प्रधान का समूचा परिवार कर्मठ व मेहनतकश रहा है। तीन भाईयों में अर्जुन सबसे बड़े भाई थे। उनकी पत्नी का पिछले वर्ष देहान्त हुआ था। इनके दो पुत्र व 4 पुत्रियां हैं। सभी की शादी हो चुकी है।
परिवार के भरण पोषण के लिए 1990 में अर्जुन प्रधान कुछ मजदूरों के साथ लालकुंआ (नैनीताल) आये व वहां नदी से बालू व पत्थर निकासी के काम में लग गये। अपनी मेहनत व ईमानदारी के चलते शीघ्र ही ये मजदूरों के मेठ बन गये और अपनी देख रेख में मजदूरों से काम कराने लगे। यहीं से इन्हें ‘प्रधान’ सम्बोधन से पुकारा जाने लगा।
1995-96 में ये लालकुंआ में सक्रिय ‘विकल्प’ नामक संगठन से जुड़े। इसी के जरिये वे मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी राजनीति से परिचित हुए। कुछ समय तक लालकुंआ में मजदूरों व अन्य मेहनतकशों के संघर्षों में ये सक्रिय रहे। शीघ्र ही ये कार्यकर्ता की भूमिका में उतर मजदूरों को संगठन से जोड़ने में सक्रिय हो गये। संगठन के ही प्रभाव में ये समाज में प्रचलित अंधविश्वासों-धार्मिक कर्मकाण्डों-कुरीतियों के विरोधी बन गये। कालान्तर में खनन के काम में मजदूरों के बढ़ते संकट के चलते साथी अर्जुन व कई अन्य मजदूर अपने गांव वापस जाने को मजबूर हो गये।
अर्जुन प्रधान उत्तराखण्ड से बलिया-गाजीपुर सीमा पर स्थित अपने गांव वापस लौट गये पर उत्तराखण्ड में जिस क्रांतिकारी विचारधारा से वे जुड़ चुके थे, उसके प्रचारक व कार्यकर्ता वे आजीवन बने रहे। गांव लौटने पर अन्य साथियों की मदद से बलिया-गाजीपुर के विभिन्न गांवों में पहले क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन और फिर इंकलाबी मजदूर केन्द्र के बैनर तले संगठन खड़ा कर लिया गया। कमसड़ी गांव में संगठन खड़ा करने में अर्जुन प्रधान विशेष तौर पर सक्रिय रहे।
कुछ वर्ष पूर्व इंकलाबी मजदूर केन्द्र ने जब ग्रामीण मजदूर यूनियन नाम से ग्रामीण मजदूरों की यूनियन खड़ी करने का काम शुरू किया तो कामरेड अर्जुन प्रधान उसमें सक्रिय हो गये। पूर्वांचल के एक पिछड़े गांव में मजदूरों को संगठित करना और संघर्ष में उतारने का काम काफी चुनौतीपूर्ण था। खासकर एक ऐसे वक्त में जब ओमप्रकाश राजभर की पार्टी सुहलदेव पार्टी तेजी से बढ़ रही हो, तब राजभर बहुल गांव में मजदूरों को इंकलाब से जोड़़ने की अपनी चुनौतियां थीं। पर अपने धैर्यपूर्ण प्रयासों से व लगातार सक्रियता से मजदूरों को संगठन से जोड़ने में एक हद तक सफलता पायी गयी। अर्जुन प्रधान इस काम में हमेशा एक स्तम्भ के बतौर संगठन के साथ खड़े रहे।
2015-16 के बाद कामरेड अर्जुन प्रधान का स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ना शुरू हुआ। पहले घुटनों में दिक्कत ने उनका चलना-फिरना काफी कम कर दिया। फिर अस्थमा व अन्य बीमारियों ने उन्हें घेर लिया। बीमारी की इस अवस्था में घर के आगे परचून की दुकान खोलकर अर्जुन प्रधान अंतिम वक्त तक अपना खर्चा जुटाते रहे। बीमारी के दौरान भी वे संगठन के बाहर के कामों में तो अधिक सक्रिय नहीं रह पाये पर गांव स्तर पर लगातार सक्रिय रहे। मजदूरों के ढेरों आपसी झगड़ों आदि में वे हमेशा दृढ़ता से सही का पक्ष लेकर सुलह कराते रहे।
कामरेड अर्जुन प्रधान के व्यक्तित्व के चलते ही उनके घर के कई सदस्य संगठन से सहानुभूति रखने लगे। उनका घर हमेशा संगठन के साथियों के लिए खुला था। बीमारी से जूझते हुए भी उन्हें संगठन के साथियों के खाने-पीने की हमेशा चिंता लगी रहती थी। उनके दरवाजे से गुजरते हुए शायद ही कोई मौका ऐसा गुजरा हो जब उन्होंने साथियों से चाय-खाने को न पूछा हो।
कामरेड अर्जुन प्रधान की मृत्यु के पश्चात उनका शवदाह बगैर किसी धार्मिक कर्मकांड के किया गया। उनकी याद में 8 जून को एक शोकसभा का आयोजन उनके गांव में किया जा रहा है।
कामरेड अर्जुन प्रधान यद्यपि कोई आगे बढ़ चढ़कर नेतृत्व करने वाले मजदूर नेता नहीं थे पर हर संकट-मुसीबत में अविचल चट्टान की तरह संगठन व इंकलाब के साथ खड़े होने वाले और हर कुर्बानी देने को तैयार कार्यकर्ता थे।
बलिया-क्रालोस व इमके के साथी कामरेड अर्जुन प्रधान को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं और क्रांति की राह पर आगे बढ़ने का संकल्प लेते हैं। - बलिया संवाददाता