बसीरत

Published
Mon, 06/01/2026 - 15:50
/basirat

सुलेमान जब पहली बार इस फैक्टरी में आया तब महज 15 साल का था। पिता खरात मशीन कारीगर। स्वभाव से शुष्क और निर्दयी।। अक्सर छोटे-मोटे कामों के लिए कंपनी बुला लेती और काम के एवज में भुगतान कर देती।
    
हुनर की जरूरत मुस्लिमों को विरसे में मिलती है। सुलेमान ने गरीबी देखी थी, जीवन का संघर्ष देखा था। अब्बा से जिस्म में सिर्फ जख्म ही नहीं बल्कि नुकीला और चुभन भरा मरुस्थल की तरह शुष्क रिश्ता भी उसे विरसे में मिला था।
    
कंपनी सुलेमान को अकेले भी छोटे-मोटे काम के लिए बुला लेती। ‘पीस रेट पर काम करेगा?’ छोटे कद वाले एच आर ने पूछा। ‘क्या रुपए पीस मिलेगा?’ सुलेमान की उत्सुकता।
एच आर: 50 पैसे पर पीस, 1000 पीस पर रिवर्क करके देना है।
    
100 रुपए दिहाड़ी करने वाले सुलेमान के लिए यह एक ख्वाब ही है।

सुलेमानः एक-दो महीने बाद भगा तो नहीं दोगे?

एच आरः चेहरे पर कुटिल मुस्कान ‘तुझे हटाने वाला कौन है? जब तक मर्जी काम कर बाकी तो मैं हूं ही।’ सुलेमान मानो ख्वाब में है।
    
‘डस्ट कैप ठेके पर चली गई है’ मजदूरों में चर्चा चल रही है। ‘कितने रुपए पर गई’?। ‘50 पैसे पर पीस में। रोज के 1000 पीस देगा ये तय हुआ है।’ जवाब आया। ‘हमारे तीन आदमी 12 घंटे में 900 पीस देते थे ये लड़का 8 घंटे में देगा मतलब कंपनी सीधे 1000 रुपए से भी ज्यादा बचाएगी।’ कुछ सोचते हुए सांवले रंग के विजय ने बात जारी रखी। ‘कंपनी को इसीलिए ठेकेदारी से फायदा है।’ विजय ने बात पूरी की।
    
समय बीता, साल बीते। दिहाड़ी अब 800 से 1000 हो जाती है और काम के घंटे 12 से 14। पिता की तानाशाही खत्म हुई, अलग कमरा किराए पर लिया गया। ‘जरा हथौड़ी दे’ ये विजय है जिसे सुलेमान अपना दोस्त मानता है। ‘तुम्हारे इन्क्रीमेंट का क्या हुआ तुम लोग गए थे मैनेजर के पास।’ ‘क्या सिर्फ बात करने से हो जाता है इन्क्रीमेंट? हम्मम, हामी। ‘हां तुझे क्या तेरी तो चांदी कट रही है। छेड़ने के अंदाज में विजय ने कहा।
    
‘बता इसमें मेरा क्या दोष। मुझसे तो पीस रेट पर काम करने को कहा तो कर रहा हूं। जानता हूं तुम लोग जलते हो पर यार मैं कोई तुम लोगों के साथ बात करने थोड़े ही जा सकता हूं! मान ले दोस्ती की खातिर आ भी जाऊं तो तुम लोगों का तो जो भी होगा मेरा परिवार तो सड़कों पर आ जाएगा, फिर मेरे लिए कौन बोलेगा?
    
सुलेमान की बातों का मर्म या सच्चाई विजय से छिपी नहीं है। अपने जीवन का कड़वा सच, पिता की निर्दयता भरी मार, शुष्कता सब कुछ विजय के साथ साझा है। ‘दिल पर मत ले मजाक कर रहा हूं। मुस्कुराते हुए विजय ने कहा। ‘तुझसे कहेंगे भी नहीं साथ चलने के लिए।’
    
बचपने के कठोर अनुभव और मेहनत ने सुलेमान के भीतर के मनुष्य को बचाकर रखा है। 30 से 35 हजार मासिक आमदनी ने उसके भीतर घमंड को जन्म नहीं वरन 12 से 15 हजार मजदूरी पाने वालों के प्रति एक दर्द, हमदर्दी को ही पैदा किया था लेकिन इसी आमदनी ने उसे स्वामिभक्ति से भी भर दिया था।
    
‘अरे यार मालिक बहुत बढ़िया आदमी है, मैनेजमेंट कमीना है। तुम लोग सीधा मालिक से बात क्यों नहीं करते।’ आस्था को महज तर्कों से हटा पाना कठिन होता है। ‘तुझे ऐसा लगने के अपने कारण हैं। देर-सबेर तुझे भी एहसास होगा कि मालिक को मुनाफे से ज्यादा कुछ भी प्रिय नहीं होता, खैर छोड़ चाय पीकर आते हैं।’ रोटर स्विच बंद होने की आवाज।
    
प्लांट में नई हाई प्रेशर लाइन लाई गई है। उत्पादन ज्यादा और तेज होने लगा। नई मशीन आते ही दसियों ठेका मजदूरों का काम लील गई। कंपोनेंट में रिवर्क का काम लील गई। इस अधिग्रहण में सुलेमान के हिस्से सिर्फ बेबसी और लाचारी थी।         

आज सुलेमान की ठेकेदारी का आखिरी दिन है। ‘अब तो खुश हो कमीनो!’ विजय की आंखों में दुख की अनुभूति है। आगे क्या सोचा है।’?
    
‘देखते हैं, अभी कुछ सोचा नहीं है। एच आर कह रहा था 12,000 से भर्ती हो रही है, खाली बैठने से तो बेहतर है’। हम्मम, एक आवाज।
    
तू अपने भाई के लिए टेंशन मत ले। बचपन में बाप ने जब फंटी मारी थी तो दो इंच कील जांघ में घुस गई थी, तेरा भाई रोया नहीं खुद चलकर डाॅक्टर के पास गया था। जख्म खाकर खड़ा होना तेरा भाई जानता है।’ 
    
ये कोई खोखले शब्द नहीं थे। विजय इस सच से रूबरू है।
    
बकरीद पर दो दोस्त दस्तरखान पर बैठे हैं। ‘मजदूर नेताओं पर मुकदमे लगे हैं, क्या कुछ कर सकते हैं यहां? विजय का प्रश्न। ‘क्या कुछ पर्चे निकाले हैं?’ 

विजय: हां साथ लेते आया हूं।

सुलेमान: मुकदमों के लिए तो वकील, जमानत पैसे भी लगेंगे!
हम्मम। हामी की आवाज

सुलेमान: क्यों न संडे के दिन बस्ती में पर्चे बांटे जायें और लोगों से फंड लिया जाये।

विजय: हां, यह ठीक रहेगा। बस्ती के लोगों को मजदूरों के संघर्षों से रूबरू होना ही चाहिए।

सुलेमानः मैं अपने कुछ दोस्तों को भी बुला लूंगा। सच कहते हो हमारे संघर्षों से बस्ती वालों को रूबरू होना ही चाहिए।

विजय: लोगों में बसीरत लाने के लिए मेहनत तो करनी ही होगी। 
‘ये बसीरत क्या हुई?’ 

‘ला लैग पीस दे पहले।’ आंख चमकाते हुए विजय ने कहा।             -पथिक

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।