ट्विशा शर्मा दहेज हत्या: जिंदा तलाकशुदा बेटी मृत बेटी से बेहतर है

Published
Mon, 06/01/2026 - 15:50
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भारत में दहेज प्रथा केवल एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि हजारों महिलाओं की जान लेने वाली एक संगठित हिंसा बन चुकी है। हर वर्ष अनेक महिलाएं शादी के बाद मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का शिकार होती हैं। कई मामलों में यह हिंसा आत्महत्या, संदिग्ध मौत या कथित ‘‘दुर्घटना’’ के रूप में सामने आती है। 2026 में सामने आया ट्विशा शर्मा मामला भी इसी कड़ी का एक गंभीर उदाहरण बन गया है।
    
ट्विशा शर्मा, जो नोएडा की रहने वाली थी और माॅडलिंग से जुड़ी थी, की शादी दिसंबर 2025 में भोपाल के एक प्रभावशाली परिवार में हुई थी। शादी के कुछ ही महीनों बाद मई 2026 में ट्विशा की मृत्यु हो जाती है। उसके माता-पिता ट्विशा के पति व सास पर हत्या का आरोप लगाते हैं जबकि ससुराल वाले इसे आत्महत्या कह रहे हैं। माता-पिता का आरोप है कि शादी के बाद ट्विशा को लगातार दहेज के लिए प्रताड़ित किया जा रहा था। उस पर मानसिक दबाव डाला जाता था, घरेलू हिंसा होती थी और आर्थिक मांगें भी की जाती थीं। उन्होंने ने यह भी आरोप लगाया कि उस पर गर्भपात कराने का दबाव था।
    
इस मामले ने इसलिए भी लोगों को झकझोर दिया क्योंकि आरोप एक प्रभावशाली परिवार पर लगे। ट्विशा की सास जो खुद एक पूर्व जिला जज रह चुकी हैं, उनकी इस पूरे केस में जो भूमिका सामने आई उसने सभी को सन्न कर दिया। जिस तरह से वे मीडिया के सामने खुलकर अपनी मृतक बहू पर चरित्र हनन के आरोप लगा रही थीं, घर के कामों को न करने के लिए आलोचना कर रही थीं, उसने समाज के सबसे ऊंचे पदों पर आसीन प्रभावशाली लोगों की महिला विरोधी सोच को भी उजागर किया। सभी के मन में इस प्रश्न को पैदा कर दिया कि इतनी घोर महिला विरोधी महिला जिला जज के पद पर रहते हुए इस तरह के मामलों में क्या ही न्याय किया होगा और कैसा न्याय किया होगा। 
    
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार भारत में हर साल लगभग 6,000 से अधिक दहेज मृत्यु के मामले दर्ज होते हैं। यानी औसतन हर दिन 15-20 महिलाओं की मौत दहेज से जुड़े मामलों में दर्ज होती है। जबकि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है, क्योंकि कई मामलों को आत्महत्या या दुर्घटना बताकर दबा दिया जाता है। परिवार सामाजिक दबाव के कारण शिकायत नहीं करते, और जांच में लापरवाही होती है। छब्त्ठ के 2024 के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में लगभग 2,038 दहेज मृत्यु के मामले दर्ज हुए जो पूरे देश में सबसे अधिक थे। इसके बाद बिहार में लगभग 1,078 मामले दर्ज हुए। इसके बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल का स्थान रहा।
    
ट्विशा शर्मा के केस ने एक और बात को भी बड़ी गंभीरता से समझाया। जब मामला किसी प्रभावशाली परिवार का हो तो मीडिया में भी खूब सुर्खियों में आता है, खूब मीडिया ट्रायल चलते हैं और कहीं न कहीं एक दबाव बन जाता है कि केस की उच्च स्तर की जांच हो और दोषियों को सजा मिले। जांच एजेंसियां सक्रिय दिखाई देती हैं। 
    
ट्विशा शर्मा मामले में भी यही हुआ। पहली पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर सवाल उठे, दूसरी पोस्टमार्टम की मांग हुई और अंततः सुप्रीम कोर्ट तक को हस्तक्षेप करना पड़ा। लेकिन जब किसी साधारण परिवार की महिला न्याय मांगती है, तब अक्सर उसकी आवाज दबा दी जाती है और उसकी फाइल धूल फांकती रहती है। कई मौकों पर जनता जब सड़क पर न्याय के लिए उतर जाती है तब जन सैलाब के दबाव में न्यायपालिका कुछ फैसला लेती है। निर्भया गैंग रेप, अंकिता भंडारी हत्या आदि ऐसे मामलों में जनता के दबाव में सरकार व न्याय तंत्र को कुछ फौरी चीजें करनी पड़ीं। हालांकि कई बार बड़े जनउभारों के बावजूद भी कुछ नए कानून बनाकर मामले को शांत कर दिया जाता है।
    
यह स्थिति हमारे न्याय और जांच तंत्र पर भी प्रश्न खड़े करती है। आखिर क्यों अधिकांश दहेज मृत्यु मामलों में परिवारों को बार-बार निष्पक्ष जांच की मांग करनी पड़ती है? क्यों महिलाओं की मृत्यु को जल्दी से ‘‘आत्महत्या’’ बताकर मामला बंद करने की कोशिश होती है? क्या प्रभावशाली लोगों के मामलों में जांच एजेंसियां दबाव में काम करती हैं? ये प्रश्न केवल एक केस तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे समाज और व्यवस्था से जुड़े हुए हैं।
    
भारत में दहेज निषेध कानून और महिलाओं की सुरक्षा के लिए अनेक कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। इसके बावजूद दहेज हत्याएं रुक नहीं रही हैं। इसका कारण केवल कानून की कमजोरी नहीं, बल्कि समाज की वह मानसिकता भी है जो विवाह को आर्थिक लेन-देन का सौदा बना देती है।
    
दहेज प्रथा पितृसत्तात्मक सोच से जुड़ी हुई है साथ ही पूंजीवादी बाजार इसे प्रोत्साहित करता है। इसके तहत लड़की को ‘‘बोझ’’ और विवाह को ‘‘लेन-देन’’ माना जाता है। यही सोच महिलाओं पर नियंत्रण, हिंसा और उत्पीड़न को जन्म देती है। शादी के बाद बहू से पैसा, गाड़ी, संपत्ति या अन्य मांगें करना आज भी कई परिवारों में सामान्य माना जाता है। जब मांगें पूरी नहीं होतीं, तब मानसिक और शारीरिक हिंसा शुरू हो जाती है। कई महिलाएं सामाजिक बदनामी, परिवार टूटने के डर या आर्थिक निर्भरता के कारण आवाज नहीं उठा पातीं।
    
आज भी बेटियों को ऐसी शादियों को निभाने का उपदेश देते रहते हैं जिनका अंतिम परिमाण उनकी मृत्यु तक जाता है। क्यों आज भी भारतीय समाज में तलाकशुदा कहलाना बड़ा खराब माना जाता है। यह उस समाज का आईना है जहां आधुनिकता और शिक्षा के दावों के बावजूद महिलाओं की सुरक्षा आज भी सुनिश्चित नहीं है। यह मामला दिखाता है कि महिलाओं की स्वतंत्रता, सम्मान और जीवन पर सबसे बड़ा खतरा अक्सर घर के भीतर से आता है।
    
एक पक्ष और भी समझने की जरूरत है कि जब भी इस तरह की महिला हिंसा यहां तक कि  दहेज हत्या के मामले भी आते हैं तो बड़ी आसानी से महिलाओं का चरित्र हनन करने की कोशिश की जाती है। उनको चरित्रहीन करार दे दिया जाता है। यह सदियों से चली आ रही महिलाओं की गुलामी का एक खास पक्ष है जो महिलाओं के मामले में उनको पवित्रतावाद के दायरे में बांधने की कोशिश करता है। भारतीय समाज में जहां महिलाएं आज तिहरी दासता की शिकार हैं उसमें मध्ययुगीन मूल्य-मान्यता का अच्छा-खासा नमूना इन घटनाओं से देखा और समझा जा सकता है। जिंदा तलाकशुदा बेटी मृत बेटी से बेहतर है, की टिप्पणी अगर आज भी करनी पड़ रही है, तो यह समाज में परिवारों के अंदर मौजूद उन खोखले मानकों को भी सामने रख देता है जहां महिलाओं पर यह दबाव होता है कि वह कैसे भी अपनी शादी को बचाए।
    
दहेज प्रथा के खिलाफ केवल कानून नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक आंदोलन की जरूरत है। परिवारों, शिक्षण संस्थानों, महिला संगठनों और समाज को मिलकर ऐसी मानसिकता के खिलाफ खड़ा होना होगा। जब तक विवाह को समानता और सम्मान के रिश्ते के बजाय आर्थिक सौदे की तरह देखा जाता रहेगा, तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी। जब ट्विशा शर्मा के मामले में बात हो रही थी उस दौरान भी देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग महिलाएं दहेज हत्या का शिकार हो रही थीं या हो रही हैं।
    ट्विशा शर्मा मामले का अंतिम फैसला अदालत करेगी, लेकिन इस घटना ने समाज के सामने एक बड़ा प्रश्न जरूर खड़ा कर दिया है कि आखिर कब तक महिलाओं की मौत को ‘‘परिवार का निजी मामला’’ कहकर टाल दिया जाएगा?

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