हरिद्वार/ हरिद्वार में मजदूरों के स्वतः स्फूर्त संघर्षों की बढ़ती के बीच जिला प्रशासन व पुलिस इन आंदोलनों को कुचलने पर उतारू है। इसी उद्देश्य से वह इन संघर्षों में मजदूरों का सहयोग-समर्थन कर रहे मजदूर नेताओं पर हमलावर हैं। उसने पहले मजदूरों व मजदूर नेताओं पर कई फर्जी मुकदमे थोपे और फिर इन मुकदमों के सहारे इंकलाबी मजदूर केन्द्र के दो नेताओं पंकज बवाडी व जय प्रकाश को गुंडा एक्ट के तहत जिला बदर करने की कार्यवाही शुरू कर दी। इससे पूर्व एक अन्य मजदूर नेता ललित इंजीनियर को प्रशासन पहले ही जिला बदर कर चुका है। प्रशासन की ये कार्यवाहियां मजदूरों के संघर्षों को थामने के लिए पूंजीपतियों के इशारों पर की जा रही है। ये कार्यवाही दिखाती हैं कि कानून-पुलिस आदि पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजीपतियों की चाकरी ही करते हैं। निष्पक्षता व न्याय का ढोल तो महज दिखावा होता है।
मजदूर नेताओं पर इस दमनात्मक कार्यवाही के विरोध में संयुक्त संघर्षशील ट्रेड यूनियन मोर्चा के बैनर तले एक प्रेस कान्फ्रेंस प्रेस क्लब हरिद्वार में आयोजित की गई। इस प्रेस कांफ्रेंस में सभी संगठनों/यूनियनों ने एक स्वर में प्रशासन की इस दमनात्मक कार्यवाही की निन्दा की। प्रेस कांफ्रेंस में बताया गया कि गुंडा एक्ट के तहत कार्यवाही का नोटिस 13 मई को जारी किया गया था, किंतु संबंधित व्यक्तियों को इसकी सूचना 20 मई को फोन के माध्यम से दी गई। नोटिस में महज दो दिन के भीतर 22 मई को एडीएम के समक्ष उपस्थित होने का आदेश दिया गया। इतना कम समय देना अपने आप में एक द्वेषपूर्ण और असंवैधानिक कार्रवाई है। सामान्यतः किसी भी नोटिस के उपरांत कम से कम 15 दिन का समय दिया जाता है, लेकिन यहां प्रशासन ने जानबूझकर ऐसा नहीं किया। इससे स्पष्ट है कि शासन-प्रशासन ने पहले से दर्ज फर्जी मुकदमों को ही आधार बनाकर गुंडा एक्ट लगाने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
यह नोटिस उन्हीं फर्जी मुकदमों पर टिका है, जो कंपनी प्रबंधन द्वारा एक व्यापक श्रमिक आंदोलन के दौरान द्वेषपूर्ण मानसिकता से और सुनियोजित साजिश के तहत मजदूर आंदोलन के दमन के लिए दर्ज कराए गए थे।
प्रेस वार्ता में कहा गया कि गुंडा एक्ट जैसी कार्रवाई ने सरकार और शासन-प्रशासन की पोल खोल कर रख दी है। यह वही प्रशासन है जो वास्तविक समाज-विरोधी तत्वों- जो समाज में आतंक, महिलाओं के विरुद्ध घृणित अपराध, डकैती और धर्म के नाम पर अराजकता फैलाते हैं- के खिलाफ कार्रवाई करने में अक्षम है। लेकिन जो लोग जनता को जागरूक करते हैं, उनके दुःख-दर्द में खड़े होते हैं और शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष में कंधे से कंधा मिलाते हैं, उन पर संगीन फर्जी मुकदमे दर्ज कर गुंडा एक्ट के तहत कार्रवाई की जाती है।
वर्तमान में कई कंपनियों के श्रमिक न्यूनतम वेतन, ओवरटाइम का दोगुना भुगतान तथा अन्य जायज मांगों को लेकर स्वतः स्फूर्त ढंग से अपनी कंपनियों से बाहर निकल कर आंदोलन कर रहे थे जो अब भी जारी है। यह बात कंपनी मालिकों और शासन-प्रशासन को बर्दाश्त नहीं हुई। आंदोलन का बर्बर दमन किया गया, फर्जी मुकदमे लगाए गए और इंकलाबी मजदूर केंद्र के कार्यकर्ताओं पर भी झूठे आरोपों में प्राथमिकी दर्ज की गई। अब इन्हीं कार्यकर्ताओं को गुंडा एक्ट के तहत जिला बदर करने की साजिश रची जा रही है। इतना ही नहीं, सरकारी पुलिस-प्रशासन के लोग निगरानी तंत्र के जरिए कार्यकर्ताओं की लोकेशन और फोन को ट्रैप कर उनका मानसिक उत्पीड़न कर रहे हैं और उन पर मजदूरों के बीच न जाने का लगातार दबाव बना रहे हैं।
सरकार की सोच साफ है कि दमन से आंदोलन को खत्म किया जा सकता है, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है। समाज की गति को दमन से नहीं रोका जा सकता।
शासन-प्रशासन यह आरोप लगा रहा है कि इंकलाबी मजदूर केंद्र के कार्यकर्ता मजदूरों को भड़काने का काम कर रहे हैं, मगर मूर्खता और अहंकार में डूबी भाजपा सरकार यह मामूली सच नहीं समझ पा रही कि मजदूरों को कोई व्यक्ति या संगठन नहीं, बल्कि उनकी अपनी भूख और तंगहाल आर्थिक स्थिति भड़का रही है।
सच तो यह है कि यह आंदोलन न तो किसी संगठन ने पैदा किया है और न ही यह किसी संगठन के दम पर खड़ा है। भयानक शोषण, उत्पीड़न और बढ़ती महंगाई की आग से यह आंदोलन स्वतः गति में, स्वतः स्फूर्त रूप से खड़ा हुआ है। भविष्य में यह और भी प्रचंड विस्फोट के रूप में फूटेगा, यह निश्चित है। यदि इंसान भूखा रहेगा तो धरती पर तूफान तो आएगा ही। मजदूरों की नारकीय एवं बदहाल स्थिति अनिवार्य रूप से उन्हें बगावत की ओर धकेलेगी। इतनी सी बात संघी सरकार की समझ में नहीं आ रही और वह मानती है कि लाठी, गोली, फर्जी मुकदमों और जिला बदर करने से आंदोलन को खत्म किया जा सकता है।
प्रेस कांफ्रेंस के जरिए शासन-प्रशासन और मालिक/प्रबंधन के गठजोड़ द्वारा गुंडा एक्ट लगाने की साजिश की तीखी निंदा और भत्र्सना की गई। इसे फर्जी कार्यवाही और साजिश की कार्यवाही बताया गया। यह भी कहा गया कि इंकलाबी मजदूर केंद्र समाज के तमाम जनपक्षधर ताकतों, ट्रेड यूनियनों को साथ लेकर गुंडा एक्ट की इस गैर संवैधानिक, गैर जनवादी कार्यवाही के खिलाफ जनता को साथ लेकर राजनीतिक और कानूनी दोनों तरीकों से संघर्ष को आगे बढ़ाएगा।
प्रेस कांफ्रेंस में इंकलाबी मजदूर केंद्र, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, संयुक्त संघर्षशील ट्रेड यूनियन मोर्चा हरिद्वार के घटक संगठन भेल मजदूर ट्रेड यूनियन, फूड्स श्रमिक यूनियन (आईटीसी), देवभूमि श्रमिक संगठन, एवरेडी मजदूर यूनियन सीमेंस वर्कर्स यूनियन (सी एंड एस) आदि संगठनों ने भागीदारी की।
हरिद्वार में मजदूरों के नेताओं के दमन के विरोध में उत्तराखण्ड व देश के अन्य हिस्सों में विभिन्न संगठनों ने आवाज उठाई है। देहरादून में नशा विरोधी अभियान के सेमिनार व दिल्ली में मासा के कन्वेंशन में इस दमन के विरोध में प्रस्ताव पारित हुए। उत्तराखण्ड के विभिन्न शहरों में मजदूर संगठनों ने इस दमन के विरोध में प्रदर्शन किये हैं। प्रदर्शनों का यह क्रम जारी है। -हरिद्वार संवाददाता