मोदी जी महान हैं ‘‘बल’’

/modi-ji-mahan-hain-bal

स.रा.अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प आये दिन कहते रहते हैं कि ‘‘मोदी महान हैं’’। 
    
ट्रम्प के बार-बार मोदी को महान करने के बावजूद भाजपा या संघ के लोग इस बात पर जश्न नहीं मनाते हैं। कोई इस बात पर बयान नहीं देता है कि ‘देखो! अमेरिका के राष्ट्रपति ने मोदी को महान कहा है’। अंधभक्त जिन्हें भयंकर जाहिल समझा जाता है, वे भी इतने समझदार हैं कि ट्रम्प की बात का इस्तेमाल न तो सोशल मीडिया में, न टी वी बहस में और न सार्वजनिक गप-शप में करते हैं। 
    
इसका क्या कारण हो सकता है? या तो सब लोग मानते हैं कि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प नम्बर एक के झूठे हैं। यानी मोदी जी कोई महान-बहान नहीं हैं। या फिर हो सकता है संघी-भाजपाई-अंधभक्त वगैरह मानते हों कि मोदी जी तो असल में महान हैं पर वे ये बातें इस ...ट्रम्प के मुंह से न सुनना चाहते हों। जो भी हो ट्रम्प के बार-बार मोदी को महान कहने के बावजूद भारत में कोई प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिलती है। 
    
वैसे मोदी जी अपने बारे में क्या सोचते हैं वह सबको पता है। वे तो स्वयं को भगवान का अवतार, अजैविक (नान बायलोजिकल) वगैरह-वगैरह तो मानते ही नहीं बल्कि उसका खुला प्रचार भी करते हैं। साफ है कि मोदी जी अपने आपको महान मानते ही है। हो सकता है मोदी जी की मन की बात को ट्रम्प ने बखूबी समझ लिया हो। वैसे भी दोनों एक-दूसरे के ‘परम मित्र’ जो ठहरे। या ये भी हो सकता है ट्रम्प ऐसा मजाक कर रहे हों जिसको मोदी जी या अन्य समझ ही न पा रहे हों। खैर! सच्चाई पता नहीं क्या हो।
    
अगर ट्रम्प मजाक नहीं कर रहे हैं तो इस दुनिया में कम से कम दो लोग हैं जो मोदी जी को महान मानते हैं। पहले स्वयं मोदी जी और दूसरे उनके परम मित्र ट्रम्प जी। हो सकता है कि कल को सिर्फ ये ट्रम्प कहें कि ‘मैं तो ऐसा कह रहा था ‘बल’। (स्पष्टीकरणः लेख के शीर्षक में इस्तेमाल शब्द ‘बल’ हिन्दी शब्द बल फोर्स नहीं है। यह ठेठ उत्तराखण्डी कुमाऊनी व गढ़वाली दोनों में ही पर खासकर गढ़वाली में इस्तेमाल होता है) शब्द है। इसका अर्थ होता है कि ‘ऐसा कहा जा रहा है’ या फिर ‘कही सुनी बात’ जैसा कुछ होता है। कभी-कभी अपनी बात पर जोर देने के लिए भी ‘बल’ का प्रयोग होता है। कभी-कभी यह सिर्फ व्यंग्यात्मक ही होता है। ‘बल’ का जहां प्रयोग होता वहां इस शब्द का प्रयोग करने वाला अपनी तरफ से कोई जिम्मेदारी नहीं लेता है लेकिन बात को या बतकही को आगे पूरे जोर-शोर से बढ़ाता है। गप्प या फसक मारने का यह लोक प्रचलित तरीका है। 

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?