यह समय : राक्षसी बूढ़ों का समय
बूढ़े लोग पूरे घाघपने, धूर्तता के साथ दुनिया पर शासन कर रहे हैं। डोनाल्ड ट्रम्प (79), शी जिनपिंग (73), पुतिन (73), लूला (80), मोदी (75) जैसे बूढ़े दुनिया के अधिकांश देशों म
बूढ़े लोग पूरे घाघपने, धूर्तता के साथ दुनिया पर शासन कर रहे हैं। डोनाल्ड ट्रम्प (79), शी जिनपिंग (73), पुतिन (73), लूला (80), मोदी (75) जैसे बूढ़े दुनिया के अधिकांश देशों म
बदमाश ट्रम्प व धूर्त नेतन्याहू का न केवल जनता के बीच बल्कि स्वयं शासक वर्ग की कतारों के बीच भी विरोध तेजी से बढ़ा है। इस कारण इन दोनों के तेवर पहले दिनों के मुकाबले बाद में ढीले पड़ने शुरू हुए हैं। दोनों ही देशों में ट्रम्प व नेतन्याहू को आगामी महीनों में चुनाव का सामना करना है। युद्ध का लम्बा खिंचना इन दोनों ही धूर्तों के राजनैतिक भविष्य पर संकट खड़ा करने लगेगा। और ठीक यही ईरान चाहता है।
आठ मार्च का दिन मजदूर-मेहनतकश महिलाओं का ऐसा दिन है जब वे तसल्ली से इस बात पर विचार करती हैं कि सही क्या और गलत क्या है। मुक्ति क्या और गुलामी क्या है। उनका अतीत क्या व भविष्य क्या है। कौन उनका साथी है और कौन उनकी मुक्ति की राह में रोड़ा है।
हकीकत में क्या हुआ है? भारत के स्वयंभू राष्ट्रवादियों ने अमेरिकी साम्राज्यवादियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। और एक तरीके से अपने इतिहास को फिर से दुहरा दिया है। आजादी की लड़ाई के समय ये ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के ‘आज्ञाकारी सेवक’ थे और आज ये अमेरिकी साम्राज्यवादियों के आज्ञाकारी अनुचर बने हुए हैं।
इन मुक्त व्यापार समझौतों को मोदी सरकार अपनी बहुत बड़ी सफलता व उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर रही है। सब्जबाग दिखाये जा रहे हैं। और एक से बढ़कर एक काल्पनिक आंकड़े पेश किये जा रहे हैं।
वेनेजुएला की स्वतंत्रता व सम्प्रभुता पर अमरीकी साम्राज्यवादी आक्रमण की हर ओर से निंदा हुयी है। कुछ ही ऐसे शासक हैं जो मोदी की तरह मौन या तटस्थ हैं। और बहुत-बहुत थोड़े से हैं जो इजरायल के नेतन्याहू की तरह हैं जो निर्लज्जतापूर्वक ट्रम्प के साथ खड़े हैं। क्यांकि वे भी ट्रम्प की ही तरह नमूने हैं। खास बात यह है कि ट्रम्प का सबसे ज्यादा विरोध स्वयं स.रा.अमरीका में हुआ है। बड़े-बड़े विशाल जुलूस निकले हैं जिनमें वेनेजुएला पर अमरीकी हमले की निंदा की गयी है।
पूरी दुनिया के पैमाने पर नये साल का जश्न बहुत पुरानी बात न होकर महज बीसवीं सदी की बात है। शहरों के मुख्य चौराहों-बाजारों या ऐसे ही सार्वजनिक स्थलों पर उन्मादी भीड़ का जश्न तो बहुत ही हालिया घटना है। ‘पापुलर मास कल्चर’ (लोकप्रिय जन संस्कृति) बनवाने में पूंजीपतियों खासकर होटल-पर्यटन-मनोरंजन आदि से जुड़े कारोबारियों की अपनी खास भूमिका है। और इस जश्न में जिनकी पौ-बारह होती है वे पूंजीपति ही हैं। मध्यम वर्ग जश्न के उन्माद के बीतने के बाद हिसाब-किताब लगाता है। मजदूर वर्ग अपने थके हुए जिस्म व सतायी हुयी आत्मा को जश्न के उन्माद से राहत पहुंचाने की कोशिश करता है।
इस वर्ष हमारे देश में जो-जो कुछ घटा (भारत-पाकिस्तान युद्ध, कथित आतंकवादी घटनाएं, पंजाब व अन्य राज्यों में बाढ़ से तबाही, गिरता रुपया, बढ़ती जाती बेरोजगारी व महंगाई आदि) उसक
हमारे देश में एक दिन भी ऐसा नहीं बीतता है जब दलितों के खिलाफ कुछ हिंसा नहीं होती हो। शायद ही कोई ऐसा दिन बीतता होगा, जिस दिन, किसी दलित की हत्या न होती हो। किसी दलित महिल
एक नई दुनिया का ख्वाब देखने वालों के प्रति वर्तमान व्यवस्था का रुख क्रूरता व हिंसा से भरा हुआ है। और अगर इसके लिए उन्हें फासीवाद की शरण लेनी पड़े तो उन्हें उससे भी गुरेज नहीं है। कोई नई दुनिया का ख्वाब न देखे इसके लिए वे तीखा विचारधारात्मक संघर्ष भी छेड़ते हैं। कभी कहते हैं कि ‘इतिहास का अंत हो गया है’ (मानो इनके कहने से मानवजाति नये इतिहास का निर्माण करना छोड़ देगी), तो कभी कहते हैं इस पूंजीवादी व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है (दियर इज नो अल्टरनेटिव-टीना)। ये बातें सरासर झूठ हैं। न तो इतिहास का अंत किया जा सकता है और न ही यह बात सच है कि पूंजीवाद का विकल्प नहीं है। पूंजीवाद का विकल्प वैज्ञानिक समाजवाद है।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।
तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है।
वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?