नया साल

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यह बहुत अच्छी बात है कि नये साल के मौके पर अच्छी-अच्छी बातें कही जायें। नयी उम्मीद, नयी आशा, नयी उमंग की बातें की जायें। उन बातों को एकदम न किया जाये जो हर वक्त हमें घेरे रहती हैं। पीड़ा, दुःख, परेशानियां या वे समस्याएं, जो हर वक्त हमें घेरे रहती हैं, उनका बिल्कुल भी जिक्र नये साल के मौके पर नहीं होना चाहिए। जश्न के मौके पर दुःख का राग नहीं छेड़ा जाना चाहिए। अच्छी-अच्छी बातें, उत्साह, उमंग, नये संकल्प, नये इरादे, नयी योजनाएं, ये सब नये साल के जश्न में अच्छा लगता है। भले ही यह सब कुछ औपचारिक है, झूठ से सना हुआ है पर दिल को अच्छा तो यह ही सब कुछ लगता है। भद्र, शिष्ट व नम्र व्यक्ति की निशानी है कि वह नये साल की बधाई देता है। 
    
नये साल का जश्न पूरी दुनिया में मनाया जाता है और इस जश्न में अरबों-खरबों रुपये फूंक दिये जाते हैं। जाहिर सी बात है जिसकी जैसी औकात या हैसियत उसके हिसाब से उसका जश्न होता है। नया साल हर किसी के जीवन में वैसे ही आता है, जैसा पिछला साल, उनके जीवन में आया था। जिनके जीवन में पिछला साल ऐय्याशियों के साथ उतरा था तो उनका नया साल भी ऐय्याशियों के साथ शुरू होता और पूरा साल उसी में बीतता है। ये लोग कौन हैं, जिनका जीवन ऐय्याशियों में गुजरता है। इसका जवाब हर किसी को पता है पर ज्यादातर लोग ऐसे हैं जो इन ऐय्याशियों की पूजा करते हैं। और इस जुगत में रहते हैं कि कैसे वे भी ऐसा ही जीवन जी सकें। और ऐसा जीवन क्या मेहनत करके; मजदूरी करके; छोटी-मोटी किसानी करके या फिर नौकरी कर के मिल सकता है। हर कोई जानता है कि नहीं। कदापि नहीं! ऐसा जीवन तो दूसरों के शोषण से, लूट से, ठग-बटमारी से, भ्रष्टाचार से ही मिल सकता है। तो फिर नये साल का जश्न दो तरह का हो जाता है। एक शोषकों का, ठग-बटमारों, लुटेरों, भ्रष्टाचारियों का और दूसरा शोषित-उत्पीड़ित, मजदूरों-मेहनतकश किसानों, बेरोजगार नौजवानों आदि आदि का। 
    
पहले को जश्न के बाद आराम का दिन मिलता है। रात की खुमारी उतारने के लिए तसल्ली देती सुबह व दिन मिलता है। दूसरे को उन्माद की रात बीतने के बाद थकान, अफसोस, बिगड़ा हुआ बजट और एक नया दिन जिसमें फिर से हाड़़-तोड़ मेहनत करनी है। और ऐसे भी बहुतेरे होते हैं जो साल का पहला क्षण मेहनत की चक्की में पीस कर ही बिताते हैं। पीसते-पीसते एक-दूसरे को नये साल की बधाई देते हैं। इनमें से हर कोई जानता है नये साल की बधाई एक रस्म है। भद्र, शिष्ट और विनम्र दिखने का जरिया है। और यह सब झूठ के रंग में रंगा हुआ है। और फिर वे बहुत सारे हैं जिन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि कैसा नया साल। भूख, गरीबी, बेकारी, अभाव का दानव कभी पीछा ही नहीं छोड़ता है। और ऐसे लोगों को पता ही नहीं लगता कि कब नया साल आया और कब पुराना पड़ गया। जिन्दगी दुःख, चिन्ता, परेशानी में यूं ही किसी दिन खत्म हो जाती है। 
    
नये साल का जश्न मनाने के लिए जेब में पैसा होना चाहिए। और जिसकी जेब में जितना पैसा, वैसा उसका जश्न। और जिनकी जेब खाली उनके लिए क्या तो नया साल और क्या तो पुराना साल। 
    
हकीकत में देखा जाये तो नया साल क्या है। तारीख का बदलना। पर मामला इतना सीधा-सादा और सरल नहीं है। नये साल का जश्न महज तारीख के बदलने का जश्न नहीं है। यहां धर्म, कारोबार, उपभोक्तावाद, मनोरंजन, ऐय्याशी आदि चीजों का एक ऐसा मिश्रण तैयार होता है जो पूंजीवादी समाज और उसकी संस्कृति का अभिन्न अंग है। और जिन देशों में पश्चिमी औपनिवेशिक व साम्राज्यवादी ताकतों का राज होता गया वहां नये साल का जश्न लोकप्रिय संस्कृति (पापुलर कल्चर) का भाग जबरन बनाया गया। मसलन नये साल का जश्न भारत जैसे समाजों में बीसवीं सदी में ही ‘पापुलर कल्चर’ का हिस्सा बना। वह भी खासकर बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में ही यह ‘पापुलर कल्चर’ जन उन्माद की अवस्था तक पहुंचता गया। 
    
क्योंकि पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों के शासक ईसाई धर्म को मानते थे तो उन्होंने जहां-जहां अपना कब्जा कायम किया वहां-वहां अपनी मूल्य-मान्यताओं, रिवाजों और संस्कृति को शोषित-उत्पीड़ित जनों पर भी थोपना शुरू कर दिया। वैसे हर धर्म, हर सभ्यता के अपने कलैण्डर थे। और इसी के अनुरूप उनके अपने-अपने नये साल के दिन भी थे। अपनी-अपनी कहानियां व अपने-अपने मिथक, नये साल के दिन के साथ जुड़े थे। वे सब अब भी अपने-अपने नये साल मनाते हैं परन्तु जश्न का उन्माद तो 31 दिसम्बर की रात को ही रहता है। 
    
ईसाई धर्म के अनुसार यह दिन ईसा मसीह (यीशु) के नामकरण व बपतिस्मा से जुड़ा था। मतलब यह दिन इस रूप में एक नयी शुरूवात व पुनर्जन्म से जुड़ गया। कैथोलिक चर्च इसे ‘मेरी, मदर ऑफ गॉड’ के पर्व के रूप में मनाता है। ईसाई धर्म के मानने वालों के लिए इस दिन का धार्मिक, पौराणिक, आध्यात्मिक (आध्यात्मिक नवीनतम या स्प्रिच्युल रिन्यूवल) महत्व है। परन्तु अन्य धर्म या धर्म न मानने वालों के लिए इसका महत्व पुराने साल की विदाई और नये साल के आगमन के जश्न के रूप में ही है। 
    
पूरी दुनिया के पैमाने पर नये साल का जश्न बहुत पुरानी बात न होकर महज बीसवीं सदी की बात है। शहरों के मुख्य चौराहों-बाजारों या ऐसे ही सार्वजनिक स्थलों पर उन्मादी भीड़ का जश्न तो बहुत ही हालिया घटना है। ‘पापुलर मास कल्चर’ (लोकप्रिय जन संस्कृति) बनवाने में पूंजीपतियों खासकर होटल-पर्यटन-मनोरंजन आदि से जुड़े कारोबारियों की अपनी खास भूमिका है। और इस जश्न में जिनकी पौ-बारह होती है वे पूंजीपति ही हैं। मध्यम वर्ग जश्न के उन्माद के बीतने के बाद हिसाब-किताब लगाता है। मजदूर वर्ग अपने थके हुए जिस्म व सतायी हुयी आत्मा को जश्न के उन्माद से राहत पहुंचाने की कोशिश करता है। इधर उन्माद बीतता है और उधर पूंजी का राक्षस उसके शरीर व आत्मा दोनों को चूसने को आकर खड़ा हो जाता है। नये साल का नया दिन पुराने साल के पुराने दिन जैसा ही होता है। 
    
कई लोगों के सामने नये साल के इस उन्मादी जश्न के समय बड़ी मुसीबत होती है। ये लोग वे हैं जो इस पूंजीवादी उन्मादी-उपभोक्तावादी संस्कृति से घृणा करते हैं। इनमें से कई हैं जो ऐसे नये समाज का सपना देखते हैं जहां पूंजीवाद की कोई छाया न हो। नास्तिक-तार्किक तो कह उठते हैं बस यह तारीख का बदलना भर है। पृथ्वी करोड़ों-करोड़ साल से अपनी धुरी पर घूम रही है। और नये साल का मनाना अधिक से अधिक चार हजार साल पुरानी बात है। पर्यावरणवादी अंदाजा लगाते हैं कि नये साल के जश्न में पृथ्वी, उसके पर्यावरण का कितना-कितना नुकसान हुआ। और बेचारे उन जीवों पर क्या बीतती होगी जो मनुष्यों के इस जश्न की रात में शोर-शराबे, आतिशबाजी आदि से परेशान हुए होंगे। उनकी बातें ठीक हैं पर कब से पूंजीपति और पूंजीवाद प्रकृति, पृथ्वी और उसके पर्यावरण की चिंता करने लगा। कई लोग तो इस नये साल के उन्मादी जश्न का जवाब कुछ अन्य तरीके से देना चाहते हैं पर वह सब नक्कार खाने में तूती की आवाज ही साबित होता है। और ऐसा होना लाजिमी भी है। 
    
वर्ग सचेत मजदूर या क्रांतिकारियों का मामला हमेशा से अलग रहा है। वे इस पूंजीवादी, उन्मादी, उपभोक्तावादी, बाजारू संस्कृति के खिलाफ हैं। वे पुराने विचारों, पुरानी संस्कृति, पुराने रीति-रिवाजों, पुरानी आदतों आदि के खिलाफ हैं। नये साल का यह उन्मादी जश्न साम्राज्यवादी-पूंजीवादी विचारों-संस्कृति-रीति-रिवाज का प्रतीक है। यह एक झूठ को अपने ऊपर ओढ़ना है कि सिर्फ नया साल आने से जीवन बदल जायेगा। नया साल नयी आशा-नयी उमंग-नयी खुशियां लेकर आ जायेगा यह निरा कोरा भाग्यवाद व भावुकतावाद है। मजदूरों-मेहनतकशों के जीवन में नया सवेरा तभी आयेगा जब पूंजीवाद का खात्मा होगा और उनका अपना राज आयेगा। जिस दिन इंकलाब होगा उस दिन हमारा नया साल होगा। 

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