रूस-यूक्रेन युद्ध और शांति की राह

/ruusia-ukrain-war-and-peace-ki-raah

अमेरिकी बड़बोले राष्ट्रपति ट्रम्प एक बार फिर शीघ्र ही रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त कराने का दावा कर रहे हैं। हालांकि उनके बीते एक वर्ष में ऐसे अनगिनत दावों की विफलता ने साबित कर दिया है कि उनके दावों को गम्भीरता से नहीं लिया जाना चाहिए। 
    
ट्रम्प ने यह दावा 28 सितम्बर को फ्लोरिडा में यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेन्स्की से वार्ता के बाद किया। ट्रम्प ने पत्रकारों को बताया कि रूस-यूक्रेन शांति समझौता पहले कभी की तुलना में काफी करीब है। ट्रम्प के अनुसार हाल में ही पेश की गयी 20 सूत्रीय शांति योजना पर 90 प्रतिशत सहमति कायम हो चुकी है। इसके साथ ही ट्रम्प ने घोषित किया कि नाटो में शामिल न होने पर नाटो देशों सरीखी अमेरिका द्वारा प्रस्तावित सुरक्षा गारंटी पर दोनों देश पूर्ण सहमत हो गये हैं।      
    
दरअसल अमेरिका ने यूक्रेन की सुरक्षा की अमेरिकी गारंटी तब प्रस्तावित की जब यूक्रेन ने नाटो का सदस्य न बनने के एवज में इसकी मांग की। तब अमेरिका ने नाटो से कुछ कम सुरक्षा गारंटी यूक्रेन को देने की बात कही। दरअसल नाटो गठबंधन के देश इस गारंटी से बंधे हैं कि किसी एक देश पर हमला समूचे नाटो पर हमला माना जायेगा और नाटो उसका प्रत्युत्तर देगा। 
    
मौजूदा शांति प्रस्ताव में जो मुद्दा विवादित है उसके हल होने की राह आसान नहीं दिख रही है। जहां रूस इसकी मांग कर रहा है कि दोनेत्स्क, लुहांस्क, जापोरिजिया व खेरसान के अभी उसके कब्जाये इलाके व क्रीमिया को रूसी क्षेत्र की मान्यता दी जानी चाहिए साथ ही यूक्रेन पूर्वी यूक्रेन के उन हिस्सों से पीछे हट जाये जहां रूसी सेना ने कब्जा नहीं किया है। जबकि यूक्रेन इन सभी क्षेत्रों पर अपना दावा करता रहा है। अब अमेरिकी दबाव में यूक्रेन दोनबास क्षेत्र को मुक्त क्षेत्र बनाने पर सहमत हुआ है। अमेरिका का प्रस्ताव इन विवादित क्षेत्रों को मुक्त आर्थिक क्षेत्र बनाने या अंतर्राष्ट्रीय निगरानी का क्षेत्र बनाने का है। 
    
वैसे ट्रम्प यूरोप के नेताओं को यह भी समझा रहे हैं कि दोनबास क्षेत्र को रूस को सौंप कर और रूस को अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में शामिल कर युद्ध विराम किया जा सकता है। हालांकि यूरोपीय साम्राज्यवादी इस युद्ध का अंत रूस की जीत के रूप में देखने को तैयार नहीं हैं। 
    
इस तरह रूस द्वारा कब्जाये क्षेत्रों की स्थिति पर विवाद सुलटता नजर नहीं आ रहा है। ट्रम्प ने जेलेंस्की से वार्ता से पहले व बाद में पुतिन से लम्बी बातचीत फोन पर की। पर अभी समझौता काफी दूर नजर आ रहा है। 
    
ट्रम्प ने सत्तासीन होने के बाद इस युद्ध का सारा दोष बाइडेन पर डाल इस युद्ध को समाप्त कराना चाहा था। वह रूस से समझौता कर चीन-रूस में दरार डालने व अपना ध्यान चीन पर केन्द्रित करने पर उतारू था। पर यूरोपीय साम्राज्यवादियों के अड़ जाने के चलते ट्रम्प की योजना कारगर नहीं हुई। एक बार फिर ट्रम्प अपनी चालें चल रहे हैं। वे रूस से समझौता कर चीन-वेनेजुएला मुद्दे पर रूसी हस्तक्षेप को कमजोर करना चाहते हैं। देखने की बात होगी कि उनकी यह तिकड़म कितना परवान चढ़ती है। 
    
दरअसल अगर किसी तरह यह शांति समझौता हो भी जाता है तो वह अस्थाई ही साबित होगा। यूक्रेन में उलझे साम्राज्यवादी समीकरणों का यह अवश्यम्भावी परिणाम होगा। दरअसल अमेरिकी साम्राज्यवादी चीन से मिल रही चुनौती के चलते अपना सारा ध्यान चीन व उसके पड़ोस पर केन्द्रित करना चाहते हैं पर यूक्रेन युद्ध में फंसे होने के चलते वह ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। 
    
यूरोपीय साम्राज्यवादी यूरोप में युद्ध का खात्मा रूस की विजय के रूप में स्वीकारने को तैयार नहीं हैं। इसे वे इस क्षेत्र में रूस की बढ़ती दखलंदाजी की छूट मान रहे हैं और इसे स्वीकारने को तैयार नहीं हैं। रूसी साम्राज्यवादी इस युद्ध में अमेरिका की उम्मीदों के उलट विजयी साबित हो रहे हैं। एक ओर नाटो से यूक्रेन को बाहर रखने में वे सफल रहे हैं तो दूसरी ओर यूक्रेन के कुछ इलाके भी वे कब्जा चुके हैं। इन सभी साम्राज्यवादी समीकरणों के चलते युद्ध लम्बा खिंचता चला जा रहा है जिसका खामियाजा यूक्रेनी जनता उठा रही है। 
    
शांति की स्थायी राह साम्राज्यवादियों के पास नहीं है। उनके हित उन्हें शांति कायम करने से रोक रहे हैं। ऐसे में रूसी-यूक्रेनी जनता की साम्राज्यवादी ताकतों-अपने शासकों के खिलाफ एकजुटता व संघर्ष ही इस क्षेत्र में स्थायी शांति की राह खोल सकती है। इसकी भले ही हाल फिलहाल दूर-दूर तक संभावना नजर न आ रही हो पर यही स्थायी शांति का एकमात्र रास्ता है। 

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।