वैश्विक स्तर पर बढ़ती आर्थिक असमानता

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विश्व की सभी प्रमुख राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं के मंच जी-20 ने दक्षिण अफ्रीका की अध्यक्षता के समय वैश्विक स्तर पर अमीरों व गरीबों के बीच बढ़ती आर्थिक असमानता के अध्ययन के लिए एक समिति का गठन किया था। पूंजीवादी अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिवालिट्ज के नेतृत्व वाली इस समिति की रिपोर्ट नवम्बर, 2025 में ‘‘वैश्विक असमानता रिपोर्ट’’ नाम से प्रकाशित हुई। इस समिति की अन्य दो सदस्या विनी ब्यानयिमा (आक्सफेम) और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त वर्तमान में मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय, अमेरिका में प्रोफेसर जयति घोष थीं। यह रिपोर्ट वैश्विक स्तर पर अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ती आर्थिक असमानता की खाई से जुड़े तथ्यों को सामने रखती है। 
    
रिपोर्ट के अनुसार, 2000 से लेकर 2023 तक पैदा हुई वैश्विक सम्पदा के 41 प्रतिशत को दुनिया के सबसे अमीर 1 प्रतिशत लोगों ने हस्तगत किया। दुनिया के 83 प्रतिशत देशों में उच्च आय असमानता का स्तर पाया जाता है। गिनी सूचकांक में यह 0.4 से अधिक है, जो उच्च आर्थिक असमानता को दर्शाता है। गिनी सूचकांक अर्थशास्त्र में आर्थिक असमानता को अंकगणितीय रूप में प्रदर्शित करने की एक पद्धति है, जिसे कोराडो गिनी (इटली) ने विकसित किया था। इस पद्धति में 0 का मतलब हुआ पूर्ण समानता तथा 1 का मतलब हुआ पूर्ण असमानता। उच्च आय असमानता वाले इन 83 प्रतिशत देशों में दुनिया की 90 प्रतिशत आबादी रहती है। अर्थात् दुनिया के 90 प्रतिशत लोग उच्च आर्थिक असमानता वाले सामाजिक परिवेश में गुजर-बसर कर रहे हैं। 
    
वैश्विक स्तर पर क्षेत्रीय आर्थिक असमानता की बात करें तो सबसे धनी क्षेत्रों और सबसे गरीब उप सहारा अफ्रीकी क्षेत्र के लिए गिनी सूचकांक 0.61 है, जो अति उच्च आर्थिक असमानता को प्रदर्शित करता है। 
    
वैश्विक स्तर पर 2000-2024 के बीच पैदा हुई नई सम्पदा में से नीचे के 50 प्रतिशत लोगों के हिस्से में महज 1 प्रतिशत हिस्सा ही आ पाया। 
    
रिपोर्ट भारत की भी आर्थिक असमानता की एक झलक देती है। 2000 से 2023 के बीच में भारत के सबसे अमीर 1 प्रतिशत लोगों की सम्पत्ति में 62 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 
    
वैश्विक खाद्य सुरक्षा के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया के एक चौथाई लोग (लगभग 2.3 अरब) मध्यम या गम्भीर स्तर की खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। 33.5 करोड़ लोग तो ऐसे हैं, जो नियमित अंतराल में आवश्यक भोजन की व्यवस्था तक नहीं कर पाते हैं, यानी जिन्हें प्रतिदिन दो या तीन समय का भोजन उपलब्ध नहीं हो पाता है। 
    
रिपोर्ट इस सच्चाई को स्वीकार करने के लिए मजबूर दिखाई पड़ती है कि आर्थिक उदारीकरण के दौर में वित्तीय विनियमितीकरण (बाजार मूल्यों में भारी उतार-चढ़ाव), श्रम बाजार के अनियंत्रण, कमजोर कर दी गयी ट्रेड यूनियनों तथा सार्वजनिक सेवाओं के निजीकरण ने वैश्विक स्तर पर आर्थिक असमानता को बहुत तेजी से बढ़ाया है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि एक तरफ कारपोरेट घरानों की आय बढ़ रही है तो दूसरी तरफ वास्तविक मजदूरी लगातार गिरती जा रही है। पिछले 25 वर्षों में केवल भारी चिकित्सा खर्चों की वजहों से दुनिया भर में 1.3 अरब लोग गरीबी की ओर ढुलक गये हैं। 
    
रिपोर्ट जो कुछ भी प्रस्तुत करती है, उसे दुनिया भर के गरीब मजदूर-मेहनतकश दैनिक जीवन में महसूस करते ही हैं। फिर भी, पूंजीवादी मंचों व उनकी संस्थाओं की ओर से इस सच्चाई की स्वीकारोक्ति इसके महत्व को बढ़ा देती है। 

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