गद्दारी, षड्यंत्र, झूठ और हिंसा के सौ साल

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इसे तारीखों का विचित्र संयोग या फिर भारतीय इतिहास का कटु सत्य भी कह सकते हैं। इस वर्ष, जिस दिन (2 अक्टूबर) गांधी जयन्ती है, ठीक उसी दिन विजयादशमी है। यह तो हो सकता है कि राष्ट्रीय अवकाश के दिन किसी धर्म का त्यौहार भी पड़ जाए। परन्तु इस बार बात कुछ और है। इस विजयादशमी के दिन हिन्दू फासीवादी संगठन अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे कर लेगा। और ठीक गांधी जयन्ती के दिन वह अपना स्थापना दिवस मना रहा होगा। जब पूरी दुनिया में गांधी जयन्ती के दिन ‘अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ मनाया जा रहा होगा उस दिन हिन्दू फासीवादी संगठन बड़े शान से शस्त्र पूजा कर रहा होगा। गांधी जी का जन्म दिवस और उनकी हत्या करवाने वाले संगठन का स्थापना दिवस, एक ही दिन है। जिस दिन गांधी जी की हत्या हुई थी उस दिन संघ के नेताओं-कार्यकर्ताओं ने मिठाई बांटकर जश्न मनाया था। यह सत्य तब भी नहीं छुप पाता है जब संघ अपनी शाखाओं में प्रातः उनका स्मरण करता है। 
    
गांधी जी की बहुतेरी आलोचनाएं हो सकती हैं। लेकिन यह सच है कि वे 15 अगस्त, 1947 को देश की स्वतंत्रता के मौके पर होने वाले आयोजन में नहीं शामिल हुए। वे इस दिन दिल्ली के बजाय बंगाल के नौआखली में थे। हिन्दू-मुस्लिम दंगों को अपनी जान पर खेलकर रूकवा रहे थे। गांधी जी का साम्प्रदायिक सौहार्द व एकता का पक्षधर होना हिन्दू फासीवादी संगठन को रास नहीं आ रहा था। और अंततः 31 जनवरी, 1948 को संघ की शाखा में पले-बढ़े गोड़से ने उनकी निर्मम हत्या कर दी। संघ पर पहला प्रतिबंध गांधी जी की हत्या में शामिल होने के आरोप के कारण ही लगा। बाद में, संघ ने सरेआम माफी मांगी और यह झूठा दावा किया कि गोडसे उनका सदस्य नहीं था। असल में संघ कभी भी किसी को भी अपना मानने से इंकार कर सकता है क्योंकि उसके यहां कोई औपचारिक सदस्यता नहीं होती है। खालिस फासीवादी संगठन की तरह कार्य करने वाले संघ की यही कार्य पद्धति व कार्यशैली है। उसकी माया के सामने कालनेमि भी बौना साबित हो जायेगा। 
    
आज सावरकर की माला जपने वाले संघियों ने तब सावरकर से सार्वजनिक रूप से दूरी बना ली थी जब उनका नाम गांधी जी की हत्या में शामिल होने वालों की सूची में शामिल हुआ। और बेचारे सावरकर अपने जीते जी उपेक्षित ही रहे। अंत में उन्होंने अन्न जल त्याग कर आत्महत्या कर ली। और उनके गुजर जाने के बाद संघ ने सावरकर को ‘वीर’ की उपाधि देकर पूजना शुरू कर दिया। सावरकर के जीवन का तो तब भी कुछ तो उजला पक्ष था परन्तु संघ का पूरा जीवन तो स्याह रंग से रंगा हुआ है। सावरकर ने कभी अपने जीवन के प्रारम्भिक वर्षों में 1857 के विद्रोह को ‘प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ की संज्ञा देकर एक अच्छी किताब लिखी थी। तब वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे और अंग्रेजों के काले कारनामों की पोल खोल रहे थे। बाद में जब उन्हें काला पानी की सजा हुयी तब उन्होंने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण कर अंग्रेजों के काले कारनामों में उनके सेवक की भूमिका चुन ली। और वे हिन्दू फासीवाद के धूर्त विचारक बन गये। एक से बढ़कर एक हिन्दू फासीवादी सिद्धान्त देने लगे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सारी काली सोच सावरकर के ग्रंथों से ही निकलती है। संघ की ‘‘हिन्दू होने’’ की अवधारणा भी सावरकर की ही दी हुयी है। और इसी तरह ‘‘राजनीति का हिन्दूकरण और हिन्दुओं का सैन्यीकरण’’ का लक्ष्य व उद्देश्य भी संघ ने सावरकर से ही लिया हुआ है। 
    
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सौ साल का इतिहास इनकी काली टोपी की तरह ही काला है। आजादी की लड़़ाई के दिनों में इनका काम सावरकर के ‘द्विराष्ट्र सिद्धान्त’ का प्रचार करना और हिन्दू-मुस्लिम एकता को कायम न होने देना था। इस तरह ये आजादी की लड़ाई में व्यवधान खड़े करते थे। यहां तक रुकते तो भी गनीमत होती। ये मुखबिरी करते और जब-जब देश में अंग्रेजों के खिलाफ जुझारू आंदोलन छिड़ते तब ये उसके खिलाफ अंग्रेजों का साथ देते। संघ और मुस्लिम लीग एक ही सिक्के के दो पहलू थे। न तो गोलवलकर और न ही जिन्ना एक दिन भी जेल गये। दोनों ही अंग्रेजो ंके चहेते थे। और ये दोनों ही ताकतें आपस में समय-समय पर एका भी कर लेतीं ताकि प्रांतीय सरकारें बना सकें। 
    
भारत-पाकिस्तान के विभाजन के समय इनकी भूमिका इस त्रासदी को और अधिक भयावह बनाने वाली थी। संघ का रोल दंगे भड़काने व कत्लेआम में सीधे-सीधे था। हिन्दुओं की रक्षा के नाम पर गरीब, बेसहारा मुस्लिमों पर हमले किये गये। और ठीक ऐसा ही पाकिस्तान में हिन्दुओं के साथ मुस्लिम कट्टरपंथियों व मुस्लिम लीग के लोगों ने किया। भारत के विभाजन की नींव डालने वालों में अंग्रेजों के बाद सर्वप्रथम लोग हिन्दू महासभा व संघ के लोग थे। गांधी जी के हत्यारे संघ में ही शिक्षित-दीक्षित हुए थे। गोडसे के भाई ने जब नाथूराम का महिमामण्डन करते हुए एक किताब लिखी तो उसने संघ की पोलपट्टी अनजाने ही खोल दी थी। उसने लिखा था कि नाथूराम का संघ से हमेशा रिश्ता रहा। 
    
आजाद भारत में इनका इतिहास महात्मा गांधी की हत्या से शुरू होकर बाबरी मस्जिद विध्वंस से लेकर गुजरात नरसंहार तक जाता है। भारत के सैकड़ों शहरों में इन्होंने दंगे प्रायोजित किये। जो ‘‘प्रथा’’ हेडगेवार ने पुणे में मस्जिद के बाहर नगाड़े बजाकर शुरू की थी वह आज तक जारी है। कोई साल ऐसा नहीं गुजरता जब हिन्दू त्यौहार खासकर हनुमान जयंती, होली, कांवड़ यात्रा के दौरान मुस्लिम मोहल्लों, मस्जिदों के सामने जुलूस न निकाले जाते हों। साम्प्रदायिक नारे न लगाये जाते हों और उकसावे की घटनाओं को न जन्म दिया जाता हो। ये जब सत्ता में होते हैं तब उसका उपयोग धार्मिक अल्पसंख्यकों व अन्य समूहों को दबाने के लिए करते हैं। और जब ये सत्ता से बाहर होते हैं तब उसे प्राप्त करने के लिए साम्प्रदायिक घटनाओं व दंगों को प्रायोजित करते हैं। सत्ता के साथ इनके रिश्ते की आजाद भारत में यही कहानी है। आज तो इनकी मंशा एक हिन्दू फासीवादी राष्ट्र कायम करने की है। 
    
संघ व भाजपा के लोग अपने को सबसे बड़े राष्ट्रवादी घोषित करते हैं। परन्तु इतिहास इनके खिलाफ गवाही देता है तो वर्तमान इनकी चुगली करता है। अभी अमेरिकी साम्राज्यवाद के सरगना डोनाल्ड ट्रम्प ने बार-बार हम भारतीयों का अपमान किया परन्तु प्रधानमंत्री मोदी को सांप सूंघ गया। हथकड़ियों में बांध कर अप्रवासी भारतीय अपमानित करके अमेरिका से भारत लाये गये परन्तु इन महान राष्ट्रवादियों के मुंह से एक शब्द विरोध का नहीं फूटा। दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी के देश का इतना अपमान आजाद भारत में कभी नहीं हुआ। अभी तो ट्रम्प मोदी के साथ ऐसे खेल रहे हैं जैसे बिल्ली चूहे से खेलती है। सुबह को पुचकारते हैं तो शाम को धमकाते हैं। और मोदी जी ट्रम्प के पुचकारने पर लहालोट हो जाते हैं। पर धमकाने पर मोदी जी चूं तक नहीं कर पाते हैं। 
    
संघ का सारा राष्ट्रवाद मुसलमानों व पाकिस्तान के खिलाफ लक्षित है। आजादी की लड़ाई के दिनों में ये ब्रिटिश साम्राज्यवाद के बगलगीर थे और आज अमेरिकी साम्राज्यवाद के बगलगीर है। इन्हें तब न तो भारत और भारत की महान जनता की चिंता थी और न आज है। हिन्दू फासीवाद के राष्ट्रवाद का इतिहास व वर्तमान यही है। 
    
संघ का लक्ष्य भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना रहा है। ये अगर अपने सौ साल के इतिहास में कामयाब नहीं हो पाये हैं तो इसमें सबसे बड़ी भूमिका भारत के शोषित-उत्पीड़त जनों की रही है। भारत के मजदूर, मेहनतकश किसानां की ही बहुत बड़ी आबादी न केवल इनके खिलाफ रही बल्कि भारत की उत्पीड़ित जातियां, जनजाति समुदाय व धार्मिक अल्पसंख्यकों का बहुत-बहुत बड़ा हिस्सा भी इनके खिलाफ रहा है। इनके घृणित मंसूबों के और अधिक खिलाफ भारत के शोषित-उत्पीड़ित होते जायें यही हमारे समय की मांग, जरूरत, नीति व तात्कालिक कार्यक्रम होना चाहिए।  

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