नये साल की पहली सुबह -अनुपम प्रियदर्शनम्

Published
Fri, 01/16/2026 - 07:14
/naye-saal-ki-pahali-subah-anupama-priyadarshanam

नये साल की पहली सुबह
जीवन संगिनी ने लम्बी उम्र की कामना की
मैं अल-सुबह सैर पर निकला,
बादलों के टुकड़ों से झांकते
तारों से मुलाकात की
पहाड़ों पर टिम-टिमाती रोशनी को निहारा,
आजाद पंछियों के मधुर गीत को सुना।
सड़कों से गुजरा,
अल सुबह मजदूरों को काम पर जाते देखा
गृहणियों को घर बुहारते देखा।
और उस दुकानदारिन को देखा,
जो रोज सुबह गर्म चाय से ग्राहकों का स्वागत करती है,
खास बात है, उसके आलू के गुटके
जो महका देते हैं, पूरी सड़क को मसालों की खुशबू से।
ट्रक-ट्राली दौड़ाते, ड्राइवरों को देखा
और देखा, कैसे कोई बीन रहा है, बीती रात के अवशेष
जवान पति के बोरे में कागज के गत्ते,
और उसकी संगनि के बोरे में खाली बोतलें।

गहमागहमी से भरी थी सुबह,
फासिस्टों ने निकाली सुबह-सुबह परेड
मानो कह रहे हों, ये साल तो हम निगल जायेंगे।
कौतुहल से भरे लोगों ने परेड का उड़ाया मजाक
कोई बोल उठा, पैदा होते हैं यहां बलात्कारी
अनायास अंकिता भण्डारी का चेहरा घूमा
इनका पूरा इतिहास खुल गया
देशद्रोही, राष्ट्रवादी बन गये
बलात्कारी, संस्कारी बन गये
हत्यारे, मसीहा बन गये।

अभी सुबह बाकी है,
नये साल का पूरा दिन है,
बधाईयों के तांते का इंतजार है।
और चाहत है,
जल्द से जल्द बीते, मजदूर-मेहनतकशों का बुरा वक्त
मेरे जेब में हैं,
बच्चों के लिए टाफियां और चाकलेट
ढूंढ रहा हूं उन्हें, उनका प्यारा तोहफा देने के लिए।
(साभार : कविता संग्रह ‘वक्त-वक्त की बात है’)

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?