ट्रम्प सरकार द्वारा वैश्विक चिकित्सा अनुसंधान सहयोग में कटौती

Published
Sun, 03/01/2026 - 07:01
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल में अमेरिकी साम्राज्यवाद को बेहद आक्रामक रुख प्रदान कर रखा है। उनकी विदेश नीति दीर्घकालिक हितों के लिए तात्कालिक हितों पर थोड़ा बहुत समझौता कर लेने की नीति के उलट है। उन्हें तत्काल में भी अमेरिकी इजारेदारों के लिए मुनाफा चाहिए और ताकत व जोर-जबर्दस्ती से लंबे समय के लिए अपनी चौधराहट भी स्थापित करनी है। वह अपनी मंशा में कितने कामयाब होंगे यह समय ही बतायेगा। इतना साफ है कि उन्हें चीन-रूस के उभार के बाद बनती द्विध्रुवीय साम्राज्यवादी दुनिया अथवा किसी भी प्रकार की बहुधु्रवीय दुनिया कतई बर्दाश्त नहीं है। उन्हें हर हाल में अमेरिका के पक्ष में पूरी तरह झुकी एकध्रुवीय दुनिया चाहिए। जैसी कि किसी हद तक पिछली सदी के अंतिम दशक में थी। इसीलिए ट्रम्प ने अमेरिकी साम्राज्यवाद का ‘सौम्य वर्चस्ववादी’ (Benign Hegemony) वाला आवरण उतार फेंका है और खुलकर ‘शिकारी वर्चस्ववाद’ (Predatory Hegemony) वाले रूप में सामने आ गया है। विश्व भर में चिकित्सा क्षेत्र के विकास के लिए विभिन्न समझौतों के तहत प्रदान की जाने वाली अमरीकी सहायता में 2025 में की गयी भारी कटौती ट्रम्प की इसी प्रवृत्ति को उजागर करती है। 
    
2025 में ट्रम्प प्रशासन ने अमेरिकी के ‘नेशनल इंस्टीट्यूट्स आफ हैल्थ (एन.आई.एच.) द्वारा अपने विदेशी सहयोगियों को दी जानी वाली अनुदान राशियों में भारी कटौती की। एन.आई.एच. द्वारा विश्व भर में संचालित स्वास्थ्य कार्यक्रमों को काफी ज्यादा घटा दिया गया। दुनिया भर में स्वास्थ्य अनुसंधान के लिए चलने वाले अमेरिका के ‘फोगार्टी अंतर्राष्ट्रीय केन्द्रों’ को बंद करने का प्रस्ताव किया। साथ ही, चीन, रूस व ईरान जैसे बहुत से देशों के वैज्ञानिकों द्वारा एन.आई.एच. के डेटा बेस तक पहुंच को प्रतिबंधित कर दिया। स्पष्ट है कि ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिकी साम्राज्यवाद विश्व भर में जनकल्याणकारी कार्यक्रमों के माध्यम से की जाने वाली ‘सॉफ्ट डिप्लोमेसी’ को त्यागने की ओर बढ़ रहा है। दुनिया भर में मुख्यतः अमेरिकी अनुदान पर निर्भर ऐसे बहुत से स्वास्थ्य कार्यक्रम और अनुसंधान ट्रम्प सरकार के इस रवैय्ये से संकट में पड़ गये हैं। अनुमान तो यह भी है कि एन.आई.एच. के बजट में 20 अरब डालर की यह कटौती स्वयं अमेरिका की अर्थव्यवस्था में लगभग 50 अरब डालर तक का फर्क डाल सकती है। खैर अपनी अर्थव्यवस्था के नुकसान की भरपाई ट्रम्प दूसरे उपायों से कर लेंगे। किन्तु अफ्रीका, एशिया व यूरोप के स्वास्थ्य कार्यक्रमों व अनुसंधानों का ठप पड़ जाना तय है, जो अब तक एन.आई.एच. के अनुदान से चल रहे थे। वैश्विक स्तर पर जैव विज्ञान उद्योग के तहत बहुत सी नई दवाओं व तकनीकों का विकास ट्रम्प के व्यवहार से अधर में लटक गया है। ‘वैश्वीकरण’ की सारी बातें बेमानी हो गयी हैं। 
    
2025 में एन.आई.एच. की बजट कटौती के कारण दुनिया भर में चल रहे क्लीनिकल परीक्षणों से जुड़े लगभग 74 हजार लोग प्रभावित हुए हैं। यह परीक्षण कोविड-19, एड्स, टी बी जैसी कई बीमारियों से संबंधित हैं। 2020-21 की कोविड वैश्विक महामारी के बाद भी ट्रम्प प्रशासन का यह व्यवहार स्पष्ट कर देता है कि साम्राज्यवादी वर्चस्व के सामने मानव समाज के अस्तित्व का प्रश्न भी कोई महत्व नहीं रखता है।
    
‘फोगार्टी अंतर्राष्ट्रीय केन्द्रों’ ने अब तक 132 देशों में लगभग 8,500 वैज्ञानिकों को प्रशिक्षित किया है। इन केन्द्रों के बंद हो जाने पर यह प्रशिक्षिण और आधुनिक चिकित्सा के ज्ञान-विज्ञान के प्रसार का कार्य भी प्रभावित होगा। किन्तु साम्राज्यवादी ट्रम्प को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन ट्रम्प को इस बात से तो फर्क पड़ना चाहिए था कि अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा खाली की जा रही इस जगह को चीनी साम्राज्यवादी भरने को आगे आ सकते हैं। इस प्रकार, चीनी साम्राज्यवादी अमेरिका के मुकाबले अपने वर्चस्व व साख को और मजबूत ही बना लेंगे। उदाहरण के लिए, दक्षिण अफ्रीका के स्वास्थ्य अनुसंधान बजट का 28 प्रतिशत हिस्सा अब तक एन.आई.एच. अनुदान से आता था, जो अब बंद हो गया है। निश्चित ही चीन दक्षिण अफ्रीका के लिए इस क्षेत्र में एक विकल्प बन सकता है। और चीनी साम्राज्यवादी ऐसे किसी मौके को छोड़ेंगे नहीं। किन्तु ट्रम्प अपने वर्चस्व को स्थापित करने के लिए फिलहाल अंधाधुंध हाथ-पैर मार रहे हैं। इन सारे प्रयासों का अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए सकारात्मक-नकारात्मक परिणाम भविष्य के गर्भ में है। किन्तु यह साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता दुनिया भर के गरीबों के लिए बेहद घातक है। इसके परिणाम वर्तमान में ही एकदम जाहिर हैं। 
    
दुनिया भर में एड्स बीमारी पर 68 प्रतिशत अनुसंधान व टी बी पर 34 प्रतिशत अनुसंधान एन.आई.एच. के अनुदान पर निर्भर थे, जो अब बंद हो गये हैं। स्पष्ट है कि इन बीमारियों से दुनिया भर में गरीब आबादी ही बहुलांशतः मरती है। डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने निर्णय से ऐसे बहुत से गरीबों की मौत की इबारत लिख दी है। 
    
संयुक्त राष्ट्र संघ के बहुप्रचारित ‘सतत विकास लक्ष्य (एस.डी.जी.) का एक लक्ष्य एस.डी.जी.-3 है- ‘बेहतर स्वास्थ्य और खुशहाली। ट्रम्प का वैश्विक स्वास्थ्य कार्यक्रमों व अनुसंधानों के लिए बजट कटौती का निर्णय इस लक्ष्य को मुंह चिढ़ाता प्रतीत होता है। उस पर तुर्रा यह कि इस आदमी को विश्व शांति का ‘नोबेल पुरुस्कार’ भी चाहिए। क्या मजाक है!  

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