अमेरिकी घेरेबंदी का मुकाबला करती क्यूबाई महिलायें

Published
Sun, 03/01/2026 - 07:01
/ameriki-gherebandi-ka-mukabalaa-karati-qubaai-women

वेनेजुएला के तेल पर अमेरिकी कब्जे को सुनिश्चित करने के बाद अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने क्यूबा की घेराबंदी बढ़ा दी है। क्यूबा को अभी तक वेनेजुएला से सस्ता तेल सप्लाई होता रहा था। अब यह तेल सप्लाई रुकने से क्यूबा की परेशानी बढ़ गयी है। यद्यपि रूस ने अपना एक तेल वाहक जहाज क्यूबा की ओर भेज कर इस सप्लाई के जारी रहने का आश्वासन दिया है पर अमेरिकी साम्राज्यवादी क्यूबा को हैरान-परेशान करने की हर कोशिश में जुटे हैं। वे क्यूबा में सत्ता परिवर्तन का प्रयास कर रहे हैं। क्यूबा की पूंजीवादी सरकार यद्यपि पहले का साम्राज्यवाद विरोधी रुख त्याग अमेरिका से सम्बन्ध बनाने को तैयार है पर वह ट्रम्प की इच्छानुरूप पूर्ण आत्मसमर्पण को तैयार नहीं है। 
    
अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने बीते 6 दशकों से क्यूबा की एक तरह से नाकेबंदी कर रखी है। इस नाकेबंदी के तहत क्यूबा में आर्थिक-वाणिज्यिक व वित्तीय मदद-सहायता अनुदान सभी कुछ पहुंचने पर रोक लगायी गयी है। अब क्यूबा तक तेल पहुंचने पर रोक लगाकर अमेरिका ने यह नाकेबंदी और बढ़ा दी है। इस तरह क्यूबा को एक गम्भीर ऊर्जा संकट की ओर धकेल दिया गया है। 
    
6 दशक से नाकेबंदी से मुकाबला करते आ रहे क्यूबावासियों के लिए एक बार नये सिरे से कठिन हालात पैदा कर दिये गये हैं। वैसे अभी तक क्यूबाई जनता ने तरह-तरह के दुख-कष्ट झेल कर अमेरिकी साम्राज्यवाद के आगे न झुकने का परिचय दिया है। क्यूबा की महिलाओं के धैर्य व सहने की क्षमता ने हर नाकेबंदी का मुकम्मल जवाब दिया है। 
    
एम्मा डोरिस रिकार्डो क्यूबा में विश्वविद्यालय की शिक्षिका थी। कुछ वर्ष पहले स्तन कैंसर की वजह से उन्हें अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी। नाकेबंदी के चलते उनके इलाज के लिए जरूरी साइटोटॉक्सिक सीरम की सप्लाई काफी कम हो गयी। नतीजा यह निकला कि एम्मा का इलाज दवा के अभाव में कठिन हो गया। वे 3 बार अस्पताल में भर्ती हुईं। पर इन हालातों में भी एम्मा ने धैर्य नहीं छोड़ा। उन्होंने क्यूबा की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा पर भरोसा कायम रखा और लोगों की एकजुटता-सहयोग से फिर से स्वस्थ हो गयीं। एम्मा कहती हैं ‘‘दवाएं ठीक करती हैं, लेकिन एकजुटता भी इलाज करती है। यही आपको उठने की प्रेरणा देती है।’’
    
एम्मा की तरह ही उनकी 10 वर्षीया बेटी क्लाउडिया भी दवाओं की कमी की मार को झेल रही है। क्लाउडिया एक विकास संबंधी विकार से पीड़ित है। प्रतिबंधों के कारण आवश्यक दवाएं व हार्मोन क्यूबा में नहीं लाने दिये जा रहे हैं। एम्मा क्लाउडिया के इलाज के प्रति चिंतित हैं। पर वे हार मानने को तैयार नहीं हैं। वे कहती हैं ‘‘मैंने अपने जूते पहन रखे हैं। हम डरेंगे नहीं, क्यूबावासियों के लिए आत्मसमर्पण की कोई जगह नहीं है। हम अपना भाग्य स्वयं तय करेंगे, कोई और नहीं।’’
    
29 वर्षीया रोसियो रिंकोन पिट्यूटरी ग्रंथि के ट्यूमर से पीड़ित हैं वह एक अस्पताल कर्मचारी हैं। वे मां बनना चाहती हैं लेकिन दवाओं की कमी के चलते-इलाज में देरी के चलते अपनी मातृत्व की इच्छा टालने को मजबूर हैं। वह क्यूबा की स्वास्थ्य प्रणाली के मुफ्त इलाज के प्रति आभार व्यक्त करती हैं। हालांकि मित्र देशों के दान पर निर्भर दवाओं की बेहद कम आपूर्ति उनकी उम्मीदों पर संकट की छाया डालती रहती हैं। वे कहती हैं ‘‘इस नाकाबंदी की वजह से बहुत से लोग परेशान हैं। ट्रम्प के शासन में स्थिति और भी आक्रामक है, ये हमें दबाने के उपाय हैं लेकिन वे सफल नहीं होंगे।’’ 
    
ऊर्जा की कमी से जूझ रही सैंटियागो की 60 वर्षीया बेकर मारिया ईवा पुएटेस बिजली कटौती के बावजूद केक बनाने के काम में जुटी रहती हैं। वे मानती हैं कि बिजली कटौती से उनकी काम करने की क्षमता घट जाती है। कि उनकी विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली बेटी की पढ़ाई प्रभावित होती है। लेकिन इन विपरीत हालातों में भी वे अडिग रुख रखती हैं। वे कहती हैं ‘‘यह देश हमारा है। हम रचनात्मकता से प्रतिरोध करेंगे। यहां कोई हार नहीं मानता।’’
    
11 वर्षीया छोटी बच्ची ऐनारा नीरा रेपेस की पढ़ाई नाकेबंदी से प्रभावित हो रही है। उसके पास पेंसिल, नोटबुक, बालीबाल आदि का काफी अभाव है। पर इनके बगैर भी वह स्कूल और शिक्षकों की मदद से शिक्षा पा रही है। वह रोज नयी जानकारी प्राप्त करती है और समझती है कि बाहरी नफरत उनका मनोबल तोड़ना चाहती है। वह दुनिया भर के बच्चों को एकजुटता व अटूट आशा का संदेश देते हुए कहती है ‘‘हम एक कठिन दौर से गुजर रहे हैं लेकिन अगर आप भी ऐसी ही किसी स्थिति से गुजरें, तो हम यहां से आपका समर्थन करेंगे। हार मत मानो।’’
    
क्यूबा की इन बहादुर महिलाओं को क्यूबा की क्रांति ने गढ़ा है। ये महिलायें हर विदेशी नाकाबंदी का मुकाबला सामुदायिक एकता के दम पर कर रही हैं। वे एक तरह से नाकेबंदी से भी गुरिल्ला युद्ध लड़ रही हैं। अंधेरे में केक पका रही हैं, किताबों के बगैर पढ़ने का साहस कर रही हैं, दवाओं की कमी के बावजूद इलाज करा रही हैं। क्यूबा में भले ही क्रांति से रचा समाज अतीत की बात हो चुका है, और पूंजीवादी व्यवस्था सर्वव्याप्त हो चुकी है पर क्रांति ने महिलाओं के जीवन में जो बदलाव ला दिया उस के दम पर वे आज भी बहादुरी से अमेरिकी घेरेबंदी का मुकाबला कर रही हैं। वे अमेरिका के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं। 

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?