गुडगाँव के आई एम टी मानेसर में 2 अप्रैल से चल रहे मज़दूर आंदोलनों पर अब पुलिस ने लाठीचार्ज शुरु कर दिया है। मज़दूरों और मज़दूर संगठनों के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया जा रहा है। पुलिस द्वारा किये गये लाठीचार्ज में दर्ज़नों मज़दूर घायल हुए हैं। ज्ञात हो कि आई एम टी मानेसर में मज़दूर हरियाणा सरकार द्वारा लागू न्यूनतम वेतन (15,220₹-19,425₹) को लागू करने की मांग कर रहे हैं।
पुलिस मज़दूरों और मज़दूर संगठनों के कार्यकर्ताओं को उनके कमरों से गिरफ्तार कर रही है। मज़दूर आंदोलन की रिपोर्टिंग कर रहे "नागरिक" अख़बार के गुडगाँव संवाददाता को भी पुलिस ने 9 अप्रैल को डिटेन कर लिया था। हालांकि देर रात उनको रिहा कर दिया गया।
पुलिस द्वारा मज़दूरों पर लाठीचार्ज करने और उनकी गिरफ्तारियों के विरोध में फरीदाबाद और हरिद्वार में मज़दूर संगठनों, ट्रेड यूनियनों और सामाजिक संगठनों ने 9 अप्रैल को विरोध प्रदर्शन किया। फरीदाबाद के लखानी चौक पर हुई सभा में वक्ताओं ने कहा कि हरियाणा में पिछले 10 साल से वेतन रिवाइज नहीं किया गया है। अब जो न्यूनतम वेतन तय किया गया है वह बहुत ही कम है लेकिन फैक्टरी मालिक उसे भी लागू करने को तैयार नहीं हैं।
हरिद्वार में चिन्मय डिग्री कॉलेज पर इंक़लाबी मज़दूर केंद्र, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र और हरिद्वार संयुक्त संघर्षशील मोर्चा द्वारा मानेसर में मज़दूरों पर हुए लाठीचार्ज की निंदा की और मज़दूरों तथा मज़दूर नेताओं की गिरफ्तारी पर आक्रोश जताया। सूत्रों के मुताबिक करीब 45 मज़दूरों को 9 अप्रैल को पुलिस ने गिरफ्तार किया है जिसमें 17 महिला मज़दूर हैं।
प्रदर्शन के दौरान हुई सभा में वक्ताओं ने कहा कि मानेसर में मज़दूरों के समर्थन में उठने वाली आवाज़ों को दबाया जा रहा है। मज़दूरों को भुखमरी का वेतन दिया जा रहा है। आज महंगाई को देखते हुए कम से कम 30,000₹ न्यूनतम वेतन होना चाहिए।
हरिद्वार में फ़ूड्स श्रमिक यूनियन और किरबी श्रमिक कमेटी ने मानेसर के मज़दूरों के समर्थन में प्रेस वक्तव्य भी जारी किये हैं।
दरअसल मज़दूरों का फैक्टरी मालिकों के खिलाफ अविश्वास और गुस्सा यूं ही नहीं है। मज़दूर दसियों सालों से फैक्टरी मालिक की तानाशाही बर्दाश्त कर रहे हैं। फैक्टरी मालिक लगातार यूनियनों को ख़त्म कर रहे हैं। श्रम विभाग, न्यायालय, शासन प्रशासन सब इसमें उनका साथ दे रहे हैं। मज़दूरों को ठेके पर रखा जा रहा है। स्थायी काम खत्म हो रहे हैं। मज़दूरों को ठेके के अलावा नीम, ट्रेनी, एफ टी ई, कौशल विकास परियोजना आदि भांति भांति नाम देकर सस्ते श्रमिक के रूप में रखा जा रहा है। मज़दूरों को फैक्टरी में कोई सुरक्षा नहीं दी जाती। कोढ में खाज़ यह है कि अब सरकार ने मज़दूरों का शोषण और बढ़ाने के लिए 4 नये लेबर कोड लागू कर दिये हैं। सरकार भले ही प्रचार के जरिये इन 4 लेबर कोड को मज़दूरों के हित में बता रही हो लेकिन इन लेबर कोड की हकीकत मज़दूर अच्छी तरह जानते हैं।
2012 में मारुति के मज़दूरों का भयंकर दमन पुलिस ने किया था। मज़दूरों के सिर पर इनाम घोषित कर दिया था। न्यायालय ने भी 13 निर्दोष मज़दूरों को आजीवन कारावास की सजा दी थी। सैकड़ों स्थायी मज़दूरों और हज़ारों ठेका मज़दूरों को कम्पनी से निकाल दिया गया था। और सोचा था कि उन्होंने मज़दूर आंदोलनों को खत्म कर दिया है। ऐसा ही कुछ 2005 में होंडा के मज़दूरों पर लाठीचार्ज करते समय सोचा गया था लेकिन मानेसर में फूट रहे मज़दूर आंदोलन साबित कर रहे हैं कि जब तक मज़दूरों का शोषण उत्पीड़न जारी है तब तक मज़दूर शांति से अपने शोषण उत्पीड़न को बर्दाश्त नहीं करेंगे, वे प्रतिरोध करेंगे।