एक तरफ न्यूनतम वेतन का नोटिफिकेशन दूसरी तरफ मज़दूरों का बर्बर दमन
आई एम टी मानेसर में 2 अप्रैल से न्यूनतम वेतन लागू करने के लिए चल रहे मज़दूर संघर्षों के दौरान हरियाणा की भाजपा सरकार का दोहरा चरित्र एक बार फिर उजागर हुआ। मज़दूर संघर्षों के दबाव में एक तरफ जहाँ सरकार को न्यूनतम वेतन का नोटिफिकेशन जारी करने की घोषणा करनी पड़ी। वहीं दूसरी तरफ मज़दूरों का 9 अप्रैल को भारी पैमाने पर दमन किया गया। इस दौरान पुलिस ने 56 मज़दूरों को गिरफ्तार किया है जिसमें 20 महिला मज़दूर हैं।
9 अप्रैल को पुलिस ने मज़दूरों के खिलाफ दो एफ आई आर दर्ज़ की हैं। एक एफ आई आर संख्या 95 है। यह एफ आई आर मॉडेलम कम्पनी के एच आर की सूचना पर की गयी है। इसमें पुलिस ने 45 मज़दूरों को गिरफ्तार किया है। दूसरी एफ आई आर रिचा ग्लोबल के एच आर की तरफ से दर्ज़ की गयी है। इसमें 11 मज़दूर हैं। इस एफ आई आर में मज़दूरों पर आगजनी 326 (f) और हत्या के प्रयास के 105 (1) के तहत भी मुकदमा दर्ज़ किया गया है। इसके साथ ही दोनों एफ आई आर में सरकारी काम में व्यवधान डालने, अवैध सभा करने, सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाने, षडयंत्र, बलवा-दंगा करने, आदेश न मानने, चोट पहुँचाने आदि धाराओं को जोड़ा गया है।
10 अप्रैल को पुलिस ने सभी मज़दूरों को कोर्ट में पेश किया। यहाँ 11 मज़दूरों (जिन पर आगजनी और हत्या के प्रयास का मुकदमा है) को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में और बाकी 45 मज़दूरों को रविवार 12 अप्रैल तक न्यायिक हिरासत में भेजा गया है। सोमवार को इन मज़दूरों की जमानत याचिका पर सुनवाई की जायेगी।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर मज़दूर संघर्ष को मज़बूर क्यों हुए। दरअसल हरियाणा सरकार को 2020 में ही नये वेतनमान की घोषणा करनी थी लेकिन 10 साल बाद हरियाणा की भाजपा सरकार को वेतन बढ़ाने की याद आयी। 29 दिसंबर 2025 को सरकार, पूंजीपतियों के प्रतिनिधि और मज़दूर प्रतिनिधियों की एक बैठक में 23,196₹ न्यूनतम वेतन लागू करने पर सहमति बनी (हालांकि मज़दूर संगठन 26,000₹ न्यूनतम वेतन लागू करने की बात कर रहे थे)। लेकिन 2 मार्च 2026 को बजट के दौरान विधानसभा में 15,220₹ की घोषणा सरकार ने की। लेकिन इस पर भी सरकार ने कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं किया। वेतन बढ़ाने का सरकारी प्रचार जारी रहा।
पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे मज़दूरों पर दोहरी मार ईरान और अमेरिका-इज़रायल युद्ध के दौरान पड़ी। गैस के आसमान छूते दाम और गैस की किल्लत ने उनके धैर्य को खत्म कर दिया। जब 1 अप्रैल को भी फैक्टरी में वेतन बढ़ोत्तरी के नोटिस नहीं लगे तो 2 अप्रैल से एक के बाद एक फैक्टरी में आंदोलन शुरू हो गये। पहले होंडा, फिर मुंजाल शोवा उसके बाद सत्यम ऑटो और उसके बाद रूप पॉलीमर, फोर्ज़, सरिता हांडा, प्रिकोल, रिचा ग्लोबल, मॉडेलम, रिचाको, सिरमा एस जी एस, आदि कम्पनियां। 7 अप्रैल को गुडगाँव प्रशासन ने धारा 163 लगाकर मज़दूरों के संघर्ष थामने की कोशिश की लेकिन मज़दूर नहीं रुके। तब जाकर सरकार को न्यूनतम वेतन का नोटिफिकेशन जारी करने की घोषणा करनी पड़ी। लेकिन मज़दूरों को सरकार की घोषणा पर कोई यकीन नहीं था। वे लगातार सरकार की फ़र्ज़ी घोषणाओं के बारे में सुनते रहते हैं। मज़दूरों का कहना था कि फैक्टरी मालिक अपने यहाँ नोटिस बोर्ड पर यह सूचना चस्पा करें।
इसके साथ ही और भी घटनायें घटीं जिन्होंने मज़दूरों को अपना संघर्ष जारी रखने को मज़बूर किया हालाँकि ये शांतिपूर्ण प्रदर्शन थे। कई जगह मज़दूरों को फैक्टरी में जबरन काम करने तो कहीं मज़दूरों को काम पर न लेने की सूचना मिली। इधर सरकार के आदेश पर पुलिस भी मज़दूरों पर लाठीचार्ज करने और मज़दूरों को गिरफ्तार करने लगी। कई मज़दूरों को गंभीर चोट आयी हैं। एक मज़दूर का सिर फटने का विडिओ भी सामने आया है।
न्यायालय भी आज पूंजीपतियों की सेवा में नतमस्तक है। कुछ दिनों पहले मारुति सुजुकी के एक मज़दूर के संबंध में फैसला देते हुए कहा था कि आज की ट्रम्पियन दुनिया में भीषण गलाकाटू प्रतियोगिता के दौर में अगर देश का विकास करना है तो मज़दूरों को अनुशासन में रखना आवश्यक है। मज़दूरों को अपने अधिकारों की आड़ में अनुशासनहीनता नहीं करने दी जा सकती। इस फैसले का साफ संदेश था कि मज़दूरों को अब अपने अधिकारों के तहत सभा करने, धरना देने आदि की इज़ाज़त सरकार नहीं देगी। गुडगाँव के पुलिस के एक आला अफसर ने तो यहाँ तक कहा कि मज़दूर संगठनों को अब मज़दूरों की सहायता करने और उनको संगठित करने नहीं दिया जायेगा। और ऐसे लोगों पर कड़ी कार्यवाही की जाएगी।
यानी चित भी मेरी और पट भी मेरी। यानी सरकार और पूंजीपति मिलकर मज़दूरों का शोषण करेंगे और मज़दूरों को अपनी आवाज़ भी नहीं उठाने दी जाएगी।