नेपाल : युवा सड़कों पर शासक भागे

पिछले कुछ दिनों से नेपाली युवाओं ने नेपाल को हिलाकर रख दिया है। भ्रष्टाचार, अय्याशी में आकंठ डूबे शासकों के खिलाफ युवाओं ने यह जन आंदोलन खडा किया। जन आंदोलन की आंधी में भ्रष्ट शासक किसी तिनके की तरह उड़ गये। युवाओं ने एक बार फिर से दिखा दिया कि जब यह सोई ताकत जागती है तो क्या कुछ कर सकती है।

‘जेन-जी’ नाम से विख्यात हुए इस आंदोलन ने प्रधानमंत्री, गृहमंत्री सहित कई नेताओं को इस्तीफा देने को मजबूर कर दिया। जनता की पीठ पर सवार नेता यहां-वहां भागकर, छिपकर अपनी जान बचा रहे हैं। वित्त मंत्री विष्णु पैडोले को सड़क पर दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया। युवाओं की भीड़ ने प्रधानमंत्री सहित कई नेताओं (शेर बहादुर देउपा, प्रचंड आदि) के घरों को आग लगा दी। संसद भवन और सिंह दरबार (जिसमें कई सरकारी इमारतें हैं) में भी आग लगा दी।

पुलिस और सेना द्वारा प्रदर्शनकारी युवाओं का दमन किया गया। अब तक 30 लोगों की मौत हो चुकी है। प्रदर्शन के दौरान 1000 से अधिक लोग घायल हुए हैं। घायलों में पुलिस वाले भी शामिल हैं। छात्र-युवा इतनी बड़ी तादाद में सड़कों पर निकल आये कि उन्हें नियंत्रित करना सत्ता के बस की बात नहीं रह गयी।

सरकार की अपीलों का युवाओं पर कोई असर नहीं हो रहा है। पूंजीवादी शासकों ने अपना अंतिम विकल्प यानी सेना को मैदान में उतारा है। सेना के जनरल ने लोगों से हिंसा छोड़ने और शांति की अपील की है।

ऊपरी तौर पर लग सकता है कि ‘जेन-जी’ आंदोलन सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर लगाये प्रतिबंध के कारण फूटा। सरकार द्वारा 4 सितम्बर को सोशल मीडिया के 26 प्लेटफार्म पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। जन आंदोलन के कुछ ही समय बाद प्रतिबंध हटाने को सरकार मजबूर हुई। युवाओं का आक्रोश फिर भी जारी है। मौजूदा आंदोलन को सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के तौर पर देखना सही नहीं होगा, इसकी जडें़ काफी गहरी हैं।

नेपाल पिछले लम्बे समय से राजनीतिक अस्थिरता से गुजर रहा है। किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत ना मिलना और जोड़-तोड़ से ही यहां सरकार बन पा रही है। पिछले 17 सालों में यहां 14 सरकारें बदल चुकी हैं। सरकारों का यूं बनने-बिगड़ने, नेताओं का सत्ता के लिए किसी भी तरह के जोड़-तोड़ ने जनता के बीच पूंंजीवादी लोकतंत्र की सच्चाई को उजागर कर दिया।

नेता, अधिकारी, विभाग भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं। भ्रष्टाचार सूचकांक में 180 देशों की सूची में नेपाल का स्थान 110वां है। 2017 में एक एयरबस सौदे की 5 साल जांच के बाद पिछले साल रिपोर्ट जारी हुई जिसमें नेता-अधिकारी देश को चूना लगाकर कमीशन खाकर भारी भ्रष्टाचार करते पाये गये। देश की जनता भारी गरीबी में जीवन बिता रही है और नेता व उनके बच्चे देश-विदेश में आलीशान जीवन बिता रहे हैं। पिछले दिनों कई नेता और उनके परिवार से जुडे़ लोगों के अय्याशी करते हुए वीडियो सोशल मीडिया में काफी चर्चा के विषय बने। नेपाल की 7.5 प्रतिशत लोग आजीविका के लिए दूसरे देशों में काम करने को मजबूर हैं। इसमें ज्यादातर लोग बुरी कार्यपरिस्थितियों में ही काम करते हैं। देश की जनता की गरीबी और शासकों की आलीशान जीवन शैली देश के युवाओं को निरंतर कचोट रही थी।

नेपाली युवा भारी बेरोजगारी के हालात झेल रहे थे। साल 2023 में नेपाल में बेरोजगारी की दर 11.5 प्रतिशत थी। युवाओं में तो यह दर इससे भी अधिक थी। देश में बेरोजगारी के हालत के कारण ही कई नौजवान दूसरे देशों में जाकर निम्न स्तर का काम करने को मजबूर हैं। बेरोजगारी के इन हालात ने भी नेपाली युवाओं के असंतोष को कई गुना बढ़ा दिया।

दरअसल नौजवानों की इस दुर्दशा के लिए 1990 के दशक से नेपाल में जारी उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियां जिम्मेदार हैं। इन नीतियों के चलते जहां एक ओर नेपाल पर विदेशी कर्ज का बोझ बढ़ता गया वहीं नई पीढ़ी का भविष्य रोजगार के अभाव में अंधकारमय होता गया। युवाओं के बुरे हालातों के बीच नेताओं की भ्रष्टाचार व उनकी औलादों के अय्याशी भरे जीवन ने युवाओं को आक्रोश से भर दिया।

कुल मिलाकर साफ देखा जा सकता है कि नेपाल पिछले काफी समय से गंभीर आर्थिक, राजनीतिक संकट से घिरा हुआ है। इन संकटों के लिए नेपाल के शासक वर्ग तो जिम्मेदार हैं ही लेकिन पड़ोसी ताकत भारत, चीन और अमेरिका भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। इन तीनों ही ताकतों के खिलाफ अलग-अलग मात्रा में विरोधी पक्ष नेपाल में मौजूद हैं।

भारत का नेपाल में लम्बे समय से एकछत्र प्रभाव रहा है। भारत के शासक का नेपाल के प्रति अपने एक राज्य जैसा व्यवहार रहता है। भारत का यहां काफी निवेश है। इस निवेश के कारण भारत नेपाल के मामलों में निरंतर हस्तक्षेप करता रहा है। अपने पक्ष की सरकार बनाना और अपने फायदे के लिए भारत सरकारों पर दबाव बनाता रहा है। नेपाल भारत के इन हस्तक्षेपों का निरंतर विरोध करता रहा है और इन हस्तक्षेपों को संप्रभुता के लिए खतरा कहता रहा है।

पिछले कुछ समय से नेपाल में साम्राज्यवादी चीन ने अपने कदम जमाये हैं। चीन के निवेश और आर्थिक सहायता ने नेपाली शासकों के सामने भारत और चीन का विकल्प प्रस्तुत किया है। कई मौकों पर भारत और नेपाल के शासकों के बीच तनाव भी सामने आया है। जाहिर ही है कि चीन की आर्थिक मदद नेपाल के विकास के लिए नहीं बल्कि नेपाल को कर्ज और आर्थिक बंधनों में फंसाकर लूटने-खसोटने की है।

साम्राज्यवादी अमेरिका भी नेपाल को अपने सैन्य प्रभाव में बनाकर रखना चाहता है। इसके लिए अमेरिका ने नेपाल में मिलेनियम चैलेंज कारपोरेशन (एमसीसी) कार्यक्रम चलाये। अमेरिकी सैन्य प्रभाव बढने को लेकर भी नेपाल के एक हिस्से का विरोध रहा है।

नेपाल के देशी शासकों के साथ-साथ विदेशी शासक भी नेपाल को लूटने-खसोटने में लगे रहे हैं। विदेशी ताकतें नेपाल को अपने-अपने आर्थिक, सैन्य प्रभाव में रखना चाहती हैं। इनकी नजर में नेपाल एक भू-भाग है यहां के बेरोजगार, गरीब जनता इनकी किसी प्राथमिकता में नहीं है।

मौजूदा जन आंदोलन में यह विभिन्न विदेशी ताकतें अपना-अपना हित साधने की कोशिश कर रही हैं और आगे भी करेंगी। ये ताकतें कभी भी नेपाल का भला नहीं कर सकतीं। ये बस नेपाल को लूटना चाहती हैं। नेपाली युवाओं को इन साम्राज्यवादी, विस्तारवादी ताकतों से भी सचेत होने की आवश्यकता है।

जन आंदोलन के समय नेपाल का एक समूह ऐसा भी है जो पूंजीवादी लोकतंत्र के भ्रष्टाचार की बात करते हुए नेपाल को कई दशक पीछे ले जाना चाहता है। यह समूह दबी जबान में ही सही राजशाही की वापसी की बात कर रहा है। नेपाल के राजनीतिक संकट को देखते हुए मौका तलाशने के लिए फरवरी 2025 में पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र शाह नेपाल में आया और अपने समर्थकों के साथ काठमांडू में रैली की। नेपाली युवाओं को इन प्रतिक्रियावादी ताकतों से भी सचेत रहने की आवश्यकता है। क्योंकि राजशाही के उत्पीड़न को नेपाली जनता ने 240 सालों तक झेला है। और एक लम्बे क्रांतिकारी संघर्ष के बाद सैकड़ों कुर्बानी देकर ही राजशाही का अंत किया जा सका था।

नेपाल के युवाओं का यह जन आंदोलन पूंजीवादी व्यवस्था के अन्याय, उत्पीड़न से तो उपजा है लेकिन फिलहाल इसके निशाने में पूंजीवादी व्यवस्था नहीं है। नेपाल में प्रचंड व ओली के नेतृत्वकारी संशोधनवादी पार्टियों व नेपाली कांग्रेस का बीते 2 दशकों में संसदीय राजनीति में वर्चस्व रहा है। इन संशोधनवादी पार्टियों की जनता से दगाबाजी व व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के चलते इस संघर्ष में शामिल युवा समूहों में कम्युनिज्म के प्रति कोई खास लगाव नहीं है। किसी हद तक राजशाही समर्थक पार्टी राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी व काठमांडू के रैपर राजनीतिज्ञ मेयर बालेन शाह का प्रभाव अधिक है। फिलहाल ये युवा समूह पूर्व मुख्य न्यायधीश शीला कार्की को प्रधानमंत्री बनाने पर सहमत होते दिख रहे हैं। इस आंदोलन में फिलहाल नेतृत्वकारी संगठन इस आंदोलन को पूंजीवादी दायरे में ही देखते हैं। जन आंदोलन का एक मुख्य संगठन, जिसके आह्वान पर युवा सड़कों पर उतरे ‘हामी नेपाल’ एक एनजीओ संगठन है। सुदन गुरंग इसका संचालक है। 2015 में बना यह संगठन आपदा राहत कार्यों में सक्रिय रहा। भारत में नेपाली छात्रा का उत्पीड़न और फिर आत्महत्या के बाद यह संगठन प्रमुखता से आंदोलनरत रहा है। अमेरिका से इसे बड़ी फंडिंग मिलने की बातें आती रही हैं।

जन आंदोलन के शुरूआत में ही ‘हामी नेपाल’ के प्रमुख ने आंदोलन का लक्ष्य या सही कहें तो सीमा को बता दिया है। वे कहते हैं- ‘‘मांगों के मूल में कानून के शासन की मांग है, जहां पक्षपात और भ्रष्टाचार पर निष्पक्षता, जवाबदेही और न्याय की जीत हो’’। स्पष्ट है वे मौजूदा पूंजीवादी लोकतंत्र के स्थान पर पूंजीवादी लोकतंत्र ही चाहते हैं, जिसमें भ्रष्टाचार ना हो, जिसमें नेताओं की जवाबदेही हो।

अभी यह कहना जल्दबाजी होगा कि यह संघर्ष भविष्य में किस रास्ते पर जायेगा। क्योंकि युवा समूहों में भी कोई विचारधारात्मक एकता नहीं है। पश्चगति के खतरे के साथ साम्राज्यवादी-विस्तारवादी ताकतों के बढ़ते हस्तक्षेप का खतरा मौजूद है। इन पूंजीवादी सीमाओं के बावजूद नेपाल के युवाओं ने अपनी ताकत से शासकों के होश तो उड़ा ही दिये हैं। क्रांति का अस्त्र लिए यह ताकत सैकड़ों गुना बढ़ जाती। देर-सबेर नेपाली युवा इसी दिशा में आगे बढ़ेगा।

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