भारत के मुख्य न्यायधीश की भाषणबाजी

Published
Fri, 10/16/2026 - 07:50
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नई दिल्ली राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 33वें स्थापना दिवस समारोह में ‘जल-जीवन का अमृत’ विषय पर आयोजित सम्मेलन में भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कुछ लच्छेदार बातें कही,जिसे भाषणबाजी भी कहा जा सकता है। उन्होंने कहा कि ‘‘संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होने पर अदालतों को दखल करना चाहिए’’। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की प्रसंशा करते हुए साहब ने बहुत से सलाह के साथ टिप्पणियां की है।
    
उन्होंने कहा, ‘‘अगर संविधान एक वादा है, तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग उस वादे की रक्षा करने वालों में से एक है।’’ उन्होंने कहा कि यह संस्था उन लोगों और औपचारिक अदालतों के बीच की अहम दूरी को कम करती है, जो आसानी से अदालतों तक नहीं पहुंच सकते या अपनी बात खुद नहीं रख सकते।
    
वे बोले, ‘‘मानवाधिकार कोई काल्पनिक बातें नहीं हैं। ये उतने ही ठोस हैं, जितना किसी बच्चे के हाथ में साफ पानी का गिलास, और उतने ही जरूरी हैं, जितनी उस बच्चे की प्यास।’’
    
संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले अधिकारों के विकास का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि जीने के अधिकार का मतलब अब सिर्फ जिंदा रहना नहीं है, बल्कि सम्मान के साथ जीवन जीना भी है। इसमें प्रदूषण से मुक्त पानी और हवा पाने का अधिकार भी शामिल है।
    
वे बोले, ‘‘जो अधिकार ताकतवर लोगों के लिए काम करता है, लेकिन कमजोर लोगों के लिए काम नहीं करता, वह सही मायने में अधिकार नहीं है। वह सिर्फ एक विशेषाधिकार है, जिसे बेहतर नाम दे दिया गया है।’’
    
उन्होंने खास तौर पर विचाराधीन कैदियों, ऐसे प्रवासी मजदूरों जिनके पास जरूरी दस्तावेज नहीं हैं, बेसहारा बुजुर्गों, दिव्यांग व्यक्तियों और बहुत ज्यादा काम के बोझ से जूझ रही महिलाओं को मानवाधिकारों की रक्षा की असली कसौटी बताया।
    
वे बोले, ‘जमीन के नीचे मौजूद पानी के भंडार को खत्म करना या नदियों को प्रदूषित करना आने वाले बच्चों पर अनुचित बोझ डालने जैसा है।’ हिरासत में यातना या मौत, बंधुआ मजदूरी, औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने के कारण सिलिकोसिस बीमारी का शिकार होने वाले लोगों और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के अधिकारों को लेकर चिंता जाहिर की।
    
मुख्य अतिथि के रूप में उन्होंने कहा, ‘‘मानवाधिकार आयोगों को शिकायतों की जांच करनी चाहिए, व्यवस्था में मौजूद कमियों की पहचान करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिन मुद्दों पर आम तौर पर ध्यान नहीं दिया जाता, उन्हें भी संस्थागत स्तर पर गंभीरता से उठाया जाए। सिविल सोसाइटी जमीनी हकीकत को सामने ला सकती है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं वैज्ञानिक जानकारी, अनुभव और सहयोग दे सकती हैं।’’
    
अदालतों और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को दी गई सलाह बड़ी अच्छी प्रतीत होती है।
    
यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर देश भर में विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। और पुलिस द्वारा बड़े पैमाने पर प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया जा रहा है। दिल्ली में पुलिस के साथ मिलकर फासीवादी संघी गुंडे़ भी प्रदर्शनकारियों को पीट रहे हैं तथा महिला प्रदर्शनकारियों के साथ अश्लील व अभद्र व्यवहार किया जा रहा है।
    
संविधान और सीजेआई के अनुसार अदालतों और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का कर्तव्य बहुत बड़ा है। लेकिन उससे कहीं अधिक अपराध देश में हो रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो ने अपराध से संबंधित 2024 के आंकड़े मई 2026 में जारी किए थे। एनसीआरबी की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार एक साल में कुल 58.85 लाख से अधिक संज्ञेय अपराध दर्ज हुए हैं। इसमें महिलाओं पर अपराध की संख्या 4.41 लाख है यानी देश में प्रतिदिन 1,208 से अधिक महिलाओं पर अत्याचार की घटनाएं हो रही हैं। बाल अपराधों की संख्या 98,375 है, यह 2023 की तुलना में लगभग 8 प्रतिशत अधिक है। अनुसूचित जातियों पर अपराध यानी अत्याचार की 55,696 घटनाएं हुई हैं। सबसे बड़ी बात है कि भारत की अदालतों में 5.64 करोड़ से अधिक मामले सालों से लंबित हैं। इसके लिए किसे जिम्मेदार कहा जाए। 
    
इन आंकड़ों से ऐसा प्रतीत होता है कि आम मजदूर मेहनतकश जनता के लिए अदालत या मानवाधिकार आयोग बना ही नहीं है। मानवाधिकार के उल्लंघन की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। अनेकों मामले में एफआईआर तक दर्ज नहीं होती है। दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, अति पिछड़ी जातियों और महिलाओं पर आए दिन हिंसा हो रही है। आर्थिक व सामाजिक रूप से कमजोर व्यक्तियों ही नहीं बल्कि समुदायों के मामले पुलिस व मानवाधिकार आयोग तक पहुंचते ही नहीं। कई मामलों को पुलिस खुद ही ताकतवर अपराधियों से मिलकर दबा देती है। सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में आजादी के 80वें साल में भी मूंछ रखने पर, घोड़ी पर चढ़ने पर, मंदिर में पानी पी लेने पर दलितों की हत्या कर दी जाती है।
    
जजों द्वारा आए दिन उपदेश दिये जाते हैं कि ‘‘जेल अपवाद और बेल नियम’’ है। लेकिन अनेकों मामले हैं जो असहज कर देते हैं। जेएनयू का होनहार पीएचडी स्कालर जिस पर दिल्ली पुलिस ने दंगा भड़काने का आरोप लगा रखा है, वह बिना ट्रायल के 2020 से ही जेल में बंद हैं। उसे जमानत तक नहीं मिल रही है। अनेक लोगों को पुलिस द्वारा फर्जी तरीके से फंसाया गया है और वे जेल में बंद हैं। हजारों लोग बेहद मामूली आरोप में बिना ट्रायल के जेल में हैं क्योंकि उनके मामले की पैरवी करने वाला कोई नहीं है। देश में ट्रायल भी कोई आसान काम नहीं है, मुकदमों की छः महीने-एक साल की लम्बी-लम्बी तारीख मिलती है। 
    
ट्रायल के बाद अदालतों ने कई लोगों को निर्दोष बताया है। 2002 में गुजरात पुलिस ने अक्षर धाम मंदिर पर आतंकी हमला करने का आरोप मढ़ कर 6 लोगों को जेल भेज दिया था। लम्बे ट्रायल के बाद 2014 में गुजरात हाईकोर्ट ने इन्हें निर्दोष बताया। इसी तरह अब्दुल गनी जेल से 23 साल बाद निर्दोष साबित होकर घर लौटे थे। निर्दोष साबित होने पर अदालतों द्वारा रिहा हुए लोगों द्वारा पुलिसकर्मियों के कुकृत्य के कारण जेल में यातनाओं के साथ रहने एवं कीमती 10-20-30 साल बर्बाद होने के बदले सुप्रीम कोर्ट में मुआवजा पाने हेतु  याचिका दायर की गयी लेकिन उसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज कर दिया गया।
    
प्रदूषित जल की समस्या और पेयजल की कमी के बारे में चिंता जाहिर करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पानी की समस्या को हल करने की जिम्मेदारी किसी एक संस्था की नहीं मानी जा सकती। लेकिन यह नहीं बताया कि इसके लिए कौन-कौन संस्था जिम्मेदार हैं। कम्पोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स के आंकड़े के अनुसार हर साल लगभग 3.77 लाख से अधिक लोग प्रदूषित पानी से गम्भीर बीमार पड़ते हैं। इनमें से 2 लाख से अधिक लोग असमय मौत के गाल में समा जाते हैं। 
    
भू-जल और नदियां भयानक रूप से प्रदूषित हो रही हैं। बिना मानकों के देश में इंडस्ट्री चल रही हैं। करोड़ों रुपए मुनाफा बटोरने वाली कम्पनियों के मालिक इंडस्ट्री के गंदे पानी को नदियों में खुलेआम बहा रहे हैं लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाती है। अधिकारी अपना लाभांश लेकर कानूनी खानापूर्ति कर देते हैं। खेती में रासायनिक खाद का मनमाने तरीके से इस्तेमाल किया जाता है लेकिन देश में ऐसा सिस्टम नहीं विकसित किया गया है कि खेत की मिट्टी की जांच कर जरूरत के अनुरूप खादों का इस्तेमाल किया जा सके। वैश्विक मानकों के हिसाब से भी इनका जल कहीं-कहीं जानलेवा बन चुका है। दिल्ली में यमुना नदी के गंदे काले पानी के बारे में कौन नहीं जानता, जिसके किनारे पर बनी सुप्रीम कोर्ट है जिसमें साहब की अदालत लगती है। सिस्टम में बैठे नेता व अधिकारी यमुना सफाई के नाम पर करोड़ों रुपए हजम कर गए लेकिन यमुना नदी का पानी जहर ही बना हुआ है।
    
ये वही साहब हैं जब इन्हीं की अदालत में खड़े होकर सिस्टम पर सवाल पूछने वाले एक वकील के बहाने उन्होंने सोशल मीडियाकर्मियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं आरटीआई कार्यकर्ताओं को काकरोच, मक्खी, परजीवी और सिस्टम पर हमला करने वाला बताया था।
    
मीठी-मीठी और लच्छेदार बातों से समस्याओं का निराकरण सम्भव नहीं है, आम मेहनतकश जनता के लिए पूरा सिस्टम खराब हो चुका है, सिस्टम ही बदलना होगा।।  
        -मुन्ना प्रसाद, मऊ
 

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