‘‘गंभीर भूल’’ बार-बार

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पिछले दिनों मुंबई उच्च न्यायालय और दिल्ली उच्च न्यायालय ने दो अलग-अलग मामलों में दोष सिद्ध न होने के कारण आरोपियों को बरी किया। 2006 के मुंबई ट्रेन धमाकों में मुंबई उच्च न्यायालय ने ‘गंभीर भूल’ कहते हुए सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में आरोपियों को बरी रखते हुए भी मामले को पुनः संज्ञान में लिया है। ताकि मकोका (महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम) के अन्य मामलों पर इसका असर न पड़े। दिल्ली उच्च न्यायालय ने कोरोना काल 2020 में तबलीगी जमात से जुड़े 70 लोगों पर दर्ज 16 एफआईआर को रद्द कर दिया। दोनों ही मामलों में आरोपी अल्पसंख्यक मुसलमान थे। जहां घटनाओं के समय राज्य की संस्थाओं से लेकर मीडिया द्वारा पहले से ही मुसलमानों को दोषी बताया गया वहीं लंबी न्यायिक प्रक्रिया में दोष मुक्त होने पर इसे उसने तवज्जो नहीं दी। इस तरह ‘‘गंभीर भूल’’ की कड़ी में दो अन्य मामले जुड़ गए।
    
यह मामले प्रशासनिक या न्यायिक प्रक्रिया के नहीं बल्कि राजनीतिक हैं। यह भारतीय राज्य व्यवस्था की अल्पसंख्यक विरोधी राजनीति के नमूने हैं। पहला मामला तब का है जब महाराष्ट्र और केंद्र में कांग्रेस गठबंधन की सरकार थी। दूसरा मामला कोरोना के समय देश में लगे कठोर लॉकडाउन के समय केंद्र की भाजपा सरकार के समय का है। आतंकी घटनाओं के समय देश में ऐसा माहौल बनाया जाता है कि आतंकी मुसलमान हैं। जिन्होंने पाकिस्तान की मदद से यह किया। थोड़ा कम क्रूरता के साथ जिसे कहा जाता है ‘‘भले ही हर मुसलमान आतंकी ना हो पर हर आतंकी मुसलमान होता है’’। जिसे बेधड़क ‘‘इस्लामिक आतंकवाद’’ कहा जाता है। यहां तक कि 2008 के मालेगांव, महाराष्ट्र धमाकों में भी पहले मुसलमानों को ही आरोपी मान गिरफ्तार किया गया। बाद में जाकर ही जांच में ‘अभिनव भारत’ से जुड़े प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित जैसे दोषियों को इसमें पकड़ा जा सका लेकिन इसे ‘‘भगवा आतंकवाद’’ कहने पर हाय-तौबा मचाई गई। आरोपियों के संघ-भाजपा से संबंधों पर पल्ला झाड़ लिया गया। हालांकि प्रज्ञा ठाकुर बाद में भाजपा से सांसद (2019-24) बनी। इस मामले में एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) ने अंतिम चार्ज शीट में प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित के खिलाफ फांसी की मांग की है।
    
2020 में कोरोना के समय तबलीगी जमात से जुड़े लोगों को कोरोना फैलाने का दोषी बताया गया। इस दुष्प्रचार के असर और लगातार झूठी खबरों के चलते मुसलमान फल-सब्जी विक्रेताओं या फेरी वालों के खिलाफ माहौल बनाया गया। महामारी फैलने में सरकारी लापरवाही की जगह सारा ठीकरा तबलीगी जमात के लोगों पर मढ़ दिया गया। इन झूठे आरोपों से हुए सामाजिक तिरस्कार के कारण उस समय हिमाचल के मोहम्मद दिलशाद (37 वर्ष) आत्महत्या करने पर मजबूर हुए। जो अपने अंतिम नोट में ‘‘मैं किसी का भी दुश्मन नहीं’’ लिखकर बेगुनाही की फरियाद कर चल बसे।
    
इन मामलों से पता चलता है कि देश की कानून व्यवस्था में अल्पसंख्यक मुसलमानों को दोषी मानकर कार्यवाही शुरू करना आम है। कांग्रेस काल में इस पर पुलिस जांच व अन्य कानूनी प्रक्रियाओं का प्रहसन भी हो जाता था पर भाजपा के शासन में कानूनी प्रक्रियाओं के बिना ही सब कुछ पहले मिनट से ही तय कर दिया जाता है। यहां जांच के आधार पर दोषी नहीं ढूंढे जाते बल्कि दोषी मानकर जांच शुरू की जाती है।
    
इन स्थितियों में जरूरी है कि ‘‘गंभीर भूल’’ के प्रति हमेशा सजग रहा जाए। शासकों की यह भूल जानबूझकर की जाने वाली आपराधिक भूलें हैं। जो आम मेहनतकशों सहित अल्पसंख्यक मुसलमानों से नफरत का नतीजा है।

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