ट्यूनेशिया: एक बार फिर लोग सड़कों पर

Published
Sun, 11/01/2026 - 07:50
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17 अक्टूबर को ट्यूनेशिया की राजधानी ट्यूनिश में एक बार फिर लोग सड़कों पर उतरे। खराब होती जीवन परिस्थितियों के बीच राजनीतिक आजादी पर लगे प्रतिबंधों के विरोध में यह प्रदर्शन हुआ। इस प्रदर्शन में मजदूर संगठन, वकील, पत्रकार, डाॅक्टर, बेरोजगार और राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ विपक्षी पार्टियां भी शामिल रहीं। 
    
प्रदर्शन के दौरान लग रहे नारे प्रदर्शन के उद्देश्यों को स्पष्ट व्यक्त कर रहे थे। ‘स्वतंत्रता के बिना लोकतंत्र नहीं’, ‘गरीबी के साथ गरिमा नहीं’ नारे बता रहे थे कि किस तरह राष्ट्रपति कैस सईद द्वारा 2021 में संसद को निलंबित कर और सरकार बर्खास्त कर ताकत अपने हाथ में लेने के बाद हालात खराब होते गये हैं। इन प्रदर्शनों में 2011 के विद्रोह के समय लगने वाला नारा ‘चुप्पी अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी’ दोहराया जा रहा है। 
    
दरअसल कैस सईद ने 2022 में नये संविधान के जरिये सत्ता को राष्ट्रपति पद में संकेंद्रित कर लिया है। ऐसे में राजनीतिक माहौल न केवल ट्रेड यूनियनों के लिए विपरीत होता चला गया वरन विपक्षी पार्टियों के लिए भी सत्ता पर पहुंचना मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में इस बार के प्रदर्शनों में सभी एक साथ अपने अंतर्विरोधों को दूर करते हुए शामिल हुए। यह 2011 के बाद का बड़ा प्रदर्शन माना गया है।   
    
इसके अलावा समाज में रोजमर्रा की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों और बेरोजगारी ने आम जनता को भी बार-बार सड़कों पर उतरने को बाध्य कर दिया है। 20 अगस्त को हुए प्रदर्शनों में तो लोग पानी, बिजली और दवाओं की कमी के विरोध में ही सड़कों पर उतरे थे। सितंबर माह में ईंधन परिवहन कर्मचारी वेतन की मांग और कामकाजी परिस्थितियों के खराब होने की वजह से सड़कों पर उतरे थे। 
    
आज ट्यूनेशिया में स्थिति 2011 के समय जैसी हो चुकी है। 2011 में हुए विद्रोह ने सालों से सत्ता में जमे राष्ट्रपति बेन अली को देश छोड़कर भाग जाने के लिए मजबूर कर दिया था। उसके बाद राजनीतिक हालात सुधरे, तानाशाही के घुटन भरे माहौल से मुक्ति मिली। लोगों ने एक बेहतर भविष्य की उम्मीद की। लेकिन पिछले 15 सालों में स्थिति खराब होती गयी है। न तो लोगों को रोजगार मिला, न आवश्यक वस्तुओं तक उनकी पहुंच सुधरी। सत्ता पर बेन अली की जगह पर कैस सईद तानाशाह के रूप में काबिज हो गया। 2011 में प्राप्त उपलब्धियां खोई जा चुकी हैं।
    
आखिर ट्यूनेशिया में ऐसा क्यों हुआ। वजह सीधी है 2011 के विद्रोह के बाद भी पूंजीवादी समाज का बने रहना। आज भी जब तमाम ट्रेड यूनियन, विपक्षी पार्टियां और अन्य लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं तो वे इस वजह से एकजुट हैं क्योंकि राष्ट्रपति ने सत्ता का केंद्रीकरण कर लिया है, ट्रेड यूनियनों के साथ होने वाले समझौते लागू नहीं हो रहे हैं और समाज में महंगाई और बेरोजगारी है। लेकिन पूंजीवादी समाज की ये अनिवार्य बुराइयां हैं। पूंजीवादी समाज के रहते इन बुराईयों को दूर नहीं किया जा सकता। इन सबसे तो केवल समाजवादी समाज ही निपट सकता है। और ट्यूनेशिया के लोगों को जब भी ये समझ में आएगा और तब उनकी एकजुटता से उनके जीवन में वास्तविक बदलाव आयेगा। 

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