कुछ साल पहले तक ‘डेरिवेटिव मार्केट’ भारत के उन मध्यमवर्गीय लोगों के लिए भी एक रहस्यमय चीज था जो शेयर बाजार में पैसा लगाते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है। ये मध्यमवर्गीय लोग इस बाजार को समझें या न समझें, वे इसमें धडल्ले से पैसा लगा रहे हैं और उतनी ही तेजी से पैसा गंवा रहे हैं। अनुमान लगाया गया है कि पिछले तीन सालों में ही इन लोगां ने करीब दो लाख करोड़ रुपये गंवाये हैं। यहां तक कि भारत सरकार द्वारा आर्थिक सर्वेक्षण में भी यह चिंता व्यक्त की गयी कि इस तरह के बाजार में पैसा लगाने वाले नब्बे प्रतिशत से ज्यादा लोग पैसा गंवा रहे हैं। ये सब ‘खुदरा व्यापारी’ या मध्यमवर्गीय लोग हैं।
लेकिन यदि ‘डेरिवेटिव मार्केट’ में मध्यमवर्गीय लोग पैसा गंवा रहे थे तो कमा कौन रहा था? इस बाजार की खासियत ही यह है कि इसमें यदि एक पैसा गंवायेगा तो दूसरा उतना ही कमायेगा- बिल्कुल जुए की तरह। यह पैसा कमाने वाले थे इस बाजार के बड़े खिलाड़ी। ये बड़े खिलाड़ी वे हैं जिन्हें संस्थागत निवेशक कहते हैं। इनमें देशी-विदेशी दोनों हैं। इस गोरखधंधे का एक बड़ा उदाहरण हाल में सामने आया - जेन स्ट्रीट प्रकरण के रूप में।
जेन स्ट्रीट अमेरिका की एक संस्थागत निवेशक कंपनी है जो इस तरह के बाजार में खरीद-फरोख्त कर पैसा कमाती है। इसका मालिक एक ऐसा बदनाम व्यक्ति है जिस पर तमाम किस्म के आरोप लगते रहे हैं। यह कंपनी छः देशों में दफ्तर खोल कर बैठी है पर भारत में उसका दफ्तर नहीं है। इस कंपनी ने भारत के ‘डेरिवेटिव बाजार’ में कुछ सालों में करीब छत्तीस हजार करोड़ रुपये कमाये। जब इस कंपनी का भारत में दफ्तर भी नहीं है तो उसने यह कैसे किया? यह उसने दूसरी कंपनियों के माध्यम से या उनके नाम से किया। पर उसने इतने सारे रुपये ईमानदारी से नहीं बल्कि घपला कर कमाये यानी जुए में भी बेईमानी। इस घपले का पता तब चला जब इसने खुद अमेरिका में एक दूसरी कंपनी पर मुकदमा दायर किया कि वह इसके व्यवसाय के तरीके की चोरी कर रही है।
घपले को समझने के लिए थोड़ी तकनीकी बात!
‘डेरिवेटिव मार्केट’ उसे कहते हैं जो किसी और चीज पर आधारित होता है। उदाहरण के लिए शेयर बाजार में शेयरों के दामों की गति का सूचक शेयर सूचकांक होता है। भारत में दो सूचकांक हैं : बंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स और राष्ट्रीय शेयर बाजार का निफ्टी। शेयर बाजार की आम गति के हिसाब से ये सूचकांक ऊपर-नीचे होते रहते हैं बल्कि इनका ऊपर-नीचे होना यह दिखाता है कि शेयर बाजार चढ़ रहा है कि गिर रहा है।
अब यदि इन सूचकांकों के ऊपर-नीचे होने पर सट्टेबाजी होने लगे तो उसे सूचकांक आधारित ‘डेरिवेटिव बाजार’ कहा जायेगा। इस बाजार की मौजूदगी को जायज ठहराने के लिए यह तर्क दिया जाता है कि शेयर बाजार में निवेश करने वाले यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनकी उम्मीद के विपरीत शेयर बाजार के ऊपर-नीचे होने पर उन्हें ज्यादा नुकसान न हो। यदि उन्होंने यह उम्मीद कर शेयर बाजार में पैसा लगाया है कि शेयरों के दाम चढ़ेंगे तो उनके गिरने पर उन्हें ज्यादा नुकसान न हो। इसका उलटा भी।
इसको करने का एक तरीका है शेयर सूचकांक आधारित फ्यूचर या आप्शन खरीदना। इन्हें शेयर सूचकांक आधारित ‘डेरिवेटिव इंस्ट्रूमेंट’ कहा जायेगा। फ्यूचर में कुछ दिनों बाद का अनुबंध होता है कि एक पक्ष एक निश्चित सूचकांक स्तर के ऊपर या नीचे होने पर एक निश्चित राशि का भुगतान दूसरे पक्ष को करेगा। आप्शन में आप्शन के खरीददार को यह छूट होती है कि वह अनुबंध को लागू करवाये या न करवाये। फ्यूचर में यह छूट नहीं होती यानी अनुबंध लागू होता ही है।
पिछले सालों में भारत सरकार ने भांति-भांति के फ्यूचर आप्शन के कारोबार को छूट दी है। हालत यह हो गयी है भारत आज संख्या के हिसाब से इस कारोबार में दुनिया के शीर्ष देशों में है। दाम के हिसाब से भारत काफी ऊपर के देशों में है। सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में भारत सबसे ऊपर है।
अब आयें जेन स्ट्रीट के घपले पर। राष्ट्रीय शेयर बाजार (एन एस ई) ने बैंकों के शेयर आधार पर एक सूचकांक आप्शन की अनुमति दी है। ये आप्शन एक हफ्ते की अवधि के होते हैं। यानी एक हफ्ते बाद अनुबंध समाप्त हो जायेगा। उसी दिन लेन-देन से उसका निपटारा हो जायेगा। जेन स्ट्रीट करता यह था कि वह दिन की शुरूआत में भारी मात्रा में बैंकों के शेयर खरीद लेता था। इससे इन बैंकों के शेयर आधारित सूचकांक चढ़ जाता था। दिन के अंत में वह इन शेयरों को बेच देता था जिससे यह शेयर सूचकांक धड़ाम से गिर जाता था। अब जेन स्ट्रीट ने पहले से ही सूचकांक के गिरने का आप्शन खरीद रखा होता था जिसे वह भुना लेता था। इस तरह वह शेयरों की खरीद-बेच और आप्शन की खरीद-बेच दोनों से मुनाफा कमा लेता है। चूंकि जेन स्ट्रीट बहुत बड़ी मात्रा में कारोबार करता था इसलिए सूचकांक में बहुत थोड़ा फर्क भी उसे भारी मात्रा में मुनाफा दे देता था। इस थोड़े से फर्क को आसानी से बाजार के मत्थे मढ़ा जा सकता था।
इस मामले में सबसे ज्यादा घपले की बात यह थी कि जेन स्ट्रीट अपने कारोबार के लिए भारतीय शेयर बाजार के ही सर्वर का इस्तेमाल करता था। इसको यह अनुमति भारतीय अधिकारियों की मिली-भगत के बिना नहीं मिली होगी।
इस मिलीभगत का ही परिणाम था कि जेन स्ट्रीट भारतीय बाजार से करीब छत्तीस हजार करोड़ रुपये लूटने के बाद महज 4843 करोड़ रुपये जमा कर बच निकलने में कामयाब रहा। ये रुपये दण्ड स्वरूप नहीं जमा किये गये हैं बल्कि मामले के अंतिम तौर पर खत्म हो जाने तक बस बाहर नहीं ले जाये जा सकते। इस सारे घपले के बाद जेन स्ट्रीट फिर पहले की तरह कारोबार कर रहा है।
जेन स्ट्रीट के घपले ने कुछ चीजों को ज्यादा तीखे ढंग से उजागर किया। पहला यह कि विदेशी सट्टेबाजी कंपनियां किसी दूसरी-तीसरी कंपनी के माध्यम से या उनके नाम से भारत में सट्टेबाजी कर सकती हैं और यहां लूटी हुई दौलत को बाहर ले जा सकती हैं, वह भी बिना कोई कर चुकाए। वह इसलिए कि वे उन देशों की फर्जी कंपनियों के जरिये भारत में कारोबार करती हैं जिनके साथ भारत सरकार का दोहरा कर न लगाने का अनुबंध है। जेन स्ट्रीट ने सिंगापुर से यह कारोबार किया। दूसरा यह कि ये सट्टेबाज कंपनियां धड़ल्ले से घपला करती हैं और यह करने के बाद आराम से बच निकलती हैं। तीसरा यह कि इस तरह के घपले में न केवल भारतीय अधिकारियों की बल्कि संस्थाओं की भी मिली भगत होती है। शेयर बाजार को नियमित करने वाली संस्था सेबी तथा एन एस ई की इस मामले में सीधी मिली भगत है। चौथी यह कि भारत का पूंजीपति वर्ग और उनकी ओर से उसकी सरकार इस सट्टेबाजी को हर तरीके से बढ़ावा दे रही है, यह भली-भांति जानते हुए कि इसमें भारी पैमाने का घपला होता है और छोटे निवेशक यानी मध्यमवर्गीय निवेशक तबाह होते हैं।
पिछले दिनों खबर आयी थी कि भारत में डी-मैट खातों की संख्या बीस करोड़ से ज्यादा है। डी-मैट खाते वे होते हैं जिनके माध्यम से शेयर बाजार तथा ‘डेरिवेटिव बाजार’ में कारोबार किया जाता है। भारत के मध्यम वर्ग की संख्या के हिसाब से भी इन खातों की संख्या बहुत ज्यादा है। ऐसा लगता है मानो हर मध्यमवर्गीय भारतीय शेयर बाजार में सट्टेबाजी कर रहा है और मजदूर वर्ग का ऊपरी हिस्सा भी इसमें लिप्त है।
पिछले दो-तीन दशकों से भारतीय शासकों ने एक मुहिम के तहत भांति-भांति की सट्टेबाजी को समाज में प्रोत्साहित किया है। इसमें शेयर बाजार (‘‘डेरिवेटिव बाजार’ सहित) की सट्टेबाजी प्रमुख है। संप्रग सरकार और भाजपा सरकार दोनों ने ही इसे खूब प्रोत्साहित किया है। इतना ही नहीं, उन्होंने लोगों को मजबूर किया है कि लोग इस सट्टेबाजी की ओर जायें। जब बैंकों में जमा पर ब्याज दर महंगाई दर से नीचे हो तो लोग कहीं और पैसा लगाने को मजबूर हो जायेंगे।
भारत में मालों (कच्चे तेल, धातुएं, इत्यादि) के बाजार में फ्यूचर-आप्शन की शुरूआत संप्रग सरकार के जमाने में हुई थी और आज भारत इस मामले में अग्रणी देशों में है। इसी तरह बाद में सूचकांक आधारित ‘डेरिवेटिव बाजार’ की भी शुरूआत हुई जो लगभग पूर्णतः सट्टेबाजी का बाजार है। कुल मिलाकर यह कानूनी सट्टेबाजी साल-दर-साल बढ़ती गयी है और आज भारत शीर्ष देशों में है।
अब सवाल यह उठता है कि भारत जैसे गरीब देश में, जहां मध्यम वर्गीय लोगों की भी आय इतनी कम है, सरकार द्वारा इस तरह की सट्टेबाजी को प्रोत्साहित क्यों किया जा रहा है। क्यों लोगों को न केवल ललचाया जा रहा है बल्कि मजबूर किया जा रहा है कि वे शेयर बाजार की सट्टेबाजी में जायें?
इसका उत्तर यही है कि सरकार जान बूझकर लोगों को सट्टेबाज या जुआरी बना रही है। जुआरी अपनी तबाही के लिए अपने को या अपनी किस्मत को दोष देता है। यदि वह किसी को अपनी तबाही के लिए कोसता भी है तो खुद को। जुए की लत लगने के बाद वह उसे आसानी से छोड़ नहीं पाता। उसका घर-बार बिक जाता है पर वह आखिरी उम्मीद में जुआ खेलता ही जाता है। महाभारत के युधिष्ठिर से लेकर आज के भारतीय मध्यम वर्ग तक इसकी लम्बी परंपरा है।
भारत सरकार क्यों चाहती है कि लोग जुआरी बनें? इसलिए कि वह न केवल लोगों की जिंदगी बेहतर नहीं कर पा रही है बल्कि वह सब कर रही है जिससे लोगों की जिन्दगी और बदतर हो। पिछले दिनों लगातार खबरें आ रही हैं कि भारत का मध्यम वर्ग सिकुड़ रहा है कि उसकी आय घट रही है, कि वह कर्जे में अधिकाधिक डूब रहा है। और यह तब जब बड़े पूंजीपति वर्ग का मुनाफा छप्पर फाड़ रहा है। उसकी पूंजी दिन-दूना रात चौगुना बढ़ रही है। ऐसे में वह मध्यम वर्ग को जुआरी बना कर उन्हें इस लायक नहीं रहने दे रही है कि वे अपनी खराब होती हालत पर ठहर कर सोच सकें। इसके कारणों में जा सकें तथा जिम्मेदार लोगों से सवाल कर सकें। नशेड़ी और जुआरी इस लायक नहीं बचते कि सोच सकें और सवाल कर सकें। इस तरह इस तबाही-बरबादी के जिम्मेदार यानी पूंजीपति वर्ग व उसकी सरकार सुरक्षित हो जाते हैं।
इतना ही नहीं, इनसे इन दोनों को आर्थिक फायदा भी होता है। मध्यमवर्गीय लोगों की सम्पत्ति इस जुए में बड़े पूंजीपतियों के पास चली जाती है। वे और दौलतमंद हो जाते हैं। सरकार इस जुए से भारी आय हासिल कर लेती है- कर के रूप में जो एक अनुमान के अनुसार केवल ‘डेरिवेटिव बाजार’ से पचास हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है। यहां तक कि सेबी भी इस बाजार से फीस के रूप में सालाना करीब डेढ़ हजार करोड़ रुपये वसूल लेता है।
जब शेयर बाजार के जुए से बड़े पूंजीपति वर्ग और उसकी सरकार को इतने सारे फायदे हों तो वे इसे बढ़ावा क्यों न दें? क्यों वे इसके घपलेबाजों को सजा दें?
लेकिन देश की अर्थव्यवस्था को जुआघर में तब्दील कर तथा देश की एक बड़ी आबादी को इसमें धकेल कर भारत का पूंजीपति वर्ग खुद ही यह साबित कर रहा है कि उसकी पूंजीवादी व्यवस्था बहुत दिन तक बने रहने की अधिकारी नहीं है।