चुनाव आयोग, हिंदू फासीवाद और ‘लोकतंत्र’

Published
Thu, 10/01/2026 - 15:50
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केंद्रीय चुनाव आयोग के भीतर की दरारों ने शासकों के ‘दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र’ होने के दावे की पोल पूरी तरह खोल दी है। आखिरकार यह सबके सामने उजागर ही हो गया कि इंदिरा गांधी के आपातकाल के बाद मोदी-शाह की जोड़ी किस हद तक चुनाव संचालित करवाने के मामले में भी ‘लोकतांत्रिक’ है। यह सब कुछ पता लगा इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट के हवाले से। 
    
इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग के दो अन्य चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में एसआईआर से जुड़े फैसलों पर कम से कम चैदह बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई हैं। इन आपत्तियों में फार्म-6 में ‘‘अवैध और अनधिकृत’’ बदलाव, मतदाता सूची डेटाबेस के केंद्रीकरण, ई.आर.ओ.नेट पोर्टल तक राज्य स्तरीय अधिकारियों तथा ई.आर.ओ. की पहुंच सीमित या खत्म किया जाना है तथा इसके अलावा इनका यह भी सवाल था कि प. बंगाल में 16.1 लाख अपीलों का आयोग की ओर से दायर करने का अधिकार आखिर किसे दिया गया। द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक, संधू ने अप्रैल में यह भी बताया कि उन्हें नए आईटी माड्यूल और पोर्टल बन जाने के बाद मीडिया से पता चला, जबकि जोशी ने मतदाता डेटाबेस के बढ़ते केंद्रीकरण पर आंतरिक आडिट का प्रस्ताव रखा, जिसका क्या हुआ, इसकी जानकारी उन्हें कभी नहीं दी गई।
    
इस जांच रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही जाहिर है इस पर हंगामा खड़ा होना ही था। विपक्षी पूंजीवादी पार्टियों ने इस मुद्दे को लपक लिया और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर डाली। साथ ही मोदी-शाह की जोड़ी पर भी एक हद तक चुनाव आयोग को कब्जे में कर फर्जी ढंग से चुनाव जीतने का आरोप लगाया। 
    
चुनाव आयोग ने अभी तक प्रेस कान्फ्रेंस करके इसका कोई जवाब नहीं दिया। शायद इस बीच डैमेज कंट्रोल की रणनीति बनाई जा रही हो। मगर लंपट हिंदू फासीवादी नेताओं ने चुनाव आयोग पर लगे आरोप को झुठलाने के लिए कमर कस ली। इनके जरिए कहा गया कि ये मतभेद दिखाते हैं कि यहां सब कुछ बहस-मुहाबसे से हो रहा था और यह लोकतांत्रिक तरीके को ही दिखाते हैं और अंततः फैसला सर्वसम्मति से ही हुआ है। यही बात फिर चुनाव आयोग के हवाले से भी कही गई। 
    
आखिरकार हिंदू फासीवादी सच बात को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने और अफवाह फैलाने में माहिर हैं। यही यहां भी किया गया। इनके पास इस बात का जवाब ही नहीं था कि आखिर दोनों चुनाव आयुक्तों ने फार्म 6 में संशोधन को सीधे संवैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन बताया था, इसका क्या? ये आपत्तियां सही हैं या गलत, इस पर भी चुप्पी साध ली गई। संघियों ने न ही बैठकों में मतभेद और फिर सर्वसम्मति से कोई फैसला होने के बारे में दस्तावेज में दिखाया। हालांकि इसके बावजूद प्रकिया संबंधी सवाल फिर भी बने रहते। चुनाव आयोग की बैठक के बाद जारी की गई प्रेस रिलीज भी इन सवालों के जवाब नहीं देती।
    
चुनाव आयोग के भीतर का विवाद, इस बात का सबूत है कि आयोग के भीतर जनवादी विचार-विमर्श की प्रक्रिया कतई नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, मोदी-शाह के आदेश पर मनमानेपन और निरंकुश तरीके से जो भी बन पड़ता है वह कर डालते हैं। दोनों अन्य आयुक्त अपनी आपत्तियां दर्ज कराते रह जाते हैं मगर इसका न कोई जवाब दिया जाता है न ही इसे सुना जाता है। हालांकि इनकी आपत्तियों के बावजूद हिंदू फासीवादियों के पक्ष में काम करने का इनके माथे पर दाग, धुलता नहीं।
    
जहां तक चुनाव आयोग के निष्पक्ष होने और विशुद्ध रूप से स्वतंत्र संवैधानिक संस्था होने का सवाल है तो ऐसा कभी भी नहीं रहा। न ही ऐसा संभव है। यह इसी पूंजीवादी जनतांत्रिक तंत्र या इस राज्य मशीनरी का एक अंग भर है। यह इसी के मातहत है। इसी रूप में इस शांति पूर्ण काल में पूंजीपति वर्ग के अलग-अलग हिस्सों से बनी पूंजीवादी पार्टियों के बीच निष्पक्ष, स्वतंत्र और साफ-सुथरे चुनाव आयोजित करवाना इसकी जिम्मेदारी है। 
    
इस संदर्भ में देखा जाये तो आजाद भारत में इसकी स्थिति शुरूवात से ही कमजोर रही है। शुरूवात से ही एकाधिकारी पूंजी ने कांग्रेस के जरिए सत्ता संचालन को आगे बढ़ाया। यह सब पांच-छः दशक तक रहा। इस पूरे दौर में चुनाव आयोग पर मुख्य चुनाव आयुक्त का नियंत्रण रहा। इस आयुक्त का चयन कैबिनेट की सलाह पर प्रधानमंत्री द्वारा किया जाता रहा। इस रूप में सत्ताधारी पार्टी का इस पर नियंत्रण बना रहा है। हालांकि इसके बावजूद चुनाव आयोजन आम तौर पर स्वतंत्र और निष्पक्ष कहे जा सकते थे। 
    
मगर पिछले 13-14 सालों से विशेषकर जब हिंदू फासीवादियों और एकाधिकारी पूंजी का गठजोड़ कायम हुआ। यह गठजोड़ बना ही था- सत्ता संचालन को फासीवादी निरंकुशता से चलाने के लिए। इस दिशा में ही फिर चीजें आगे बढ़ी हैं। चुनाव संचालन में भी धीमे-धीमे यही चीज दिखने लगी। पहले चुनाव में खुले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर चुनाव आयोग ने मौन साध लिया। जिसने इसका विरोध किया, उसे किनारे कर दिया गया। आम तौर पर निष्पक्ष, स्वतंत्र माने जाने वाले चुनावों में 2019 और इसके बाद के प्रांतीय चुनावों में केंद्रीय स्तर से गड़बड़ियों के आरोप लगने लगे। 2022-23 के प्रांतीय चुनावों और फिर 2024 के आम चुनावों में यह और ज्यादा स्पष्ट हुआ। 
    
चूंकि इस बीच अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में दिए गए फैसले (2015) के आधार पर तीन सदस्यीय चुनाव आयोग का गठन और इसके मुख्य चुनाव आयुक्त का चयन- सत्ता पक्ष, नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश के द्वारा किए जाने का निर्देश; सर्वोच्च न्यायालय ने दिया। मगर मोदी सरकार ने इसे रद्द करके मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन में सत्ता पक्ष का बहुमत बना दिया और फिर चुनाव आयोग के तीनों आयुक्त विशेषकर मुख्य चुनाव आयुक्त खुलकर मोदी-शाह के इशारे पर बिना डरे खुलकर काम कर सकें, इसके लिए नया कानून ही 2023 में बना दिया गया। इसके हिसाब से अपने कार्यकाल में किए गए कारनामों के लिए चुनाव आयुक्तों पर कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है।
    
यहीं से फिर चुनाव आयोग ने हिंदू फासीवादियों की चुनावी जीत को सुनिश्चित करने का काम बेशर्मी से किया। 2025 में तो यह सीधे-सीधे विशेष गहन पुनरीक्षण (एस आई आर) के रूप में सामने आ गया। इसके बाद से अब तक गंगा में काफी पानी बह चुका है
    
एस आई आर हिंदू फासीवादियों के लिए ऐसा औजार था जिसके जरिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के साथ ही अपने मन पसन्द मतदाताओं का चुनाव किया जा सकता था और विपक्षी पार्टियों के मतदाताओं के मतदान के अधिकार को किनारे किया जा सकता था। इसके जरिए नागरिकता पंजीकरण यानी एन आर सी को भी आगे बढ़ाया जा सकता था। आम नागरिकों में हर वक्त संदेह, डर और असुरक्षा का वातावरण बनाकर अपने आगे-पीछे नाचने को विवश किया जा सकता था। एस आई आर के जरिए हिंदू फासीवादियों और चुनाव आयोग ने देश के नागरिकों की नागरिकता को स्वयंमेव संदिग्ध घोषित कर दिया और मतदाता शुद्धिकरण के नाम पर नागरिकता (मतदाता) साबित करने का बोझ जनता पर डाल दिया। 
    
चुनावी प्रतिनिधित्व, पूंजीवादी लोकतंत्र का बुनियादी आधार है। हिंदू फासीवादियों ने इस आधार पर ही एस आई आर के जरिए हमला किया। इसे चुनावी निरंकुशता वाले हिंदू फासीवादी राज्य की दिशा में ले जाने के हर संभव प्रयास किए हैं और पूंजीवादी लोकतंत्र को खोखला कर देने के हर जतन किए हैं।
    
एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।
    
दिल्ली के एक मामले से मतदाताओं की छंटनी किस तरह की गई होगी, इसे समझा जा सकता है। मामला चांदनी चैक विधानसभा क्षेत्र के बेला एस्टेट (Bela Estate) के झुग्गी-झोपड़ी क्लस्टर का है। एस आई आर से पहले इस मतदान केंद्र पर कुल 729 मतदाता पंजीकृत थे। एस आई आर के बाद यहां सिर्फ एक मतदाता दिखाया गया बाकी 728 में से 632 मतदाताओं को ‘स्थायी रूप से स्थानांतरित’, 42 को मृत, 10 को डुप्लीकेट, 1 को अनुपस्थित, और 43 को ‘अन्य (जैसे हस्ताक्षर करने से इनकार, विध्वंस) श्रेणी में रखा गया। जबकि इन 728 मतदाताओं में से 550 अभी भी उसी जगह मौजूद हैं। इसमें हिंदू-मुस्लिम दोनों ही हैं। सभी ने फार्म 6 के जरिए फिर मतदाता होने के लिए आवेदन किया मगर स्थायी निवास प्रमाण पत्र नहीं होने का तर्क देकर इन्हें फिर खारिज कर दिया गया। क्योंकि बस्ती को पहले ही सरकार ने अवैध अतिक्रमण बताकर 2023 में ही ध्वंस कर दिया था।
    
एस आई आर की यह प्रक्रिया स्वयं में असंवैधानिक थी। मगर हिंदू फासीवादियों के प्रभाव और दबदबे या फिर स्वयं जज के इसी मानसिकता के होने के चलते इसे संवैधानिक घोषित कर दिया गया। इसके बाद तो एक ओर चुनाव आयोग नागरिकों और नागरिक अधिकारों से खिलवाड़ करता रहा तो दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट इस पर अपनी मुहर लगाता रहा। 
    
अब चुनाव आयोग के बीच वर्तमान मतभेद ने इसे और ज्यादा स्पष्ट कर दिया है। चुनाव आयोग ने बिल्कुल अपारदर्शी, बिना जवाबदेही और जिम्मेदारी के इसे अंजाम दिया है। इसमें कदम-कदम पर गड़बड़ियां हैं, मनमर्जी है। फार्म 6 में 2002-03 की सूची से बाहर रहे मतदाताओं के लिए खुद को इससे या पुरानी विरासत से जोड़ने को अनिवार्य बना देने का प्रावधान भी, गैर कानूनी है और असंवैधानिक है। इसे संसद की मंजूरी के बिना नहीं किया जा सकता था। इसी तरह फार्म 6, केवल नए मतदाताओं के लिए था, उसे ही वोटर लिस्ट से गायब किए गए करोड़ों मतदाताओं के लिए भी आवेदन करने के लिए अनिवार्य कर दिया गया। यह भी असंवैधानिक है। पहले यह फार्म 8 से बेहद आसानी से होता था। इसलिए कानूनी तौर पर पहले मतदाता रहे नागरिक को इस फार्म 6 में खुद को पहली बार के मतदाता के रूप में दर्ज करना होगा। इसलिए गैर कानूनी हो जाने, विरासत से जोड़ने आदि के कारण मतदाता सूची से हटाए गए नागरिकों द्वारा फार्म 6 के इस्तेमाल की दर नगण्य है।
    
चुनाव आयोग के पास सूचना अधिकार के तहत या सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता द्वारा एस आई आर के बारे में मांगी जाने वाली कई महत्वपूर्ण जानकारियां ही उपलब्ध नहीं हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण सवाल है- एस आई आर का फैसला कब हुआ और किसने किया। चुनाव आयोग के पास इस बारे में कोई जानकारी या फाइल नहीं है। इसी तरह चुनाव आयोग के पास बैठकों के कार्यवृत्त (मुद्दों) फैसलों के भी कोई भी दस्तावेज नहीं हैं। 
    
इस तरह आज आम नागरिकों के लिए बड़ा संकट नागरिकता को बचाने और मतदान के अधिकार को बचाने के रूप में सामने है। विपक्षी पूंजीवादी पार्टियों के लिए यह सत्ता में भागीदारी करने या सत्ता को हासिल करने का जरिया है। इनका संघर्ष, चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और सजा की मांग तथा मोदी-शाह को निशाने पर लेने के रूप में ही हो सकता है। इस्तीफा और सजा जरूरी है। इस संघर्ष को हिंदू फासीवादियों के खिलाफ संघर्ष में बदले बिना स्थिति में विशेष फर्क नहीं पड़ने वाला। संघर्ष को अंततः हिंदू फासीवाद और एकाधिकारी पूंजी के गठजोड़ के खिलाफ केंद्रित करना होगा। वर्तमान संकट और विविध आयामों की तात्कालिक जड़ यही हैं। यह गठजोड़ ही समाज को फासीवादी बर्बरता और भीषण सामाजिक विस्फोट की ओर धकेल रहा है। इससे भी आगे बढ़कर यह संकट, पूंजीवादी व्यवस्था के गहन संकट की ही अभिव्यक्ति है। संकट का अंतिम समाधान पूंजीवाद की समाप्ति और समाजवाद की स्थापना में ही है। 

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