अमेरिकी सरगना डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने नेतृत्व में एक नये संगठन का एलान किया है। इस संगठन का नाम ‘बोर्ड आफ पीस’ रखा गया है। गाजा शांति पहल के लिए पहले इस तरह के मंच की रूपरेखा प्रस्तावित की गयी थी। पर ट्रम्प इसे नये अंतर्राष्ट्रीय ढांचे की शक्ल देने को तत्पर नजर जा रहे हैं।
ट्रम्प वैसे तो इस पहल को वैधानिकता प्रदान करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से इसके 17 नवंबर को पारित होने की बात करते हैं। पर वास्तव में वे संयुक्त राष्ट्र के समानान्तर नया अंतर्राष्ट्रीय ढांचा बना अमेरिकी वर्चस्व को नये सिरे से संस्थागत करना चाहते हैं।
ट्रम्प के अनुसार बोर्ड आफ पीस एक नया अंतर्राष्ट्रीय संगठन होगा जिसका एक अंतरिम प्रशासनिक ढांचा होगा। ट्रम्प के शब्दों में यह ‘अब तक गठित होने वाला सबसे प्रभावशाली व निर्णायक वैश्विक बोर्ड’ होगा।
अमेरिकी साम्राज्यवादियों के अनुसार यह बोर्ड इजरायल व हमास के बीच हुए संघर्ष विराम के दूसरे चरण पर काम करेगा। यह बोर्ड रणनीतिक निगरानी करेगा। अंतर्राष्ट्रीय संसाधन जुटायेगा व जवाबदेही सुनिश्चित करेगा। यह गाजा को शांति व विकास की राह पर आगे बढ़ायेगा।
ट्रम्प ने इस बोर्ड की कार्यकारी समिति में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, मध्य पूर्व के लिए अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, ट्रम्प के दामाद व व्यवसायी जेरेड कुशनर, विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा, अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट के सीईओ मार्क रोवन व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार राबर्ट गैब्रियल को शामिल किया है।
यह कार्यकारी बोर्ड गाजा के प्रशासन के लिए गठित ‘नेशनल कमेटी फॉर द एडमिनिस्ट्रेशन आफ गाजा’ की निगरानी करेगा। ट्रम्प ने इस बोर्ड में शामिल होने के लिए ढेरों देशों को आमंत्रण दिया है। पाकिस्तान, जार्डन, ग्रीस, साइप्रस, कनाडा, हंगरी, तुर्की, मिश्र, पराग्वे, अर्जेंटीना व अल्बानिया, भारत आदि 60 देशों को इसमें शामिल होने का आमंत्रण दिया है। पाकिस्तान ने शामिल होने पर सहमति दी है। कतर, मिश्र, तुर्की संघर्ष विराम के निगरानीकर्ता होने के नाते इस बोर्ड में शामिल होंगे।
पहले इस बोर्ड आफ पीस को गाजा के मामले तक सीमित माना जा रहा था पर अब इसके चार्टर व संरचना से लग रहा है कि ट्रम्प खुद का नया संयुक्त राष्ट्र संघ खड़ा कर रहे हैं। यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र के उलट तेजी से अमेरिकी हित में वैश्विक शांति कायम करने का प्रयास करेगा। बोर्ड में स्थायी सदस्यता पाने के लिए एक अरब अमेरिकी डालर का योगदान करना होगा। जबकि 3 वर्ष हेतु अस्थायी सदस्यता के लिए कोई धन नहीं देना होगा। खुद डोनाल्ड ट्रम्प इस बोर्ड के प्रारंभिक अध्यक्ष होंगे। साथ ही वे अमेरिका के प्रतिनिधि भी होंगे। ट्रम्प को अध्यक्ष पद से दो ही तरीके से हटाया जा सकता है। पहला वे खुद इस्तीफा दें। दूसरा बोर्ड के सभी सदस्य सर्वसम्मति से उन्हें अक्षम घोषित करें। दूसरी स्थिति में भी बोर्ड का अध्यक्ष वही बनेगा जिसे ट्रम्प नामित करें। इस तरह ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति रहें चाहे न रहें, बोर्ड पर उन्हीं का वर्चस्व बना रहेगा। सदस्य देशों को बोर्ड के चार्टर से बंधे रहने की सहमति देनी होगी।
जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने नवम्बर 25 में गाजा हेतु इस बोर्ड आफ पीस को मान्यता दी थी तो बोर्ड का कार्यकाल 2027 तक सीमित था। तब उसमें बाकी शर्तें नहीं थीं। पर ट्रम्प के इरादे व स्थायी-अस्थायी सदस्यता का प्रावधान इसे नया अंतर्राष्ट्रीय संगठन बनाने के लगते हैं।
22 जनवरी को ट्रम्प ने दावोस में बोर्ड आफ पीस के संस्थापक चार्टर पर हस्ताक्षर समारोह आयोजित किया। अमेरिका के अलावा 19 देशों ने इस पर हस्ताक्षर किये। अभी यूरोपीय संघ, चीन, भारत, जापान, रूस आदि देशों ने ट्रम्प का आमंत्रण स्वीकार नहीं किया है। अंतिम खबर मिलने तक 26 देश इसमें शामिल हो चुके हैं।
आने वाले वक्त में पता चलेगा कि ट्रम्प की यह योजना, कितना परवान चढ़ती है। फिलहाल ट्रम्प तटकर की धमकी देकर देशों को इसमें शामिल करने में जुटे हैं। ट्रम्प इस नये मंच के जरिये अमेरिकी वर्चस्व को संस्थागत बनाने के पूरे प्रयास कर रहे हैं।
ट्रम्प के ये प्रयास दुनिया में अमेरिकी वर्चस्व को मिल रही चुनौती और बढ़ रही अंतर साम्राज्यवादी प्रतियोगिता को ध्यान में रखकर देखे जाने चाहिए। चीनी साम्राज्यवादियों के विकास ने अमेरिका को हैरान-परेशान कर दिया है। इसी के चलते बौखलाहट में ट्रम्प अमेरिका के वर्चस्व को बनाये रखने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं।