बोर्ड आफ पीस : वर्चस्व का नया केन्द्र

Published
Sun, 02/01/2026 - 07:00
/board-of-peace-varchasv-ka-naya-kendra

अमेरिकी सरगना डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने नेतृत्व में एक नये संगठन का एलान किया है। इस संगठन का नाम ‘बोर्ड आफ पीस’ रखा गया है। गाजा शांति पहल के लिए पहले इस तरह के मंच की रूपरेखा प्रस्तावित की गयी थी। पर ट्रम्प इसे नये अंतर्राष्ट्रीय ढांचे की शक्ल देने को तत्पर नजर जा रहे हैं। 
    
ट्रम्प वैसे तो इस पहल को वैधानिकता प्रदान करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से इसके 17 नवंबर को पारित होने की बात करते हैं। पर वास्तव में वे संयुक्त राष्ट्र के समानान्तर नया अंतर्राष्ट्रीय ढांचा बना अमेरिकी वर्चस्व को नये सिरे से संस्थागत करना चाहते हैं। 
    
ट्रम्प के अनुसार बोर्ड आफ पीस एक नया अंतर्राष्ट्रीय संगठन होगा जिसका एक अंतरिम प्रशासनिक ढांचा होगा। ट्रम्प के शब्दों में यह ‘अब तक गठित होने वाला सबसे प्रभावशाली व निर्णायक वैश्विक बोर्ड’ होगा। 
    
अमेरिकी साम्राज्यवादियों के अनुसार यह बोर्ड इजरायल व हमास के बीच हुए संघर्ष विराम के दूसरे चरण पर काम करेगा। यह बोर्ड रणनीतिक निगरानी करेगा। अंतर्राष्ट्रीय संसाधन जुटायेगा व जवाबदेही सुनिश्चित करेगा। यह गाजा को शांति व विकास की राह पर आगे बढ़ायेगा। 
    
ट्रम्प ने इस बोर्ड की कार्यकारी समिति में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, मध्य पूर्व के लिए अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, ट्रम्प के दामाद व व्यवसायी जेरेड कुशनर, विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा, अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट के सीईओ मार्क रोवन व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार राबर्ट गैब्रियल को शामिल किया है। 
    
यह कार्यकारी बोर्ड गाजा के प्रशासन के लिए गठित ‘नेशनल कमेटी फॉर द एडमिनिस्ट्रेशन आफ गाजा’ की निगरानी करेगा। ट्रम्प ने इस बोर्ड में शामिल होने के लिए ढेरों देशों को आमंत्रण दिया है। पाकिस्तान, जार्डन, ग्रीस, साइप्रस, कनाडा, हंगरी, तुर्की, मिश्र, पराग्वे, अर्जेंटीना व अल्बानिया, भारत आदि 60 देशों को इसमें शामिल होने का आमंत्रण दिया है। पाकिस्तान ने शामिल होने पर सहमति दी है। कतर, मिश्र, तुर्की संघर्ष विराम के निगरानीकर्ता होने के नाते इस बोर्ड में शामिल होंगे। 
    
पहले इस बोर्ड आफ पीस को गाजा के मामले तक सीमित माना जा रहा था पर अब इसके चार्टर व संरचना से लग रहा है कि ट्रम्प खुद का नया संयुक्त राष्ट्र संघ खड़ा कर रहे हैं। यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र के उलट तेजी से अमेरिकी हित में वैश्विक शांति कायम करने का प्रयास करेगा। बोर्ड में स्थायी सदस्यता पाने के लिए एक अरब अमेरिकी डालर का योगदान करना होगा। जबकि 3 वर्ष हेतु अस्थायी सदस्यता के लिए कोई धन नहीं देना होगा। खुद डोनाल्ड ट्रम्प इस बोर्ड के प्रारंभिक अध्यक्ष होंगे। साथ ही वे अमेरिका के प्रतिनिधि भी होंगे। ट्रम्प को अध्यक्ष पद से दो ही तरीके से हटाया जा सकता है। पहला वे खुद इस्तीफा दें। दूसरा बोर्ड के सभी सदस्य सर्वसम्मति से उन्हें अक्षम घोषित करें। दूसरी स्थिति में भी बोर्ड का अध्यक्ष वही बनेगा जिसे ट्रम्प नामित करें। इस तरह ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति रहें चाहे न रहें, बोर्ड पर उन्हीं का वर्चस्व बना रहेगा। सदस्य देशों को बोर्ड के चार्टर से बंधे रहने की सहमति देनी होगी। 
    
जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने नवम्बर 25 में गाजा हेतु इस बोर्ड आफ पीस को मान्यता दी थी तो बोर्ड का कार्यकाल 2027 तक सीमित था। तब उसमें बाकी शर्तें नहीं थीं। पर ट्रम्प के इरादे व स्थायी-अस्थायी सदस्यता का प्रावधान इसे नया अंतर्राष्ट्रीय संगठन बनाने के लगते हैं। 
    
22 जनवरी को ट्रम्प ने दावोस में बोर्ड आफ पीस के संस्थापक चार्टर पर हस्ताक्षर समारोह आयोजित किया। अमेरिका के अलावा 19 देशों ने इस पर हस्ताक्षर किये। अभी यूरोपीय संघ, चीन, भारत, जापान, रूस आदि देशों ने ट्रम्प का आमंत्रण स्वीकार नहीं किया है। अंतिम खबर मिलने तक 26 देश इसमें शामिल हो चुके हैं। 
    
आने वाले वक्त में पता चलेगा कि ट्रम्प की यह योजना, कितना परवान चढ़ती है। फिलहाल ट्रम्प तटकर की धमकी देकर देशों को इसमें शामिल करने में जुटे हैं। ट्रम्प इस नये मंच के जरिये अमेरिकी वर्चस्व को संस्थागत बनाने के पूरे प्रयास कर रहे हैं। 
    
ट्रम्प के ये प्रयास दुनिया में अमेरिकी वर्चस्व को मिल रही चुनौती और बढ़ रही अंतर साम्राज्यवादी प्रतियोगिता को ध्यान में रखकर देखे जाने चाहिए। चीनी साम्राज्यवादियों के विकास ने अमेरिका को हैरान-परेशान कर दिया है। इसी के चलते बौखलाहट में ट्रम्प अमेरिका के वर्चस्व को बनाये रखने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं। 

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?