विश्व आर्थिक मंच और अन्य जगहों पर बढ़ रहा टकराव

Published
Sun, 02/01/2026 - 07:00
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2025 के अंत और 2026 की शुरूआत में दुनिया एक और ऊंचे स्तर के टकराव से गुजर रही है। पुराने गठबंधनों में दरार आ रही है और नये गठबंधनों के बनने की प्रक्रिया तेज हो रही है। इसकी एक बड़ी अभिव्यक्ति दावोस में विश्व आर्थिक मंच के वार्षिक शीर्ष सम्मेलन में स्पष्टतया दिखाई पड़ी। 
    
इस सम्मेलन में कनाडा के प्रधानमंत्री के भाषण ने सनसनी फैला दी। कनाडा के प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘नियम आधारित विश्व व्यवस्था’ का खात्मा हो रहा है। यह नियम आधारित विश्व व्यवस्था अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा संचालित विश्व व्यवस्था है। इसके समर्थक कनाडा और पश्चिमी यूरोप के देश रहे हैं। इस व्यवस्था के तहत अमरीकी साम्राज्यवादी दुनिया भर में अपनी मनमानी करते रहे हैं और कनाडा तथा यूरोपीय देश इसका लाभ उठाते रहे हैं। दुनिया भर में अमरीकी साम्राज्यवादियों का प्रभुत्व था और वे जब चाहते थे अपनी नापसंद सरकार का तख्तापलट करा देते थे और उनके इन कदमों का कनाडा और पश्चिमी यूरोप के देश समर्थन करते व ऐसे कामों में अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ भागीदारी करते। 
    
लेकिन अब ट्रम्प प्रशासन के दौरान अमेरिका ने यूरोपीय साम्राज्यवादियों सहित सभी दोस्तों और दुश्मनों पर तटकर थोप दिये हैं। इसके अलावा ट्रम्प सत्ता में आते ही कनाडा को बार-बार अपमानित कर रहे हैं। उन्होंने कनाडा को अमरीका का 51वां राज्य घोषित कर दिया। उन्होंने तत्कालीन कनाडाई प्रधानमंत्री को कनाडा का गवर्नर कह कर संबोधित किया। वे कनाडा से होने वाले निर्यात पर तटकर बढ़ा चुके हैं। वे कनाडा की सरकार को अपनी धुन पर नचाने की हरचंद कोशिश कर रहे हैं। 
    
अभी तक कनाडा अमरीकी साम्राज्यवादियों का सबसे करीबी और पड़ोसी देश रहा है। कनाडा और अमरीका की सीमा 8800 किमी. लम्बी है। इन दोनों देशों के बीच बेरोकटोक आवाजाही रही है। कनाडा की सत्ता अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ गठबंधन का फायदा उठाकर अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को अंजाम देती रही है। वह दुनिया भर के खनिज भण्डारों के दोहन से भारी मुनाफा बढ़ाने में कनाडाई एकाधिकारी पूंजीपतियों की सरपरस्ती करती है। 
    
अब जब ट्रम्प इसकी कीमत वसूल करने के लिए कमर कस चुके हैं तो कनाडाई साम्राज्यवादी तिलमिला गये हैं। वे अब यह कह रहे हैं कि नियम आधारित विश्व व्यवस्था का अंत हो गया है। वह अब काम नहीं कर रही है। उनके अनुसार, बड़ी शक्तियां छोटी शक्तियों को, मजबूत, कमजोर को दबाने में लगे हैं। वे कनाडा को मध्यम आकार की शक्ति घोषित करते हैं और यूरोपीय देशों को भी बड़ी शक्तियों के सामने घुटने न टेकने की बात करते हैं। कनाडा के प्रधानमंत्री यूरोपीय देशों के साथ गठबंधन बनाने और अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ मिल जुलकर समझौता वार्ता करके सौदेबाजी करने की बात करते हैं। उनका कहना है कि यदि ‘‘मध्यम शक्तियां’’ एकजुट होकर समझौते की मेज पर नहीं आतीं तो उनका विनाश निश्चित है। 
    
कनाडा के प्रधानमंत्री ने ये सारे तर्क यूरोपीय साम्राज्यवादियों को झकझोरने के इरादे से दिये थे। कनाडा के प्रधानमंत्री की इन बातों ने तालियां तो बटोरीं लेकिन यूरोपीय साम्राज्यवादी अमरीकी साम्राज्यवादियों के समक्ष तत्काल डटकर खड़ा होने की स्थिति में नहीं थे। 
    
वहीं डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने धमकी भरे अंदाज में विश्व आर्थिक मंच में यूरोपीय साम्राज्यवादियों से कहा कि वे ग्रीनलैण्ड को लेकर रहेंगे। ग्रीनलैण्ड यदि उनके पास नहीं होगा तो यह रूस और चीन के पास होगा। यह ट्रम्प होने नहीं देंगे। यूरोप का जो भी देश उनकी इस योजना का विरोध करेगा, उस पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त तटकर लगा दिया जायेगा। ग्रीनलैण्ड डेनमार्क का स्वायत्त हिस्सा है। 
    
ग्रीनलैण्ड पर अमरीकी साम्राज्यवादियों के रुख से यूरोपीय साम्राज्यवादी बौखला गये हैं। वे अमरीकी साम्राज्यवादियों के विरुद्ध नाटो के यूरोपीय देशों की सामूहिक सैन्य कार्रवाई के विकल्प पर विचार कर रहे हैं। लेकिन अमरीकी साम्राज्यवादियों की सैन्य ताकत का वे अभी मुकाबला करने की स्थिति में नहीं हैं। 
    
ट्रम्प ने दावोस के मंच से खुलेआम यह कहा कि उन्होंने ही यूरोपीय नाटो देशों से जोर देकर कहा था कि वे अपने रक्षा बजट को बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद का 2 प्रतिशत करें। अब वे इसे 5 प्रतिशत करने की मांग कर रहे हैं। 
    
ट्रम्प नाटो देशों को यह साफ-साफ संदेश दे रहे हैं कि रूस-यूक्रेन युद्ध का खर्च वे उठायें। इतना ही नहीं, वे रूस-यूक्रेन युद्ध को रोकने की  समझौता वार्ता में ‘नाटो देशों’ को शामिल नहीं कर रहे हैं। 
    
ट्रम्प यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेन्स्की को धमकी देकर कह रहे हैं कि समूचे दोनबास इलाके को वह रूस को सौंप दे। जेलेन्स्की यूरोपीय साम्राज्यवादियों की तरफ मदद की निगाहों से देख रहे हैं और जब उन्हें उनकी अपेक्षा के अनुरूप आर्थिक व सैनिक मदद नहीं मिल रही है तो वे नाटो और यूरोपीय संघ के देशों को मदद नहीं करने पर कोस रहे हैं। दावोस में जेलेन्स्की ने यूरोपीय संघ और नाटो देशों को खरी-खोटी सुनाई। इसका असर नाटो देशों पर यह पड़ा कि उन्होंने जेलेन्स्की को एहसानफरामोश तक कह डाला। इटली और अन्य देशों ने यहां तक कह दिया कि वे अपने देश में भारी जन-विरोध के बावजूद, अपने सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों में कटौती करके यूक्रेन की आर्थिक व सैनिक मदद कर रहे हैं लेकिन उनकी मदद यूक्रेन में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही है। 
    
यूरोपीय संघ के देशों ने यूक्रेन को 90 अरब यूरो की आर्थिक व सैन्य सहायता देने का संकल्प लिया था। अब जब रूस के आक्रमण यूक्रेन पर बढ़ गये हैं और यूक्रेन के हथियार व गोला-बारूद व वायु रक्षा प्रणाली खत्म हो रही है तब यूक्रेन ने यूरोपीय संघ के देशों से हथियार देने की मांग की। फ्रांस ने कह दिया कि उसके गोला-बारूद का भण्डार पहले से ही कम हो गया है और उसे पहले अपने देश की रक्षा करनी है। उसने यूक्रेन को जो सैन्य मदद देने का वायदा किया था, उसे वह अपने देश में हथियारों के उत्पादन पर खर्च करेगा, जब फ्रांस में हथियारों का उत्पादन बढ़ जायेगा, तब यूक्रेन की सैन्य मदद होगी। फ्रांस दूसरे देशों से हथियार खरीद कर यूक्रेन की मदद नहीं कर पायेगा। इसी प्रकार, जर्मनी ने पैट्रियट मिसाइल रक्षा प्रणाली को अब और देने से इंकार कर दिया। 
    
ट्रम्प ने दावोस में अपने भाषण में यूरोपीय देशों को लताड़ते हुए कहा कि यूरोपीय देशों के नेता उन्हें अंतर्राष्ट्रीय कानून और न्याय को मानने का उपदेश दे रहे हैं। लेकिन क्या वे यह भूल गये कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद क्षत-विक्षत यूरोप के पुनर्निर्माण में मार्शल प्लान के तहत अमरीका ने उनको खड़ा किया था। मैक्रोन अपने देश को संभाल नहीं पा रहे हैं और ट्रम्प को उपदेश दे रहे हैं। 
    
ट्रम्प और उनके विदेश सचिव मार्को रूबियो ने दावोस में अमरीका की ताकत का बखान किया और कहा कि अमरीका दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत है। वह दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है। यदि अमरीका मजबूत रहेगा तो यूरोप भी मजबूत व सुरक्षित रहेगा। रूबियो ने दम्भ भरे लहजे में कहा कि ट्रम्प ने दुनिया के आठ संघर्ष के केन्द्रों में शांति स्थापित की। ट्रम्प की तारीफ में उन्हें ‘‘मैन आफ एक्शन’’ कहा। 
    
ट्रम्प अब संयुक्त राष्ट्र संघ संस्था को दरकिनार कर रहे हैं। वे उसके विकल्प के रूप में ‘बोर्ड आफ पीस’ का गठन कर चुके हैं। इस ‘बोर्ड आफ पीस’ के स्थायी अध्यक्ष ट्रम्प खुद होंगे। मार्को रूबियो के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र संघ खाली प्रस्ताव पारित करने वाली संस्था रह गयी है। जबकि बोर्ड आफ पीस एक कार्य करने वाली संस्था होगी। ट्रम्प पहले ही संयुक्त राष्ट्र संघ की 60 से ज्यादा संस्थाओं से बाहर हो चुके हैं। ट्रम्प की बोर्ड आफ पीस की शुरूवात गाजा के पुनर्निर्माण की योजना से होगी। इस बोर्ड का सदस्य देश होने के लिए 1 अरब डालर का योगदान करना होगा। 
इस बोर्ड आफ पीस का विरोध यूरोपीय संघ के देशों ने किया है। दावोस में इस बोर्ड आफ पीस के बारे में भी ट्रम्प और मार्को रूबियो ने शेखी बघारी। 
    
इधर जहां ट्रम्प अमरीकी साम्राज्यवाद को फिर से प्रभुत्वशाली स्थिति में लाने के लिए जी-तोड़ प्रयास कर रहे हैं, वहीं अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिमी गोलार्द्ध को विशेष अमरीकी प्रभाव का क्षेत्र बनाने के लिए प्रयासरत हैं। 
    
दूसरी तरफ यूरोपीय संघ और कनाडा जैसी साम्राज्यवादी ताकतें अपने को गोलबंद कर रही हैं। 
    
अमरीकी साम्राज्यवादियों और कनाडा व यूरोपीय संघ के देशों का गठबंधन बनाने की भी कोशिश हो रही है। इस तरह, पश्चिमी साम्राज्यवादियों के बीच दरार बढ़ती जा रही है। 
    
तीसरी तरफ, रूस, चीन और ईरान का एक गठबंधन भी बनता जा रहा है। इसमें उत्तरी कोरिया भी शामिल है। इसके विस्तार के रूप में ब्रिक्स प्लस और शंघाई सहकार संगठन जैसे देश हैं। 
    
अमरीकी साम्राज्यवादियों ने वेनेजुएला पर आक्रमण और उसके राष्ट्रपति का अपहरण करके दुनिया के संसाधनों पर कब्जा करने के लिए किसी भी देश के भीतर जाकर कुछ भी अपराध करने का अपना इरादा स्पष्ट कर दिया। अभी वह वेनेजुएला के कार्यवाहक राष्ट्रपति को धमकी देकर अपने अनुकुल ढालने की तरकीब अपना रहे हैं। ये क्यूबा में तख्तापलट की धमकी दे रहे हैं। 
    
उनकी इस धमकी से दक्षिणी अमरीका में व्यापक भय का माहौल बन रहा है। लेकिन जिस पश्चिमी गोलार्द्ध को अमरीकी साम्राज्यवादी अपने विशेष प्रभाव क्षेत्र में ढालना चाहते हैं, वहां पहले से ही चीनी साम्राज्यवादियों का व्यापक आर्थिक प्रभाव कायम हो चुका है। उक्त इलाके से चीनी साम्राज्यवादियों को बाहर करना काफी मुश्किल होगा। 
    
इधर पश्चिम एशिया में रोजाना ईरान पर हमले की धमकी अमरीकी साम्राज्यवादी दे रहे हैं। ईरान की हुकूमत भी अमरीकी हमले का जवाब देने के लिए तैयार है। अरब देशों के शासक अभी तक अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ खड़े थे। लेकिन उनमें से कई यह कह चुके हैं कि अमरीकी साम्राज्यवादी ईरान पर हमले के लिए उनके क्षेत्र- जमीनी, हवाई या जल- का इस्तेमाल नहीं करेंगे। अमरीकी साम्राज्यवादियों ने बड़े पैमाने पर ईरान की घेरेबंदी कर दी है। 
    
इस तरह हम देख सकते हैं कि दुनिया में अधिकाधिक तनाव व विग्रह बढ़ते जा रहे हैं। इसमें सबसे हालिया तनाव अमरीका और पश्चिमी यूरोप और कनाडा जैसे साम्राज्यवादियों के बीच बढ़ा है। 
    
दूसरे, अन्य साम्राज्यवादियों रूस और चीन के साथ पहले से भी प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। 
    
उधर चीनी साम्राज्यवादियों ने इस मंच में वैश्वीकरण के समर्थन में वक्तव्य दिया। चीनी उपप्रधानमंत्री ने चीन को दुनिया को स्थिरता भरा विकास की राह दिखाने वाला कहा। उन्होंने तटकर थोपने की अमेरिकी हरकतों को व्यापार व अर्थव्यवस्थाओं में गिरावट पैदा करने वाला बताया। उन्होंने विश्व व्यापार संगठन व आई एम एफ के आधार पर विश्व व्यवस्था व व्यापार के संचालन की वकालत की। उन्होंने द्विपक्षीय व बहुपक्षीय व्यापार समझौते विश्व व्यापार संगठन की शर्तों के अनुकूल होने की बात कही। 
    
इस तरह आज चीनी साम्राज्यवादी वैश्वीकरण की दुहाई दे रहे हैं जबकि अमेरिकी साम्राज्यवादी व्यापार बाधित करने वाले तटकर थोप रहे हैं। चीनी साम्राज्यवादी अपनी उन्नत तकनीक के दम पर दुनिया भर के देशों में व्यापार लाभ की स्थिति में है इसीलिए वे वैश्वीकरण की दुहाई दे मुक्त व्यापार के समर्थक बने हुए हैं, जबकि अमेरिकी साम्राज्यवादी संरक्षणवादी कदम उठा रहे हैं। दोनों ताकतें अपने वर्चस्व की खातिर दुनिया को अपने हित में अलग-अलग दिशा में बढ़ाना चाहती हैं। इसी के चलते इनके बीच अंतरविरोध बढ़ रहे हैं। 
    
इन सब अंतरविरोधों से उपजने वाले तनावों से दुनिया एक बड़े युद्ध की ओर जा सकती है। यह आगामी युद्ध जहां एक ओर बड़े पैमाने पर तबाही लायेगा, वहीं यह दुनिया की मजदूर-मेहनतकश आबादी को जागरूक व शिक्षित करने की भी संभावना लिए हुए है। मजदूर-मेहनतकश आबादी के सचेत हिस्से साम्राज्यवादियों के आदमखोर चरित्र को और ज्यादा गहराई से समझेंगे और अपनी मुक्ति के संग्राम को आगे बढ़ायेंगे। 

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