सूफी कवि से संघी नफरत

Published
Sun, 02/01/2026 - 07:00
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बुल्लेशाह 18वीं सदी के महान सूफी कवि व दार्शनिक थे। 24 जनवरी को मसूरी स्थित इनकी दरगाह को हिंदू रक्षा दल के लम्पटों ने तोड़ डाला। मजार-दरगाह तोड़ने-फोड़ने के मामले में पुष्कर धामी ने उत्तराखण्ड को देश में पहले स्थान पर पहुंचा दिया है। 
    
आखिर सूफी कवियों की दरगाहों से इन संघी ताकतों को क्या दिक्कत है। दरअसल भक्ति काल के कवि हों या सूफी धारा के कवि इन्होंने अपने जमाने में हिन्दू-मुसलमान एकता की बात करते हुए हिन्दू-मुस्लिम धार्मिक पोंगापंथियों का विरोध किया। कबीर से लेकर बुल्लेशाह ने रूढिवादी कट्टर पंडितों व कट्टर मुल्लाओं का विरोध किया। इन्होंने ईश्वर-अल्लाह को एक बताया और मंदिरों-मस्जिदों द्वारा किये जा रहे पाखण्ड व शोषण का विरोध किया। इस तरह इन्होंने सामंती जमाने में धर्म द्वारा आम जन के सामंती शोषण के विरोध में जागरूकता फैलाने का काम किया। 
    
बुल्लेशाह-कबीर जैसों को जीते-जी धार्मिक पोंगापंथियों का तीखा विरोध झेलना पड़ा और मरने के बाद भी धार्मिक पोंगापंथी इनसे इनके विचारों से भय खाते रहे। बुल्लेशाह को इस्लामी कट्टरपंथियों ने काफिर कह कर अपमानित किया। यहां तक कि इन इस्लामी कट्टरपंथियों ने उनकी जान तक लेने की कोशिश की। अंत में इन्हें एक गुरूद्वारे में शरण मिली। 
    
बुल्लेशाह न केवल कट्टरपंथियों के विरोधी थे बल्कि समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव के भी विरोधी थे। बुल्लेशाह मानवतावादी-समानता-सहिष्णुता चाहने वाले कवि थे। उनके पोंगापंथ विरोधी व असमानता विरोधी नज्मों के चलते फैज से लेकर भगत सिंह और आज के प्रगतिशील लोगों में वे भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश में लोकप्रिय हैं। 
    
ऐसे में हिन्दू-मुसलमान साम्प्रदायिकता के पक्षपोषक, जाति समर्थक संघ के लिए बुल्लेशाह ही नहीं समस्त सूफी धारा ही दुश्मन सरीखी है। बुल्लेशाह की लोकप्रिय नज्में हिन्दू फासीवादियों की विभाजनकारी राजनीति-साम्प्रदायिक राजनीति पर चोट करती है। सहज ही है कि ये कूपमण्डूक संघी इन सूफी कवियों को अपने निशाने पर लें। ये इन्हें निशाने पर लेने में भी भूल जाते हैं कि सूफी कवियों को हिन्दू-मुसलमान बराबरी से मानते रहे हैं। सूफी कवियों की मजारों पर हमला करने के लिए इनके लिए आसान रास्ता यही है कि वे इन्हें मुसलमान श्रेणी में शामिल कर खारिज करें। 
    
पहले इन संघी ताकतों ने मसूरी में बुल्लेशाह की दरगाह के सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण का आरोप लगाया। बाद में जब प्रशासन ने जांच की तो पाया गया कि यह दरगाह एक निजी स्कूल की भूमि पर स्थित है। इस तरह दरगाह किसी सरकारी भूमि का अतिक्रमण कर नहीं बनायी गयी थी। पर जब अवैध निर्माण का आरोप सच नहीं साबित हुआ तो हिन्दू रक्षा दल के लम्पटों ने दरगाह तोड़़ने का खुद जिम्मा ले लिया। हद तो तब हो गयी जब इसके प्रमुख पिंकी चौधरी ने खुद इस तोड़फोड़ का वीडियो साझा कर न केवल इस कार्य की सराहना की बल्कि दावा किया कि उनकी टीम ने बुल्लेशाह को जो 70 वर्षों से देवभूमि में थे, वापस पाकिस्तान भेज दिया। 
    
जिस राज्य में मुख्यमंत्री खुद ढूंढ-ढूंढ कर मजार-दरगाह तोड़ता फिर रहा हो। फर्जी लैंड जिहाद का नारा दे रहा हो। वहां हिन्दू रक्षा दल के लम्पटों का उक्त कृत्य कहीं से अजीब नहीं लगता। जाहिर है इन लम्पटों को भरोसा है कि मोदी-धामी राज में कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इस मामले में भी एफआईआर दर्ज हुई है पर खबर लिखे जाने तक पुलिस ने कोई गिरफ्तारी नहीं की है। 
    
साम्प्रदायिक सौहार्द के प्रतीक बुल्लेशाह की दरगाह पर हमला कर संघी लम्पटों ने दिखा दिया कि वे तालिबानियों से कम क्रूर नहीं हैं। किसी जमाने में तालिबानियों ने अफगानिस्तान में बुद्ध की प्राचीन प्रतिमाओं को ढहाया था तो हिन्दू फासीवादी भारत में मस्जिदें-दरगाह-मजार ढहाने में जुटे हैं। भविष्य में इन्हें मौका मिलेगा तो ये देश में मुसलमान शासकों के द्वारा बनायी गयी सारी प्राचीन इमारतों को या तो मन्दिर घोषित कर देंगे या फिर ढहा देंगे। 
    
वैसे ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा देने वाली संघ-भाजपा को आजकल देशव्यापी ‘सबका विनाश’ का सुर चढ़ा है। ये हर ओर लोगों के घर-बस्तियां बुलडोजर से ढहाने में जुटे हैं। बुलडोजर इनके विकास का प्रतीक बन चुका है। 

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