जनवरी 2026 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनियम, 2026’ जारी किया है। ये नियम उच्च शिक्षा में जाति, धर्म, दिव्यांगता और लैंगिक भेदभाव से निपटने के दावे के साथ बनाये गये हैं। दावे किए जा रहे हैं कि यह एस सी/एस टी और ओ बी सी छात्रों पर उच्च शिक्षण संस्थानों में होने वाले भेदभाव, उत्पीड़न आदि को रोक देगा। हिंदू राष्ट्रवादियों के कुछ प्रचारकों ने कैंपस में होने वाले जातिगत भेदभाव के खिलाफ इस विनियमन के क्रांतिकारी होने के दावे भी किए हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने विरोध के चलते इन पर रोक लगा दी है।
कहा जा रहा है कि इसके नियम दशकों पुराने 2012 के प्रावधानों की जगह ले रहे हैं और ये भेदभाव की शिकायतों के निपटारे के लिए एक ढांचा पेश करते हैं। इसके हिसाब से हर उच्च शिक्षण संस्थान में एक ‘समान अवसर केंद्र’ और ‘समता समिति’ बनाना अनिवार्य किया गया है। शिकायत मिलने पर तेजी से कार्रवाई का वादा किया गया है और नियम तोड़ने वाले संस्थानों को गंभीर दंड देने की बात कही गई है। इसके प्रावधान में एससी, एसटी, ओबीसी समुदाय को विशेष तौर पर केन्द्रित किया गया है।
अब कुछ भाजपाई और संघी तथा सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त सवर्ण इसका विरोध भी कर रहे हैं। इसे जातिवाद को बढ़ावा देने वाला बता रहे हैं या सामान्य वर्ग यानी सवर्णों के खिलाफ इस्तेमाल किए जाने का डर दिखाकर इस पर हंगामा कर रहे हैं। इनका यह भी कहना है कि इन्हें इसमें कोई संरक्षण नहीं है।
सवाल यह है कि हिंदू राष्ट्रवादी जो अपने सवर्ण हिंदू वर्चस्व बोध से लैस हैं क्या वास्तव में उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव के सख्त खिलाफ हैं? क्या वास्तव में वे इस पर लगाम लगाना चाहते हैं? नहीं! वास्तव में इनका ऐसा इरादा नहीं हो सकता है और न ही ये ऐसा सोच भी सकते हैं। इस विनियमन का नियंत्रित विरोध हिंदू राष्ट्रवादियों के फायदे में ही होगा। एस सी/एस टी और ओबीसी के बीच यह संदेश जायेगा कि हिंदू फासीवादी सरकार उनके पक्ष में है। सवर्णों के बीच अपने आधार को संघी अपने मुस्लिम विरोध और ई डबल्यू एस आरक्षण के जरिए बनाये रखेंगे।
इस विनियमन के अंतर्गत नियम कहते हैं कि पीड़ित व्यक्ति की शिकायत जल्दी निपटाई जाएगी। आनलाइन शिकायत करने का भी नियम है। 24 घंटे के भीतर समता समिति की बैठक करके ‘उचित’ कारवाई करने की बात की गई है। समिति प्रमुख को 7 कार्य दिवसों के अंदर संस्थान के नियमों के अनुसार अंतिम कार्रवाई शुरू करनी होगी। समिति मामले की जांच करेगी और 15 कार्य दिवसों के अंदर अपनी रिपोर्ट संस्थान के प्रमुख (कुलपति/प्राचार्य) को सौंपेगी। कमेटी में तीन सदस्य (प्रोफेसर/वरिष्ठ संकाय सदस्य) संस्थान से ही होंगे। व्यवसायिक अनुभव रखने वाले दो नागरिक समाज के प्रतिनिधि होंगे। दो विशेष आमंत्रित छात्र प्रतिनिधि होंगे। जरूरत पड़ने पर समता समूह गठित किए जा सकते हैं, समता दूत नामित किए जाएंगे। इसके समान अवसर केन्द्र का समन्वयक सचिव के पद पर होगा। यदि शिकायत खुद संस्थान के प्रमुख के खिलाफ है, तो समिति की बैठक की अध्यक्षता समान अवसर केंद्र के समन्वयक करेंगे और रिपोर्ट प्रमुख के उच्चाधिकारी को भेजी जाएगी। समता समिति के पदेन अध्यक्ष संस्थान के प्रमुख ही होंगे। समिति में ‘‘अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए।’’ ये नियम यह नहीं बताते कि निष्पक्ष जांच कैसे होगी। सबूत क्या माने जाएंगे? गवाहों और शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा कैसे होगी? इन सवालों के जवाब नहीं दिए गए हैं।
उपरोक्त समता समिति, समता स्क्वायड और समता दूत ये बिल्कुल फासीवादी धारणा के हिसाब से बने हैं। जैसे संघ और भाजपा में सब कुछ मनोनीत होता है वही आलम यहां भी है। समता समिति के सदस्यों से लेकर समता दूत तक सभी मनोनीत होंगे। इस तरह वास्तव में यहां एस सी/एस टी और ओबीसी आदि से प्रतिनिधत्व बेहद कमजोर होगा। जो होगा भी वह इनके रंग में ही रंगा होगा। इस समुदाय (एस सी/एस टी, ओबीसी महिला) के छात्रों का प्रतिनिधित्व निश्चित नहीं है यह समता समिति की मर्जी पर निर्भर करेगा।
इन नियमों की दूसरी और सबसे बड़ी कमी यह है कि ये पूरे शिकायत निवारण तंत्र में संस्थान के अंदर के ही लोगों को बैठाते हैं। हर संस्थान की ‘समता समिति’ की अध्यक्षता खुद उस संस्थान का प्रमुख यानी कुलपति या प्रिंसिपल करेगा। समिति के अन्य सदस्य भी उसी संस्थान के प्रोफेसर या अधिकारी होंगे। इसका मतलब साफ है : संस्थान को खुद ही खुद की जांच करनी है। संस्थान की खुद की कमेटियों, जिसमें ऊपर के लोगों का ही वर्चस्व होता है, वे आम तौर पर अपने ही साथ के पदाधिकारियों के खिलाफ नहीं जाती हैं और मामले को खारिज कर देती हैं या फिर लीपापोती करती हैं।
इस मामले में भी जब शिकायत संस्थान के प्रमुख या उनके करीबी, प्रभावशाली लोगों के खिलाफ होगी, तो क्या कोई आंतरिक समिति निष्पक्ष रिपोर्ट दे पाएगी? जवाब ‘न’ में है। संस्थानों में शक्ति का ढांचा बहुत स्पष्ट होता है। छात्रों को ग्रेड, सर्टिफिकेट और भविष्य की नौकरी के लिए संस्थान पर निर्भर रहना पड़ता है। जूनियर फैकल्टी को पदोन्नति, रिसर्च फंड और नौकरी की सुरक्षा के लिए वरिष्ठों की मर्जी पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे माहौल में, भेदभाव का शिकार हुआ व्यक्ति कैसे उम्मीद कर सकता है कि उसकी शिकायत की निष्पक्ष सुनवाई होगी, खासकर तब जब आरोपी ताकतवर हो? यह डर ही ज्यादातर लोगों को चुप करा देता है। नए नियम इस डर को खत्म करने के बजाय, और मजबूत करते हैं क्योंकि अब शिकायत दर्ज कराने का मतलब है संस्थान की पूरी ताकत के सामने खड़े हो जाना, जिसके पास जांच का नियंत्रण है।
ये नियम इसलिए भी बेअसर साबित होने हैं क्योंकि उच्च शिक्षा पर सवर्ण वर्चस्व मौजूद है। देश के ज्यादातर प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और कालेजों में शीर्ष पदों यानी कुलपति, डीन, प्रमुख अधिकारी ज्यादातर सवर्ण समुदाय से ही आते हैं। फैकल्टी में भी यही अनुपात बना हुआ है। आरक्षण के नियम होने के बावजूद एससी/एसटी व ओबीसी के लोग प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष जैसे पदों पर कम ही दिखाई देते हैं। जब नियम बनाने वाली संस्था यूजीसी और नियम लागू करने वाले संस्थानों पर एक ही सामाजिक वर्ग का दबदबा हो, तो क्या उम्मीद की जा सकती है कि वह खुद अपने खिलाफ कार्रवाई करेगा? स्पष्टतः नहीं। यह वर्चस्व सिर्फ जाति तक सीमित नहीं है, बल्कि आज तो हिंदू फासीवादी विचारधारा वाले तत्वों की इसमें भरमार है। पिछले कुछ वर्षों में देश के तकरीबन 80 प्रतिशत केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति संघी पृष्ठभूमि से ही हुई है। इसका मतलब यह भी हुआ कि संस्थान अब स्वतंत्र शैक्षणिक संस्थाएं नहीं बल्कि हिंदू फासीवादी एजेंडा लागू करने वाले केंद्र बन गए हैं।
नए नियम संस्थानों के लिए कड़े दंड का प्रावधान करते हैं, जैसे- यूजीसी फंड बंद करना, डिग्री देने का अधिकार रोकना या मान्यता ही रद्द कर देना। लेकिन यह सब भी आम तौर पर सिर्फ कागजी दिखावा ही साबित होगा। पहली बात, यूजीसी पहले ही अपनी ग्रांट देने की शक्ति खो चुका है। अब ज्यादातर फंडिंग ‘हायर एजुकेशन फाइनेंसिंग एजेंसी’ (भ्म्थ्।) के जरिए आती है, जो कर्ज के रूप में मदद देती है। ऐसे में, ‘ग्रांट रोकने’ की धमकी का कोई मतलब ही नहीं रह जाता। दूसरी बात, क्या सरकार या यूजीसी वाकई किसी बड़े संस्थान की मान्यता रद्द कर देगी? ऐसा होना लगभग नामुमकिन है, खासकर तब जब वह संस्थान सरकार के एजेंडे को आगे बढ़ा रहा हो। असल में, इन नियमों का इस्तेमाल छोटे, कमजोर संस्थानों पर दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है, जबकि बड़े और प्रभावशाली संस्थान बिना किसी डर के अपना काम करते रहेंगे।
कुल मिलाकर उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव को खत्म करने के नाम पर यह नया विनियमन हिंदू फासीवादियों द्वारा एक ओर आगामी चुनावों में अपने पक्ष में एस सी/एस टी और ओबीसी समुदाय को भ्रमित करके गोलबंद करने तो दूसरी ओर उच्च शिक्षण संस्थानों पर अपने नियंत्रण को और बढ़ाने के लिए है ताकि वहां अपने खिलाफ बन रहे माहौल को नियंत्रित किया जा सके।
उच्च शिक्षा में बढ़ते जातिगत भेदभाव- लैंगिक भेदभाव को देखते हुए जरूरी है कि न केवल इस भेदभाव को रोकने के नियम बनें बल्कि वे सही तरीके से लागू भी हो सकें, इसका भी इंतजाम हो। मौजूदा विनियमन भेदभाव करने वाले वि.वि. अधिकारियों को ही इन्हें लागू करने का जिम्मा दे देता है। ऐसे में जब तक इन्हें लागू करने वाली समता समिति व समान अवसर केन्द्र में दबी-कुचली जातियों के जागरूक शिक्षकों-छात्रों-कर्मचारियों का वर्चस्व नहीं होगा तब तक कुछ खास सकारात्मक बदलाव की उम्मीद नहीं की जा सकती। इसलिए इन नियमों से व्यवहार में कुछ सार्थक परिणाम तक पहुंचाने के लिए छात्रों-शिक्षकों को काफी संघर्ष करना पड़ेगा।
जहां तक सवर्ण मानसिकता के लोगों द्वारा इसके विरोध का प्रश्न है तो उनका विरोध ही यह दिखाता है कि जातिगत वर्चस्व वाले लोग किसी भी कीमत पर अपना वर्चस्व छोड़ने को तैयार नहीं हैं। और क्यों इस दिशा में संघी लुभावने कदमों की जगह वास्तविक बदलाव भरे कदमों की भारी जरूरत है। तभी शिक्षा समता पैदा करने वाली बन सकती है। अन्यथा तो संघी शासन में जब समाज में सवर्ण वर्चस्व बढ़ रहा हो तो कैम्पसों में इसे बढ़ने से कोई नियम रोक नहीं सकते।