दंगा -गोरख पाण्डेय

(1)
आओ भाई बेचू आओ
आओ भाई अशरफ आओ
मिल-जुल करके छुरा चलाओ

मालिक रोजगार देता है
पेट काटकर छुरा मंगाओ
फिर मालिक की दुआ मनाओ
अपना-अपना धरम बचाओ
मिल-जुल करके छुरा चलाओ
आपस में कटकर मर जाओ
आओ भाई तुम भी आओ
तुम भी आओ तुम भी आओ
छुरा चलाओ धरम बचाओ
आओ भाई आओ आओ ! 

(2)
छुरा भोंककर चिल्लाये-
‘हर-हर शंकर’
छुरा भोंककर चिल्लाये-
‘अल्लाहो-अकबर’
शोर खत्म होने पर
जो कुछ बचा रहा
वह था छुरा
और बहता लोहू...

(3)
इस बार दंगा बहुत बड़ा था
खूब हुई थी
खून की बारिश
अगले साल अच्छी होगी
फसल मतदान की।           (1978)
 

आलेख

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