हल्द्वानी हिंसा : सरकार के साम्प्रदायिक एजेण्डे का परिणाम

8 फरवरी को हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में फैली हिंसा ने सबको हतप्रभ कर दिया। इस हिंसा में 200-300 लोगों के घायल होने और 5-6 लोगों के मारे जाने की खबरें सामने आ रही हैं। मरने वालों की संख्या बढ़ने की खबरें भी सामने आ रही हैं। धामी सरकार की अतिक्रमण हटाने के नाम पर वर्षों से बसी आबादी को उजाड़ने की जिद ने बीते एक वर्ष से पूरे प्रदेश में जनता को परेशान कर रखा है। आये दिन बुलडोजर से बस्ती उजाड़ना इस सरकार का प्रिय शगल बन चुका है। प्रदेश में कई बस्तियां उजाड़ हजारों लोगों के सिर से छत छीनी जा चुकी है और लाखों लोग कभी भी सिर से छत छीने जाने की आशंका में जी रहे हैं और क्षमता भर ताकत से अपने आशियाने बचाने के लिए अदालत से लेकर सड़कों पर सरकार से लड़ रहे हैं। 
    
सरकार की अतिक्रमण हटाने की जिद के शिकार वैसे तो पूरे प्रदेश के बाशिंदे बन रहे हैं पर  सबसे ज्यादा इसके शिकार मजदूर-मेहनतकश बन रहे हैं। लालकुंआ में उजाड़ी गयी नगीना कालोनी के ज्यादातर निवासी गरीब मजदूर-मेहनतकश ही थे। इसी के साथ संघ-भाजपा की फासीवादी मंसूबों से लैस सरकार मुस्लिम अल्पसंख्यकों की रिहायश-पूजा स्थलों को विशेष तौर पर निशाने पर ले रही है। आये दिन अवैध अतिक्रमण के नाम पर मजारें ध्वस्त करने की खबरें प्रसारित कर हिन्दू फासीवादी यह प्रचारित करने में जुटे हैं कि मुस्लिम ही ज्यादातर अतिक्रमणकारी हैं। इस तरह सरकार प्रदेश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण कर आगामी लोकसभा चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत बनाना चाहती है। अतिक्रमण हटाने के नाम पर उत्तराखण्ड को हिन्दुत्व की नई प्रयोगशाला बनाने पर सरकार तुली है। 
    
एक ऐसे प्रदेश में जहां एक बड़ी आबादी वर्षों से वन भूमि-नजूल भूमि पर काबिज है। जहां वक्त-वक्त पर सरकारें-नेता-ठेकेदार ऐसी जगहों पर लोगों को बसाते रहे हैं और भारी कमाई करते रहे हैं वहां होना तो यह चाहिए था कि सरकार कोई नीति घोषित कर इन जगहों पर लोगों को मालिकाना हक दे देती पर धामी सरकार पूरे प्रदेश की बड़ी आबादी खासकर अल्पसंख्यकों के सिर से छत छीनने का तुगलकी कारनामा करने में जुटी है। प्रदेश के न्यायालय भी लोगों के सर से छत उजाड़ने की सरकारी मुहिम में सरकार के साथ खड़े हैं। 
    
इन्हीं परिस्थितियों में सरकार की इस नीति और स्थानीय प्रशासन की साम्प्रदायिक उकसावेबाजी के शिकार बनभूलपुरा के निवासी हो गये और हिंसक हो उठे। उनका धैर्य चुक गया। सम्भव है कि कुछ अल्पसंख्यक कट्टरपंथी तत्वों ने भी उन्हें उकसाने का काम किया हो। बनभूलपुरा के कुछ युवा धैर्य खो अतिक्रमण हटाने गयी नगर निगम की टीम व पुलिस बल पर पथराव में जुट गये पुलिस ने प्रत्युत्तर में गोलियां चलाईं और इससे हिंसा और भड़क उठी। बड़े पैमाने पर आगजनी भीड़ द्वारा की गयी। पुलिस फायरिंग में 5-6 लोग मारे गये। पुलिस बल और स्थानीय निवासी बड़ी संख्या में घायल हुए। 
    
3-4 फरवरी को जब पहली बार नगर निगम की टीम बनभूलपुरा स्थित मलिक के बगीचे पर कब्जे व वहां स्थित मस्जिद-मदरसे को ढहाने गयी तो भी वहां की जनता ने बड़ी संख्या में जुट कर प्रशासन की इस कार्यवाही का विरोध किया था। तब प्रशासन की टीम उक्त स्थल को सील कर वापस लौट गयी थी। प्रशासन द्वारा हटाये जा रहे इस अतिक्रमण के विरोध में कुछ स्थानीय लोग अदालत में गये जहां 14 फरवरी को इस मामले की सुनवाई होनी थी। पर प्रशासन ने उक्त तारीख तक इंतजार करने के बजाय 8 फरवरी को बगैर किसी खास तैयारी के मस्जिद-मदरसा ढहाने की घटना अंजाम दे दी। प्रशासन ने इस बात का भी ख्याल नहीं किया कि धार्मिक स्थल ढहाने से लोग आक्रोशित हो सकते हैं। लोगों के गुस्से को और भड़काने का काम स्थानीय नगर निगम के अफसरों ने भी किया। एक अन्य मुस्लिम इलाके में गौशाला खोलने का स्थानीय निवासी विरोध कर रहे थे। स्थानीय निवासी इस आशंका से ग्रस्त थे कि गौशाला खोलने के बहाने उनके खिलाफ भविष्य में गायों के साथ अन्याय-हिंसा आदि के आरोप मढ़ साम्प्रदायिक वैमनस्य पैदा किया जा सकता है जैसा कि कुछ माह पूर्व हल्द्वानी में ही एक मुस्लिम युवक पर गौवंश से अप्राकृतिक यौन सम्बन्ध बनाने का झूठा आरोप मढ़ साम्प्रदायिक माहौल पैदा कर दिया गया था। लोग गौशाला किसी अन्य स्थान पर बनाये जाने की मांग कर रहे थे। पर नगर निगम के जिम्मेदार अफसर ने अनर्गल बयानबाजी करते हुए जबरन वहीं गौशाला बनवा दी। एक के बाद एक घटनाओं ने स्थानीय निवासियों को उस ओर ढकेला जहां 8 फरवरी को वो हिंसा पर उतारू हो गये। हालांकि अब बनभूलपुरा के स्थानीय निवासियों की ये बातें भी सामने आ रही हैं कि पहले पुलिस बल ने बर्बरतापूर्वक महिलाओं पर लाठीचार्ज किया फिर युवा पत्थरबाजी पर उतारू हुए। इस हिंसा के शिकार पुलिस बल व पत्रकार भी हुए।
    
फिर भी इस तरह की हिंसा को न तो जायज ठहराया जा सकता है और न ही इसका पक्ष लिया जा सकता है। ऐसी हिंसा दोनों धर्मों के कट्टरपंथी ताकतों को वैमनस्य बढ़ाने का मौका दे देती है, अफवाहों का बाजार गरम कर उस पर राजनीतिक रोटियां सेंकने, दंगे भड़काने वाले सक्रिय हो जाते हैं। अब ऐसे वक्त में साम्प्रदायिक सौहार्द और शांति बनाये रखना, अफवाहों को फैलने से रोकना प्राथमिक कार्य बन जाता है। 
    
पर साथ ही इस हिंसा के लिए सरकार व स्थानीय प्रशासन जिस तरह स्थानीय लोगों को ही एकतरफा तौर पर बगैर जांच किये दोषी ठहरा रहे हैं और जिस तरह से अपनी अतिक्रमण हटाओ नीति और इरादों को पाक साफ घोषित कर रहे हैं, उस पर भी सवाल खड़े किये जाने चाहिए। सवाल उठता है कि प्रशासन को उक्त धार्मिक स्थल को ढहाने की इतनी जल्दबाजी क्यों थी कि उसने 14 फरवरी की अदालती कार्यवाही का इंतजार तक नहीं किया। सवाल यह भी उठता है कि गौशाला प्रकरण में अनर्गल बयानबाजी करने वाले अफसर पर कार्यवाही क्यों नहीं हुई। एकतरफा तौर पर स्थानीय लोगों पर ही मुकदमा लिखने व रासुका सरीखी धारायें लगाने की कार्यवाही क्यों की जा रही है जबकि घटना में प्रशासन-पुलिस की भूमिका की जांच तक नहीं करायी गयी। सवाल सरकार की अतिक्रमण हटाने के नाम पर अपने साम्प्रदायिक एजेण्डे को आगे बढ़ाने की नीति पर भी उठता है। सवाल यह भी उठता है कि क्या शासन-प्रशासन का यही रुख किसी मंदिर-गुरूद्वारे को उजाड़ने के वक्त भी होता? क्या तब भी देखते ही गोली मारने के आदेश दे दिये जाते। 
    
अब सरकार ने कुमाऊं आयुक्त के नेतृत्व में जांच की घोषणा की है। बगैर स्थानीय अधिकारियों (जिलाधिकारी, एस एस पी व अन्य पुलिस अधिकारी) जिनकी भूमिका इस घटनाक्रम में संदेहास्पद है, को हटाये बगैर निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती। यह जांच अधिकारियों को बचाने वाली और प्रशासन की कहानी को ही दोहराने वाले नतीजे पर पहुंचने की अधिक संभावना है।  
    
उक्त घटना के असर में हिन्दूवादी संगठन जगह-जगह मुस्लिम किरायेदारों, किराये पर दुकान चला रहे मुस्लिमों से दुकान खाली करवाने की कोशिश में जुट गये हैं। ऐसे हिन्दूवादी संगठनों के खिलाफ व उनके साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाने के कुत्सित इरादों के खिलाफ साम्प्रदायिक भाईचारा कायम करने की जरूरत है। ऐसे हिन्दूवादी संगठनों के खिलाफ कार्यवाही भी जरूरी है। 
    
स्पष्ट है कि उक्त हल्द्वानी प्रकरण में सरकार व स्थानीय प्रशासन कहीं से भी पाक-साफ नहीं हैं। संघ-भाजपा के साम्प्रदायिक एजेण्डे को बढ़ाने की खातिर ही सरकार इस तरह की कार्यवाहियां कर प्रदेश में साम्प्रदायिक वैमनस्य का माहौल बनाना चाहती है। सरकार के इन कुत्सित मंसूबों के खिलाफ खड़े होकर ही प्रदेश के साम्प्रदायिक सौहार्द को बचाया जा सकता है। 
    
जरूरत है कि उक्त घटना में सरकार-प्रशासन से लेकर स्थानीय कट्टरपंथी नेताओं की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो। घायलों व मृतकों को मुआवजा दिया जाये। पुलिस प्रशासन को जनता पर बदले की कार्यवाही थोपने से रोका जाए। इस दिशा में प्रशासन पत्रकारों को बनभूलपुरा में घुसने से रोककर व गोलापार की अस्थाई जेल में पूछताछ के लिए उठाये गये लोगों से पत्रकारों को मिलने देने से रोककर दमन चक्र चलाने व बदले की कार्यवाही करने का ही संकेत दे रहा है। खुद मुख्यमंत्री ने प्रभावित स्थल की जगह पुलिस थाना बनाने की घोषणा कर अपनी ओर से बदले का एलान सरीखा कर दिया है। स्पष्ट है भाजपा मुस्लिम समुदाय को भड़काकर हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण चाह रही है। 
    
इसी के साथ केन्द्र व राज्य सरकार के साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के जनविरोधी एजेण्डे के खिलाफ खड़े होने की जरूरत है। उत्तराखण्ड की शांत वादियों को साम्प्रदायिकता व वैमनस्य की, हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बनने से रोका जाना जरूरी है। 

आलेख

/chaavaa-aurangjeb-aur-hindu-fascist

इतिहास को तोड़-मरोड़ कर उसका इस्तेमाल अपनी साम्प्रदायिक राजनीति को हवा देने के लिए करना संघी संगठनों के लिए नया नहीं है। एक तरह से अपने जन्म के समय से ही संघ इस काम को करता रहा है। संघ की शाखाओं में अक्सर ही हिन्दू शासकों का गुणगान व मुसलमान शासकों को आततायी बता कर मुसलमानों के खिलाफ जहर उगला जाता रहा है। अपनी पैदाइश से आज तक इतिहास की साम्प्रदायिक दृष्टिकोण से प्रस्तुति संघी संगठनों के लिए काफी कारगर रही है। 

/bhartiy-share-baajaar-aur-arthvyavastha

1980 के दशक से ही जो यह सिलसिला शुरू हुआ वह वैश्वीकरण-उदारीकरण का सीधा परिणाम था। स्वयं ये नीतियां वैश्विक पैमाने पर पूंजीवाद में ठहराव तथा गिरते मुनाफे के संकट का परिणाम थीं। इनके जरिये पूंजीपति वर्ग मजदूर-मेहनतकश जनता की आय को घटाकर तथा उनकी सम्पत्ति को छीनकर अपने गिरते मुनाफे की भरपाई कर रहा था। पूंजीपति वर्ग द्वारा अपने मुनाफे को बनाये रखने का यह ऐसा समाधान था जो वास्तव में कोई समाधान नहीं था। मुनाफे का गिरना शुरू हुआ था उत्पादन-वितरण के क्षेत्र में नये निवेश की संभावनाओं के क्रमशः कम होते जाने से।

/kumbh-dhaarmikataa-aur-saampradayikataa

असल में धार्मिक साम्प्रदायिकता एक राजनीतिक परिघटना है। धार्मिक साम्प्रदायिकता का सारतत्व है धर्म का राजनीति के लिए इस्तेमाल। इसीलिए इसका इस्तेमाल करने वालों के लिए धर्म में विश्वास करना जरूरी नहीं है। बल्कि इसका ठीक उलटा हो सकता है। यानी यह कि धार्मिक साम्प्रदायिक नेता पूर्णतया अधार्मिक या नास्तिक हों। भारत में धर्म के आधार पर ‘दो राष्ट्र’ का सिद्धान्त देने वाले दोनों व्यक्ति नास्तिक थे। हिन्दू राष्ट्र की बात करने वाले सावरकर तथा मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान की बात करने वाले जिन्ना दोनों नास्तिक व्यक्ति थे। अक्सर धार्मिक लोग जिस तरह के धार्मिक सारतत्व की बात करते हैं, उसके आधार पर तो हर धार्मिक साम्प्रदायिक व्यक्ति अधार्मिक या नास्तिक होता है, खासकर साम्प्रदायिक नेता। 

/trump-putin-samajhauta-vartaa-jelensiki-aur-europe-adhar-mein

इस समय, अमरीकी साम्राज्यवादियों के लिए यूरोप और अफ्रीका में प्रभुत्व बनाये रखने की कोशिशों का सापेक्ष महत्व कम प्रतीत हो रहा है। इसके बजाय वे अपनी फौजी और राजनीतिक ताकत को पश्चिमी गोलार्द्ध के देशों, हिन्द-प्रशांत क्षेत्र और पश्चिम एशिया में ज्यादा लगाना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में यूरोपीय संघ और विशेष तौर पर नाटो में अपनी ताकत को पहले की तुलना में कम करने की ओर जा सकते हैं। ट्रम्प के लिए यह एक महत्वपूर्ण कारण है कि वे यूरोपीय संघ और नाटो को पहले की तरह महत्व नहीं दे रहे हैं।

/kendriy-budget-kaa-raajnitik-arthashaashtra-1

आंकड़ों की हेरा-फेरी के और बारीक तरीके भी हैं। मसलन सरकर ने ‘मध्यम वर्ग’ के आय कर पर जो छूट की घोषणा की उससे सरकार को करीब एक लाख करोड़ रुपये का नुकसान बताया गया। लेकिन उसी समय वित्त मंत्री ने बताया कि इस साल आय कर में करीब दो लाख करोड़ रुपये की वृद्धि होगी। इसके दो ही तरीके हो सकते हैं। या तो एक हाथ के बदले दूसरे हाथ से कान पकड़ा जाये यानी ‘मध्यम वर्ग’ से अन्य तरीकों से ज्यादा कर वसूला जाये। या फिर इस कर छूट की भरपाई के लिए इसका बोझ बाकी जनता पर डाला जाये। और पूरी संभावना है कि यही हो।