मजदूर विरोधी श्रम एवं रोजगार नीति

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श्रम शक्ति नीति-2025

मोदी सरकार ने अपने 2047 के विकसित भारत के विजन के तहत नयी श्रम एवं रोजगार नीति का मसौदा जारी किया है। इस नीति को श्रम शक्ति नीति-2025 का नाम दिया गया है। इस नीति को 8 अक्टूबर को जारी किया गया था और 27 अक्टूबर तक इस पर सबसे सलाह-संशोधन आमंत्रित किये गये थे। 
    
ज्यादातर ट्रेड यूनियन संगठनों ने इस नीति का विरोध किया है और इसे वापस लेने की मांग की है। गौरतलब है सरकार ने इस नीति के निर्माण में किन्हीं भी ट्रेड यूनियन सेण्टरों से राय लेने की भी जरूरत नहीं समझी। 
    
इस नीति में पौराणिक ग्रंथों का इस्तेमाल कर श्रम की महत्ता, श्रम को धर्म के रूप में पेश करने का प्रयास किया गया है। मनुस्मृति की तर्ज पर श्रम को नैतिक पवित्र कर्तव्य घोषित किया गया है। कहा गया है कि श्रम सामाजिक सौहार्द, आर्थिक समृद्धि व सामूहिक कल्याण बनाये रखता है। साथ ही नीति काम को आजीविका के साधन के तौर पर न लेकर धर्म के तौर पर लेने को भारतीय दृष्टिकोण के रूप में पेश करती है। मजदूरों को श्रम को धर्म के तौर पर लेने का उपदेश देने के बाद नीति सरकार को उस राजधर्म पर चलने का कर्तव्य सिखाती है जिसके तहत शासक न्याय करें, उचित मजदूरी दे व मजदूरों को शोषण से बचायें। 
    
नीति की इन बातों को पढ़कर महसूस होता है कि मोदी सरकार उस सामंती राम राज्य में मजदूरों को पहुंचाना चाहती है जहां कामगारों को कर्म ही धर्म है का उपदेश पिलाया जाता था और जहां उनके कोई अधिकार नहीं थे और न्याय के लिए वे राजा या शासक की दया पर निर्भर थे। एक तरह से मोदी सरकार प्राचीन भारत की जजमानी प्रथा में लौट जाना चाहती है जहां न तो आधुनिक अर्थों में मजदूर थे न वेतन प्रणाली थी। बल्कि पेशा आधारित जाति व्यवस्था थी व जातियों के बीच जजमानी सम्बन्ध थे। जिसमें निचली जाति के कामगार ऊंची जातियों की दया पर निर्भर थे। जहां उच्च वर्ण कोई मेहनत करे बगैर सारे फल हड़प जाते थे। 
    
अब अगर नीति के प्रमुख प्रावधानों की बात करें तो इसमें देश के पैमाने पर श्रमिकों का देश व्यापी पोर्टल बनाने, श्रम व रोजगार मंत्रालय को नौकरी प्रदान करने की एजेंसी बनाने, श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने, ग्रीन रोजगार पैदा करने, रोजगार उन्मुख उद्यमियों को बढ़ावा देने, सभी श्रमिकों, प्लेटफार्म-गिग मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा देने आदि की बातें की गयी हैं। इस नीति को 2025 से 2030 के बीच 3 चरणों में लागू होना है। इस नीति में एक केन्द्रीय पोर्टल में समस्त संगठित-असंगठित कामगारों की सूचना एकत्र करने व उन्हें नौकरी पर लगाने आदि की बातें की गयी हैं। 
    
यह नीति केन्द्र-राज्य सम्बन्धों में केन्द्र के हर किस्म के वर्चस्व को और मजबूत करती है क्योंकि केन्द्रीय पोर्टलों के जरिये केन्द्र हर राज्य की न केवल निगरानी कर रहा होगा बल्कि उसे दिशा निर्देश भी दे रहा होगा। 
    
नीति में नई श्रम संहिताओं की कुछ बातें मसलन 12 घण्टे का कार्य दिवस, हफ्ते में 4 दिन काम आदि को भी समेटा गया है। नीति 2047 के अपने लक्ष्य के रूप में शून्य औद्योगिक दुर्घटना रखती है पर इसे हासिल करने के लिए नियमित निरीक्षण की प्रक्रिया खत्म कर पोर्टल आधारित निरीक्षण को बढ़ावा देती है। कोई भी समझ सकता है कि पोर्टल आधारित निरीक्षण मालिकों द्वारा कागजी कार्यवाही पूरी करने से सम्पन्न हो जायेगा व बगैर भौतिक निरीक्षण के औद्योगिक दुर्घटनायें और बढ़ेंगी। 
    
अब अगर मजदूरों के मुद्दों पर आयें तो नीति भूलकर भी मजदूरों के किसी अधिकार की बात नहीं करती। ले देकर वह केवल पी एफ विभाग, ईएसआई, आयुष्मान के जरिये सामाजिक सुरक्षा की बात करती है। पर मालिकों के सापेक्ष मजदूरों के किसी अधिकार की नीति भूल कर भी चर्चा नहीं करती। नीति न तो न्यूनतम मजदूरी की चर्चा करती है और न ही इसे वर्षवार बढ़ाने के किसी फार्मूले की बात करती है। औद्योगिक विवादों, हड़ताल के मजदूरों के अधिकार, गलत श्रम प्रक्रिया पर मालिकों पर कार्यवाही आदि किसी बात पर नीति कुछ नहीं कहती। मालूम पड़ता है कि नीति सरकार की इस मंशा से बनाई गयी है कि 2047 तक सरकार मौजूदा 4 श्रम संहिताओं में मजदूरों के बचे-खुचे अधिकार भी खत्म कर देगी। नीति वास्तव में हमें पूंजीवाद पूर्व के उस सामंती काल में पहुंचा देती है जहां कामगारों के कोई अधिकार नहीं थे। 
    
रोजगार के नाम पर यह नीति ग्रीन रोजगार पैदा करने व रोजगार सृजन करने पर उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के इतर कुछ नहीं कहती। मानो सरकार ने रोजगार सृजन से पल्ला पूरी तरह झाड़ लिया हो। आज की भयावह बेकारी के काल में रोजगार पैदा करने पर सरकारी खामोशी दिखाती है कि मोदी सरकार किस कदर निर्लज्ज हो चुकी है। 
    
सरकार मान चुकी है कि उसके अप्रेन्टिस सरीखे कार्यक्रम व कुछ माह की प्रोत्साहन राशि से पूंजीपति थोक के भाव में नये रोजगार पैदा कर देंगे और बेरोजगारी दूर हो जायेगी। 
    
सरकार रोजगार के मसले पर सरकारी उद्यम खोलने, सरकारी निवेश बढ़ाने आदि की भूल कर भी चर्चा नहीं करती। ऊपर से 12 घण्टे के कार्य दिवस की उसकी छूट और बेरोजगारी बढ़ाने का ही काम करेगी। 
    
कुल मिलाकर यह नीति किसी सामंती काल के शासक की कलम से रचित नीति नजर आती है जहां कामगार की स्थिति अधिकारविहीन थी। बस इसमें आधुनिक दूरसंचार व कम्प्यूटर क्रांति का तड़का लगा हर चीज पोर्टल आधारित बनाने का शौक जरूर पूरा किया गया है। 
    
कहने की बात नहीं कि मध्ययुगीन दासता में जाने से बचने के लिए मजदूर वर्ग को, बेरोजगारों छात्रों को इस नीति का पुरजोर विरोध करना होगा।  

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