हम हार नहीं मानेंगे

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पंजाब मेडिकल कैम्प : अनुभव 

सुबह पौ फटते ही हमारी ट्रेन अमृतसर स्टेशन पर पहुंची। मैं पहली बार ही अमृतसर गया था। अमृतसर के बारे में मेरे दिमाग जो नक्शा था, कि बड़ा भव्य साफ-सुथरा स्टेशन होगा। काफी चकाचौंध होगी। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कुछ नहीं था। सुबह-सुबह अमृतसर स्टेशन पर उतरते ही मेरी वो धारणा काफूर हो गई। अमृतसर स्टेशन पर मेरी ट्रेन से उतरने वाले यात्रियों के अलावा इक्के-दुक्के लोग ही स्टेशन पर दिख रहे थे। स्टेशन पर भी कोई आधुनिकता या चमक-दमक नहीं थी, पहली नजर में पुराने तरीके का ही स्टेशन लगा। कोई खास साफ-सुथरा भी नहीं था। 
    
स्टेशन के बाहर निकलते ही, स्टेशन गेट पर खड़े होते ही मैंने अपने साथी के साथ एक सेल्फी ली और सोशल मीडिया पर डाल दी। जैसे किसी को अटेंडेंस भेजनी हो। हालांकि आजकल सेल्फी का दौर भी है लोग इस तरह यादों को ताजा रखते हैं। बाहर का मौसम हल्का ठंडा कुछ-कुछ कोहरे जैसी धुंध थी। ऐसा लग रहा था जैसे जाड़े ने दस्तक दे दी हो। हम तो ठहरे हिंदी भाषी सो बाहर निकलते ही पहली समस्या भाषा को लेकर ही हुई। ई रिक्शा और टेंपो वाले को रोडवेज जाने के लिए कहना था। इसलिए पहली बार समझने में दिक्कत हो रही थी। पता नहीं चल रहा था कि हम जो कहेंगे उसका जवाब कैसे मिलेगा। और हम उस जवाब को समझ पाएंगे या नहीं। 
    
जैसे-तैसे हम रोडवेज पहुंचे। वहां से अपने गंतव्य की बस ढूंढने में भी वही समस्या हुई जो टेंपो ढूंढने में हुई। चूंकि हम दोनों उस इलाके में नए थे, भाषा की दिक्कत थी सो रास्ते भर कंडक्टर से कई बार अपनी मंजिल के बारे में पूछा। हालांकि कंडक्टर साहब भी हमारी बात को मुश्किल से ही समझ पाए। अंततः लगभग डेढ़ घंटे की बस यात्रा के बाद हम दोनों साथी अपने गंतव्य तक पहुंचे, लेकिन यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई थी। एक छोटी लगभग चार किलोमीटर की यात्रा हमारा और इंतजार कर रही थी। यहां से हमें देहात के एक गांव में जाना था। तुरंत एक टेंपो मिला और लगभग दस मिनट बाद ही हम अपनी मंजिल एक गांव में पहुंचे। 
    
सुबह लगभग नौ बजे का समय। हम लोग अपने एक वरिष्ठ साथी के आवास पर पहुंचे। ये समय नाश्ते का ही होता है। इसलिए हमारे पहुंचते ही नाश्ते की पेशकश हुई। हम लोग चाय पीने के बाद अपने रोजमर्रा के कामों में लग गए। फ्रेश होने, नहाने के बाद जब घर पहुंचे, देख रहा हूं एक लगभग 76 वर्ष के सीनियर साथी बर्तन साफ कर रहे हैं और उनकी लगभग 72 वर्षीय पत्नी रसोई में खाना बना रही हैं। इस उम्र में पति-पत्नी का ये प्रेम और कामों का बंटवारा एक-दूसरे के प्रति बराबरी और सम्मान को दर्शाता है। 
    
खाने के समय आंटी जी ने हमें अपने बचपन, नौजवानी के काफी किस्से सुनाए। उन्होंने बताया कि वे चार-पांच साल की उम्र से ही घर के काम में हाथ बंटाती थीं और परिवार की मर्जी के विरुद्ध उन्होंने जबरन अपनी पढ़ाई शुरू की। उन्होंने बताया कि हमारे यहां पहले लड़कों की पढ़ाई पर ही जोर होता था। लेकिन मैंने प्रण किया कि मुझे भी पढ़ना है। मेरी उम्र जब नौ-दस साल की थी तो मैं दर्जनों जानवरों का सुबह गोबर-कूड़ा फेंक कर उनको चारा खिलाने के बाद स्कूल जाती थी। आने के बाद खेतों में काम करती। इस समय जो काम मैं करती हूं वो तो कुछ नहीं। मैं सोचने लगा शायद काम के प्रति आंटी का ये जज्बा ही उन्हें हम लोगों से घर का काम नहीं कराने देता। उन्होंने बताया कि इस परिस्थिति में उन्होंने तीन-तीन विषयों में पी जी किया और पी एच डी की डिग्री हासिल की। इस समय वो शिक्षक से रिटायर हैं। यह सुनकर उनके प्रति हमारा सम्मान और बढ़ गया। हालांकि यह सम्मान उनके टीचर होने की वजह से नहीं बल्कि श्रम के प्रति उनके दृष्टिकोण की वजह से था। आज के इस पूंजीवादी आधुनिक दौर में जिस तरह श्रम और श्रम करने वालों के प्रति लोगों का नजरिया उपेक्षा से भरा होता है, मध्यमवर्गीय घरों की महिलाएं और उच्च वेतन भोगी महिलाएं जिस तरह मेहनतकश महिलाओं को देखती हैं, वह काफी चिंताजनक है ही साथ ही श्रम के प्रति उनके दृष्टिकोण को भी दिखाता है। ये महिलाएं अपने घरेलू कामों चौका, बर्तन, झाड़ू, पोंछा, खाना बनाना आदि के लिए जिन महिलाओं को काम पर रखती हैं उनके प्रति इनका नजरिया उपेक्षाओं से भरा होता है। ऐसे में इन आंटी से मिलने के बाद अलग ही अहसास हो रहा था। 
    
यहां के सारे कामों से निवृत हो हम लोग अपने काम के लिए निकल पड़े। हमारी टीम पंजाब के बाढ़ प्रभावित इलाकों में अपनी स्वास्थ्य सेवाएं देने आई थी। हम लोग यहां एक मेडिकल कैंप संचालित कर रहे थे। यह कैंप एक जनपक्षधर पाक्षिक अखबार और कुछ क्रांतिकारी संगठनों के सहयोग से चल रहा था। इसमें जगह-जगह से डाक्टर और कुछ वालंटियर अपनी सेवाएं देने आ रहे थे। इसी हेतु मैं और मेरे एक साथी पहुंचे थे। 
    
एक गाड़ी हम लोगों ने की जिसमें पीछे दवाइयां और आगे की सीटों पर हम छह लोगों की टीम निकल पड़ी। पूरे दिन हम लोग बाढ़ प्रभावित पंजाब के दो जिलों तरन तारण और फिरोजपुर में घूमते रहे। इस दौरान हम लोग कई लोगों से मिले, कई गुरुद्वारों में गए। लेकिन कहीं रुकने का ठौर नहीं मिला। बाढ़ ने गुरुद्वारों की स्थिति को भी खराब कर दिया था। हमारे साथ पंजाब के किसान संगठन के कुछ नेता भी थे। उन्होंने हमारी काफी मदद की। शाम को हम लोग फिर से आंटी जी की शरण में आ गए। 
    
फिर वही खातिरदारी हुई। इसके बाद आज दिन भर का घटनाक्रम दिमाग में घूमने लगा। हमारे हिंदी भाषी इलाकों में जो लोग अपने को मानवीय समझते हैं, वे कहते हैं कि किसी भिखारी को खाली हाथ नहीं भेजना चाहिए। भूखे को रोटी खिलानी चाहिए। लेकिन पंजाब में समझ आया कि इस बात का यहां कोई मतलब नहीं। पंजाब में जहां भी सिख समुदाय के लोग रहते है वहां, आपको रोटी और रुकने की जगह तो मिल ही जाएगी। सिख समुदाय की ये सेवा भावना काबिले तारीफ है। इस भावना का लाभ दिल्ली में चले किसान आंदोलन ने भी उठाया। जब हम दिन भर घूम रहे थे तो हमने देखा कि जगह-जगह भांति-भांति के लंगर चल रहे हैं। वे लोग बड़े ही आदर से सबको खाना खिला रहे हैं। ये देखकर लगता ही नहीं था कि पंजाब इतनी बड़ी त्रासदी से गुजर रहा है। लेकिन सेवा की ये भावना सारे दुखों पर भारी थी। इसमें एक सामूहिकता की भावना भी है। सामूहिकता किसी भी व्यक्तिगत प्रयास की तुलना में कष्टों से निजात पाने में ज्यादा कारगर होती है। अगर सामूहिकता की यही भावना समाज बदलाव में लग जाए तो बहुत ही कारगर सिद्ध होगी। 
    
हम जानते हैं कि जब कोई किसान खेतों में अपनी लहलहाती फसलों को देखता है तो उसका सीना चौड़ा हो जाता है। उसका चेहरा मुस्कान से खिल उठता है। ऐसा लगता है कि फसलों की सरसराहट उसकी धमनियों में खून का प्रवाह बढ़ा रही हो। लेकिन जब कोई किसान अपनी चौपट होती फसलों को देखता होगा तो उसका हाल कैसा होता होगा। ये तो दुख अपने किसी नजदीकी के बिछड़ने/खोने या किसी प्रेमी का अपनी प्रेमिका के इंतजार के बाद उसकी न आने की सूचना के समय होता होगा। हमने अपनी यात्रा में देखा कि आज महीनों के बाद भी कुछ गांवों में पानी भरा है। खेतों में फसलें नहीं अभी भी पानी है। जिनमें पानी नहीं है उन खेतों में फसलें सड़ रही हैं। कुछ खेतों में बाढ़ की गाद या रेत जमा हो गई है। कुछ स्थानीय लोगों ने हमें बताया कि काफी बड़ा इलाका ऐसा है जहां एक फसल तो नष्ट हो गई, लेकिन दूसरी फसल के लिए भी खेत तैयार नहीं हैं। उन्होंने बताया लगभग सवा लाख एकड़ की फसल बर्बाद हो गई। 
    
इस तरह की आपदाओं के लिए प्रकृति के साथ-साथ अमानवीय पूंजीवादी व्यवस्था जिम्मेदार है। यह आपदाओं की विभीषिका को बढ़ा देती है। पंजाब के लोगों ने बताया कि हम लोगों को बिना सूचित किए पानी छोड़ दिया गया। नदियों की साफ-सफाई न होने और बांधों का रखरखाव न होने के कारण बांध फट गए, जिस कारण आपदा ने वीभत्स रूप धारण किया। दर्जनों लोग मारे गए। बड़ी संख्या में मवेशियों का नुकसान हुआ। इसके लिए मूलतः व्यवस्था ही दोषी है। लेकिन इसके बाद भी लोग एक-दूसरे को सांत्वना दे रहे हैं। और इस इलाके में होने वाले एक धार्मिक आयोजन में व्यस्त हैं। इस तरह के सामाजिक या धार्मिक आयोजन भी लोगों के दुखों को कम करते हैं। यहां उनका अकेलापन टूटता है। वे जब समूह में होते हैं तो समस्याओं से लड़ने की उनकी ताकत बढ़ जाती है। 
    
जब हम पंजाब पहुंचे तो बाढ़ को आए लगभग डेढ़ महीना बीत चुका था लेकिन इस आपदा ने जो गहरे जख्म दिए वो साफ देखे जा सकते थे। पंजाब के लोग इस बात से काफी खुश थे कि इस संकट की घड़ी में देश की आम जनता ने उनका भरपूर सहयोग दिया। वे इस आपदा में मुस्लिम समाज की सहयोग की भावना से गदगद थे। हम लोगों को भी इस तरह की बात सुनकर बड़ा अच्छा लगा। कि जहां देश के फासीवादी शासक अपनी नीतियों व कारगुजारियों से जनता में एक-दूसरे के प्रति नफरत बो रहे हैं, वहीं मेहनतकश जनता उनकी उस नफरत का जवाब आपसी भाईचारे और सहयोग की भावना से दे रही है। ये भावना न सिर्फ देश के भीतर है बल्कि पड़ोसी देश में भी देखने को मिली। एक साथी ने बताया कि जब हमारा एक गांव बह गया तो पाकिस्तान के लोगों ने न सिर्फ हमें पीने का पानी दिया बल्कि पानी रोकने के लिए बांध बनाने में भी हमारी मदद की। उन्होंने मिट्टी रोकने के लिए अपनी तरफ से पेड़ काटकर इधर पहुंचाए। बाढ़ में जब हमारे पशु पाकिस्तान की ओर बह गए तो पानी कम होने के बाद हमारे पशु उन्होंने वापस किए। ये भावना दिखाती है कि मेहनतकश जनता मानवीय है, उसके आदर्श उच्च हैं। वहीं शासक वर्ग अपने वर्ग हितों के कारण एक-दूसरे देशों की जनता में नफरत फैलाकर अपना हित साधते हैं।  
    
पंजाब के लगभग एक हफ्ते के प्रवास में हमने मेडिकल कैंप के माध्यम से अपनी सहयोग और एक-दूसरे के दुख में साथ खड़े रहने की भावना को प्रदर्शित किया। बल्कि हमने वहां बहुत कुछ सीखा भी कि जिन समस्याओं का सामना निजी तौर पर हम करते हुए निराशा और पस्त हिम्मती के शिकार होते है वहीं सामूहिकता की भावना हमें संघर्ष का माद्दा प्रदान करती है। इतने दिनों में हमने कई साथियों के यहां खाना खाया, कई के यहां रुके लेकिन उन आम किसानों के व्यवहार से कहीं ये नहीं महसूस हुआ कि वे अभी कितनी बड़ी समस्या से उबर रहे हैं। हम लोगों ने उनसे कई गंभीर मुद्दों पर भी चर्चा की तो हंसी-मजाक के पल भी बिताए। कुछ साथियों ने हमें पंजाब के इतिहास, आजादी के आंदोलन में पंजाब के लोगों की भूमिका और सिख समुदाय के जंगी इतिहास से अवगत कराया। इन साथियों ने ही हमें प्रभावित इलाकों की सैर कराई तथा हमें हुसैनी वाला ले गए जहां हम सब के प्रेरणा स्रोत आजादी के संघर्ष के नायक शहीद भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू और बी के दत्त की समाधि है। यहां से पाकिस्तान दिखाई देता है। हालांकि हम लोगों को बी एस एफ ने बार्डर पर नहीं जाने दिया। क्योंकि बाढ़ ने सीमा पर भी तबाही मचाई थी। बार्डर क्षत-विक्षत हो गया था। इसलिए नागरिकों को बार्डर पर नहीं जाने दिया जा रहा था। 
    
पंजाब के स्थानीय लोग इस समय स्थानीय धार्मिक आयोजन में शामिल होने के साथ अपने दुखों से निजात पा रहे थे तो वे एक-दूसरे की मदद भी सेवा के जरिए कर रहे थे। हमने देखा कि कई सड़कें और बांध लोगों ने अपनी सामूहिकता के दम पर ठीक कर लिए थे। अलग-अलग गांवों के किसान अपने-अपने ट्रैक्टरों और मशीनों में डीजल भरवाकर अपने साथी किसानों की मदद के लिए जा रहे हैं। इससे वे प्रभावित किसानों की जमीनों को ठीक करके पुनः खेती के लायक बनाने में उनकी मदद कर रहे हैं। सरकारों की ओर से जो मदद दी गई है वो नुकसान और जरूरत को देखते हुए नाकाफी है। हम लोगों ने एक खेत में दर्जनों ट्रैक्टर के जरिए सेवा करते लोगों को देखा। हमारे घूमने के दौरान एक स्थानीय नौजवान ने हमें बताया कि ये ट्रैक्टर हमारे गांव में सेवा के लिए आए हैं। उसने बताया कि इनमें डीजल भी गांव वालों ने ही भरवाया है। ऐसा लगा यह बताते हुए वह गर्व महसूस कर रहा हो। उसने कहा कि चाहे कितनी भी बड़ी आपदा आ जाए हम हार नहीं मानेंगे। हम एक-दूसरे के सहयोग से समस्याओं से निजात पाएंगे। इसके साथ ही उस नौजवान ने उन सभी का भी आभार व्यक्त किया जो भी पंजाब की इस भीषण आपदा में पंजाब के साथ खड़े रहे। 
    
अंत में हम लोग वापस फिर अपने सीनियर साथी और आंटी जी के पास आ गए। उन्होंने हमें फिर बेहतरीन खाना खिलाया। हम लोगों ने आंटी जी के परिवार के साथ समूह में बैठकर एक-एक चाय पी और पंजाब की यादों और अपनी यात्रा के अनुभवों को अपने हृदय में समेटे हुए पंजाब को अलविदा कह दिया। -एक पाठक 

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