अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः
* घूसखोरी और भ्रष्टाचार- उम्मीदवार एक दस्तूर की तरह पैसे, उपहार या नौकरी के वायदे से वोट खरीद लेते थे। चुनावी दंगल अत्यन्त महंगा होता था जिससे ईमानदार उम्मीदवार दंगल से बाहर हो जाते थे।
* दावत- उम्मीदवार स्थानीय शराबखानों में शानदार दावतों का प्रबंध करते थे जिसमें मतदाताओं को असीमित खाना और पर्याप्त शराब मिलती थी। इसका एक अच्छा चित्रण विलियम होगार्थ के 1755 के चित्र में मिलता है जिसका शीर्षक थाः एक चुनावी मनोरंजन।
* सड़े और जेबी क्षेत्र- संसदीय क्षेत्र बहुत खराब ढंग से विभाजित होते थे। ‘सड़े क्षेत्र’ वे होते थे जिसमें बहुत कम या न के बराबर लोग होते थे। ‘जेबी क्षेत्र’ वह संसदीय सीट होती थी जो किसी एक जमींदार के अधीन होती थी।
* खुला मतदान और जोर-जबर्दस्ती- उस समय गुप्त मतदान नहीं होता था और मतदाताओं को अपने मत की खुले में घोषणा करनी होती थी। इससे जमींदारों, मालिकों या अन्य ताकतवर लोगों को मतदाताओं को डराने-धमकाने का मौका मिल जाता था जिससे वे ‘‘ठीक’’ से वोट करें।
* चुनाव अधिकारियों द्वारा घपला- चुनाव अधिकारियों पर अक्सर ही पक्षपात करने का आरोप लगता था जैसे कि वे विपक्ष के मतों को नकार देते थे या चुनाव मनमाने ढंग से जल्दी बंद कर देते थे।
* भीड़ हिंसा- दंगा, डराना-धमकाना और गुण्डा भीड़ वे आम हथियार थे जिनका अक्सर ही विपक्ष के चुनाव अभियान में विघ्न डालने, चुनावी बूथ पर नियंत्रण करने तथा विपक्षी मतदाताओं को भगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था।
यदि यह सब आज के भारत के लिए बहुत चिर-परिचित लगता है तो एक बार फिर याद करें कि यह अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड की बात है, इक्कीसवीं सदी के भारत की नहीं। और तब जनतंत्र अत्यन्त सीमित था तथा मतदाताओं की संख्या कुल वयस्क आबादी का पांच प्रतिशत भी नहीं थी। यानी तब मतदाता हीन-दीन, दबे-कुचले, भूखे-नंगे ‘जाहिल’ लोग नहीं थे।
यदि किसी को ‘ब्रिटिश अपवाद’ का भ्रम हो तथा उसे अमरीकी जनतंत्र पर अगाध भरोसा हो तो उसके लिए यह ऐतिहासिक तथ्य पेश है। इंग्लैण्ड के शासन से आजाद होने के बाद अमेरिका के सभी तेरह उपनिवेशों के प्रतिनिधियों ने 1787 में संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान बनाया। पर यह संविधान तभी लागू हो सकता था जब सभी उपनिवेश अलग-अलग इस संविधान को पास करें। कई उपनिवेश अपनी स्वायत्तता के खत्म होने के डर से इसे स्वीकार करने से हिचक रहे थे। ऐेसे में संविधान समर्थकों ने इसे पास कराने के लिए भांति-भांति के तीन-तिकड़म का सहारा लिया। इस तीन-तिकड़म में ऊपर इंग्लैण्ड के चुनावी भ्रष्टाचार की कई चीजें शामिल थीं। इस तरह एक राष्ट्र-राज्य की तरह संयुक्त राज्य अमेरिका की शुरूआत ही चुनावी भ्रष्टाचार से हुई। यानी चुनावी भ्रष्टाचार इसके मूल में है- ईसाईयों के ‘आदिम पाप’ की तरह।
चुनावों में इस व्यापक भ्रष्टाचार को रोकने के लिए देशों में कानून भी बने। पर जैसा कि पूंजीवादी समाजों में होता है, भ्रष्टाचार बहुत आसानी से उसे रोकने के लिए बनने वाले कानूनों पर काबू पा लेता है। ज्यादा से ज्यादा यह होता है कि फुटकर भ्रष्टाचार का स्थान थोक भ्रष्टाचार ले लेता है अथवा भ्रष्टाचार को कानूनी बना दिया जाता है यानी जो पहले भ्रष्टाचार माना जाता था उसे अब भ्रष्टाचार नहीं माना जाता।
अपने को ‘प्राचीनतम जनतंत्र’ कहने वाले सं.रा. अमेरिका में चुनावी भ्रष्टाचार की ये प्रवृत्तियां सबसे मुखर हैं। वहां के जीवन में पैसा सर्वप्रमुख चीज है और इसे लेकर वहां कोई शर्म नहीं है। वह हवा-पानी की तरह स्वीकार्य है। इसीलिए चुनाव में पैसे का खेल वहां मानी हुयी बात है। वहां न केवल चुनाव में पैसा पानी की तरह बहता है बल्कि उसके पहले उम्मीदवारों के चुनाव में भी पैसा पानी की तरह बहता है (वहां हर स्तर पर चुनाव के लिए पार्टियों के प्रत्याशियों का भी पार्टी सदस्यों द्वारा पार्टी कन्वेंशन में चुनाव किया जाता है)। विशाल बहु राष्ट्रीय कंपनियों वाले अमेरिका में इन कंपनियों द्वारा चुनाव में सीधा पैसे का खेल न कर पाना एक समस्या थी। इसका समाधान उसके संघीय सर्वोच्च न्यायालय ने 1970 के दशक में कर दिया। आर्थिक मामलों के कानूनों में कारपोरेशन को एक व्यक्ति का दर्जा हासिल है। अब अमरीकी सर्वोच्च न्यायालय ने घोषित कर दिया कि राजनीतिक मामलों में भी कारपोरेशन एक व्यक्ति की हैसियत रखता है। और चूंकि राजनीतिक क्षेत्र में व्यक्ति को अभिव्यक्ति का अधिकार हासिल होता है तो कारपोरेशन को भी यह अधिकार हासिल होगा। व्यक्ति इस अधिकार के तहत राजनीतिक पार्टियों या उम्मीदवारों को पैसे दे सकते हैं तो कारपोरेशन भी ऐसा कर सकते हैं। इसके बाद कंपनियों को सीधे अपने खाते से पार्टियों व उम्मीदवारों को पैसा देने तथा उन्हें खरीदने का अधिकार मिल गया। इससे वहां चुनाव में पैसे का प्रवाह और बढ़ गया। (भारत में कंपनियां सीधे पार्टियों या उम्मीदवारों को पैसा नहीं दे सकतीं पर वे चुनावी ट्रस्ट में दान के जरिये यह कर सकती हैं।)
पूंजीवाद का कोई समर्थक यह कह सकता है कि पैसे की इस व्यवस्था में चुनावों में पैसे का खेल बुरा क्यों माना जाये? यदि पूंजीवादी समाज की जिन्दगी के सारे मसले पैसे से तय होते हैं तो चुनाव या राजनीति को ही इससे दूर क्यों रखा जाये?
एक पैसे वाले पूंजीवादी व्यक्ति का यह तर्क जायज है। यदि वह पैसे से सब कुछ खरीद सकता है- दूसरों का हुनर, दूसरों की अक्ल, यहां तक कि दूसरों का शरीर भी- तो वह राजनीतिक पार्टी या नेता क्यों नहीं खरीद सकता? यदि वह पैसे से हर किसी को अपना नौकर बना सकता है तो किसी नेता को क्यों नहीं? इस मामले में उस पर पाबंदी क्यों?
यहीं पर पूंजीवादी व्यवस्था का सबसे बड़ा अंतर्विरोध सामने आता है। पूंजीवाद खरीद-बेच वाली व्यवस्था है जिसमें पैसा और मुनाफा ही सब कुछ है। खरीद-बेच बिना प्रतियोगिता के सही तरह से सम्पन्न नहीं हो सकती। यह पैसा, खरीद-बेच और प्रतियोगिता बाजार में सबकी बराबरी और आजादी की मांग करते हैं। इस सबको सुनिश्चित करता है पूंजीवादी राज्य जिसके सामने हर वयस्क व्यक्ति नागरिक की तरह बराबर है। लेकिन चूंकि हर व्यक्ति नागरिक की हैसियत से बराबर है, इसलिए राज्य का संचालन चुनाव की किसी व्यवस्था के जरिये ही हो सकता है।
पूंजीवादी समाजों में पूंजीवादी राज्य, नागरिक तथा चुनाव प्रणाली का इन समाजों में पूंजीवाद के विकास के साथ क्रमशः विकास हुआ। इस संबंध में सिद्धान्त भी क्रमशः विकसित हुए। यह प्रक्रिया बीसवीं सदी में ही जाकर पूरी हुई जब सार्विक मताधिकार पर आधारित पूंजीवादी जनतंत्र कायम हुये।
इस पूंजीवादी जनतंत्र में संविधान व कानून की नजर में हर व्यक्ति बराबर था- एक वोट के साथ। हर कोई चुनाव में खड़ा हो सकता था। पर कानून की नजर में बराबर व्यक्ति असल में बराबर नहीं थे। उनकी गैर-बराबरी का सबसे बड़ा आधार आर्थिक था जिसे यही पूंजीवादी संविधान मान्यता देता था। यानी पूंजीवादी संविधान कहता था कि आर्थिक तौर पर विशाल गैर-बराबरी वाले इंसान राजनीतिक तौर पर बराबर होंगे।
आर्थिक गैर बराबरी और राजनीतिक बराबरी का यह अंतर्विरोध पूंजीवादी राजनीति में आम तौर पर तथा चुनावी राजनीति में खास तौर पर भांति-भांति से अभिव्यक्त होता है। यदि चुनावों में यह असंभव कारनामा हो भी जाये कि उसमें पैसे की कोई भूमिका न हो तो भी जीतने के बाद प्रतिनिधियों को पैसे वाले बहुत आराम से खरीद लेंगे। यदि उनके द्वारा सीधे खरीद पर प्रतिबंध होगा तो वे तिरछे ढंग से खरीद लेंगे। आखिर पूंजीपतियों को नेताओं के घरों में शादी-ब्याह करने से कौन रोक सकता है?
पूंजीवाद का समूचा इतिहास इस बात का गवाह है कि पूंजीपति वर्ग ने पैसा कमाने के रास्ते में किसी भी बाधा को स्वीकार नहीं किया। कोई भी नैतिकता या कोई भी नियम-कानून उनके रास्ते की अनुल्लंघनीय बाधा नहीं साबित हुए। ऐसे में यह उम्मीद करना फरिश्तों की मासूमियत को भी शोभा नहीं देगा कि पैसे वाले राजनीति में ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सारे परिणामों को चुपचाप स्वीकार कर लेंगे। और वह भी तब जब पूरे समाज के स्तर पर नीतियों के निर्माण का काम राज्य सत्ता का होता है तथा राज्य सत्ता के कारकून कौन होंगे वह चुनाव तय कर रहा हो। पैसे वाले चाहेंगे कि उनके मन-माफिक लोग ही चुने जायें या चुने जाने के बाद वे उनके मन माफिक काम करें। जहां तक पूंजीवादी नेताओं का सवाल है, वे अल्ला मियां द्वारा भेजे गये फरिश्ते नहीं होते। राजनीति उनका पेशा होता है और पूंजीवादी समाज के आम चलन के अनुसार वे बाजार में बिकने को तैयार बैठे होते हैं। जो सबसे ज्यादा बोली लगायेगा, उसके साथ जायेंगे। जब ये नेता पार्टियों में संगठित होते हैं, तब यही खरीद-बेच पार्टियों के स्तर पर होती है।
अपने व्यवहारिक रूप में पूंजीवादी राजनीति में पैसे का यह खेल इतने तक सीमित नहीं रहता। वह बहुत भांति-भांति की बेहयाई और नंगई में परिणत हो जाता है। अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड के उपरोक्त हालात से लेकर आज भारत-अमेरिका के हालात तक इसके अनेकानेक रूप देखे जा सकते हैं। आज के पतित पूंजीवाद के दौर में किसी भी करतूत के लिए कोई शर्म नहीं बची है। सब कुछ जायज हो गया है। इसीलिए अमरीकी राष्ट्रपति खुलेआम एलान कर रहा है कि यदि मतदाता उसकी पार्टी को नवंबर में होने वाले चुनाव में जिता देते हैं तो वह हर वयस्क अमरीकी को सरकारी खाते से पांच हजार डालर दे देगा।
इस समय अपने देश में भाजपा सरकार और उसके अधीन चुनाव आयोग द्वारा चुनावों में भयंकर धांधली को लेकर जो हाहाकार मचा हुआ है उसे सही परिप्रेक्ष्य में समझने की जरूरत है। अगले पचास साल तक सत्ता में बने रहना हिन्दू फासीवादियों का घोषित लक्ष्य है। उन्हें भारत में अपना ‘हिन्दू राष्ट्र’ कायम करना है। इसके लिए उनका सत्ता में बने रहना जरूरी है और इसके लिए वे कुछ भी करेंगे- साम, दाम, दंड, भेद सब। वे कर भी रहे हैं और उन्हें कोई शर्म भी नहीं है।
पर उनके बरक्स जो लोग खड़े हो रहे हैं तथा यह जताने का प्रयास कर रहे हैं कि पूंजीवाद में ‘स्वंतत्र व निष्पक्ष’ चुनाव हो सकते हैं तथा इस तरह के चुनावों से मजदूर-मेहनतकश जनता का भला हो जायेगा, उनसे भी मजदूर-मेहनतकश जनता को सावधान करना होगा। पूंजीवादी व्यवस्था में न तो ‘स्वतंत्र व निष्पक्ष’ चुनाव हो सकते हैं और न इनसे मजदूर-मेहनतकश जनता का भला होगा। ‘स्वतंत्र व निष्पक्ष’ चुनावों का बस इतना फायदा होगा कि मजदूर-मेहनतकश जनता क्रमशः यह समझती जायेगी कि इनके जरिये बनने वाली सरकार उनकी अपनी सरकार नहीं है। कि ‘स्वतंत्र व निष्पक्ष’ चुनावों से बनने वाली सरकार भी पैसे वालों की ही सरकार होती है। कि समस्या की जड़ में चुनावों में पैसे का खेल या चुनावी धांधली नहीं है। कि समस्या की जड़ में पैसे को भगवान का दर्जा देने वाली पूंजीवादी व्यवस्था ही है।
हिन्दू फासीवादियों द्वारा चुनावों को मखौल बना दिये जाने का भंडाफोड़ केवल इसी कोण से किया जाना चाहिए।