वक्त की जरूरत क्रांतिकारी ट्रेड यूनियन सेण्टर का निर्माण

Published
Fri, 10/16/2026 - 07:50
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इंकलाबी मजदूर केंद्र द्वारा 2 अक्टूबर को ‘हालिया मजदूर उभार और हमारे समक्ष चुनौतियां’ विषय पर एक कार्यशाला का आयोजन किया गया। हरिद्वार (उत्तराखंड) में आयोजित इस कार्यशाला में विभिन्न ट्रेड यूनियन प्रतिनिधियों एवं मजदूर कार्यकर्ताओं ने भागीदारी की और एक क्रांतिकारी ट्रेड यूनियन सेंटर के निर्माण को आज वक्त की जरूरत बताया।
    
कार्यशाला में वक्ताओं ने कहा कि इस साल की पहली छमाही में ठेका मजदूरों की व्यापक हड़तालों और प्रदर्शनों ने स्पष्ट कर दिया कि देशी-विदेशी कंपनियां श्रम कानूनों का घोर उल्लंघन कर रही हैं। श्रम विभाग और सरकारों के संरक्षण में स्थायी प्रकृति के कामों पर ठेके के तहत 12-12 घंटे मजदूरों को निचोड़ा जा रहा है। न्यूनतम वेतन को भुखमरी की सीमा तक नीचे गिरा दिया गया है और ओवरटाइम का भी कानूनन डबल भुगतान नहीं किया जा रहा है। उदारीकरण के दौर में देशी-विदेशी पूंजीपतियों ने ठेका एवं विभिन्न अस्थायी मजदूरों के जीवन के हालात अमानवीय बना दिये हैं। उदारीकरण-निजीकरण के रथ पर सवार मोदी सरकार ने तो 4 नये लेबर कोड लागू कर मजदूरों पर भारी हमला बोल दिया है। 
    
वक्ताओं ने कहा कि मजदूर वर्ग इतिहास का सबसे क्रांतिकारी वर्ग है। जब वो एक वर्ग के रूप में सड़कों पर उतरा तो सरकारों के होश फाख्ता हो गये और हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, तेलंगाना और कर्नाटक की राज्य सरकारों को तत्काल ही न्यूनतम वेतन में बढ़ोत्तरी करने को मजबूर होना पड़ा। यदि मजदूरों की ये हड़तालें स्वतः स्फूर्त न होकर संगठित होतीं तो कहीं अधिक सफल रहतीं। ऐसे में आज मजदूरों को न सिर्फ फैक्टरी बल्कि पूरे औद्योगिक क्षेत्र के स्तर पर वर्गीय आधार पर संगठित होने की जरूरत है, उन्हें अपनी क्रांतिकारी विचारधारा और लाल झंडे तले संगठित होने की जरूरत है।     
    
वक्ताओं ने कहा कि सरकारों ने अपनी जायज मांगों के साथ सड़कों पर उतरे मजदूरों पर भारी दमन चक्र चलाया और आंदोलन को संगठित करने की कोशिश कर रहे मजदूर कार्यकर्ताओं को लक्षित कर फर्जी मुकदमे दर्ज कर उन्हें जेलों में ठूंस दिया। असल में ये सरकारें जनता की नहीं बल्कि पूंजीपतियों की सरकारें हैं। 
    
वक्ताओं ने कहा कि आज कोर्ट में जज तक पूंजीपतियों की भाषा बोल रहे हैं। यदि कोर्ट में कहीं कोई फैसला मजदूरों के पक्ष में आ भी जाये तो पूंजीपति उसे लागू नहीं कर रहे हैं और पुलिस-प्रशासन एवं श्रम विभाग पूरी बेशर्मी के साथ पूंजीपतियों का ही साथ दे रहे हैं। आज देश में उभरते फासीवाद का सबसे बड़ा हमला मजदूरों पर ही हो रहा है। 
    
वक्ताओं ने कहा कि मजदूरों के इस वर्गीय उभार में महिला मजदूरों ने भी बढ़कर भागीदारी की और अनेकों जगहों पर महत्वपूर्ण और नेतृत्वकारी भूमिका अदा की।
    
वक्ताओं ने कहा कि मजदूरों की हड़तालों और प्रदर्शनों ने देखते-देखते पूरे उत्तर भारत और एक हद तक दक्षिण भारत को भी अपनी चपेट में ले लिया था, लेकिन इस दौरान लाखों-लाख की सदस्यता का दावा करने वाले केंद्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशन नदारद नजर आये। असल में इनका नेतृत्व सुविधापरस्त और समर्पणवादी है, जो कि संघर्ष का माद्दा खो चुका है। 
    
कार्यशाला में विभिन्न फैक्टरियों में जारी संघर्षों एवं भोजनमाताओं के जीवन के हालातों पर भी चर्चा हुई।
    
कार्यशाला में इंकलाबी मजदूर केंद्र, औद्योगिक ठेका मजदूर यूनियन फरीदाबाद, बेलसोनिका मजदूर यूनियन गुड़गांव, रिचा श्रमिक संगठन काशीपुर, इंटार्क मजदूर यूनियन किच्छा, इंटरार्क मजदूर यूनियन पंतनगर, ठेका मजदूर कल्याण समिति पंतनगर, मार्केट वर्कर्स एसोशियेशन बरेली, प्रगतिशील भोजनमाता संगठन उत्तराखंड, संयुक्त संघर्षशील ट्रेड यूनियन मोर्चा हरिद्वार, भेल मजदूर ट्रेड यूनियन हरिद्वार, फूड्स श्रमिक यूनियन आईटीसी हरिद्वार, देवभूमि श्रमिक संगठन हिन्दुस्तान यूनिलीवर हरिद्वार, सीमेंस वर्कर्स यूनियन (सी एंड एस) हरिद्वार, एवरेडी मजदूर यूनियन हरिद्वार, बेलराईज मजदूर यूनियन हरिद्वार, एवरेस्ट इंडस्ट्रीज मजदूर यूनियन हरिद्वार, लंकेश्वरी भगवानपुर हरिद्वार इत्यादि के प्रतिनिधियों एवं मजदूर कार्यकर्ताओं ने भागीदारी की।
        -विशेष संवाददाता

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