बेचारा रुपया ! कहां तक गिरेगा

Published
Fri, 10/16/2026 - 07:50
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इधर देश में मोदी की साख गिरती जा रही है उधर बेचारा रुपया भी गिरता ही जा रहा है। क्योंकि कभी मोदी ने मनमोहन सरकार के गिरते इकबाल को गिरते रुपये से जोड़ा था तो अब वही बात मोदी मियां पर भी लागू हो रही है। 
    
भारत का केन्द्रीय बैंक रिजर्व बैंक आॅफ इण्डिया पूरी कोशिश कर रहा है कि रुपया और न गिरे। और किसी भी कीमत पर उसकी इज्जत बची रहे। और कम से कम वह दिन न आये (कम से कम मोदी काल में तो न आये) जब 100 रुपये का 1 डालर हो जाये। 
    
गिरते रुपये को थामने के लिए हाल में भारतीय रिजर्व बैंक ने कई सारे कदम उठाये। बैंक के इन कदमों से रुपये ने बमुश्किल 0.99 फीसदी की बढ़त हासिल की। यह बढ़त इस वित्तीय वर्ष में रुपये की डालर के मुकाबले 6.17 फीसदी गिरावट के सामने मामूली, अस्थायी और दिखावटी है। एक या दो दिन वाली बढ़त कभी भी गिर सकती है। 
    
रिजर्व बैंक के पूरे जोर के बाद रुपये में डालर के मुकाबले 1 फीसदी की भी बढ़त हासिल नहीं हुयी। और अब अनुमान यह है कि रिजर्व बैंक के पूरे जोर के बाद भी रुपये की गिरावट जारी रहेगी। और उसने जो अभी बढ़त हासिल की है वह चंद दिनों में गायब हो जायेगी। अभी हालत यह है कि वह रुपये की गिरावट को थामता है तो विदेशी मुद्रा भण्डार में कमी आती है। विदेशी मुद्रा भण्डार को बढ़ाता है तो रुपये की गिरावट को नहीं रोक सकता। रिजर्व बैंक के सामने आगे कुंआ पीछे खाई है। 
    
2014 में मोदी मियां ने सरकार संभाली थी तो 1 डालर 58.5 रुपये के बराबर था और अब 12 साल बाद रुपया लगातार गिरते-गिरते 96-97 रुपये तक जा पहुंचा है। और लगता है मोदी मियां इसे 100 रुपये तक पहुंचा कर ही दम लेंगे। 
    
रुपये के लगातार नीचे गिरने का मतलब आम मजदूर-मेहनतकशों के लिए क्या है? इसका मतलब है आयात (जैसे तेल, गैस आदि चीजें) का मूल्य लगातार बढ़़ता जाता है और दूसरे बदले हुए शब्दों में महंगाई का लगातार बढ़ते जाना है। या यह कहा जाए कि मजदूरों की आय और क्रय शक्ति का लगातार क्षरण होना है। मजदूरों के जीवन का और बदहाल हो जाना है। रुपये के गिरने का लाभ उन पूंजीपतियों को मिलता है जो निर्यात करने योग्य सामान बनाते हैं। आई टी साफ्टवेयर, दवा उद्योग, टेक्सटाइल आदि निर्यात करने वाले सेवा व उद्योग क्षेत्र को फायदा होता है। अम्बानी, अडाणी, टाटा, नारायणमूर्ति जैसे को रुपये के गिरने का लाभ होता। और यही नारायणमूर्ति मजदूरों को उपदेश देता है कि उन्हें सप्ताह में 70-70 घंटे काम करना चाहिए। गिरता रुपया इन धनपशुओं के लिए फायदेमंद और मजदूर-मेहनतकशों के लिए ही नहीं देश की साख के लिए भी बुरा साबित होता है। पर मोदी मियां को क्या? मजदूरों का जीवन दूभर हो या फिर देश ही रसातल में जाये।

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