‘‘GST महोत्सव’’

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मोदी सरकार ने 1 जुलाई 2017 से जीएसटी कानून लागू किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नारा दिया गया कि ‘एक राष्ट्र, एक कानून’। वैसे ऐसा नहीं था। जीएसटी की कई दरें थीं और उसके बाद भी मोदी सरकार ने इसके विरोध और कई राज्यों में चुनाव के दौरान जीएसटी दरों में कई बार बदलाव किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह नारा भी अन्य नारों की तरह ही जुमला साबित हुआ। 
    
इस बीच मोदी सरकार जीएसटी के फायदे गिनाती रही। वित्तीय वर्ष 2018-19 में जी एस टी से 11.78 लाख करोड़ रुपये एकत्र हुए, वहीं 2024-25 में यह राशि बढ़कर 22.08 लाख करोड़ रुपये हो गई। यानी छह साल में जीएसटी का संग्रह लगभग दोगुना हो गया। और इसकी वाह-वाही की गई। दरअसल यह वृद्धि मजदूरों-मेहनतकशों व गरीबों से अप्रत्यक्ष रूप से वसूली गई है।
    
21 सितंबर 2025 की रात को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित किया। और 22 सितंबर से जीएसटी की दरों में भारी बदलाव लागू करने की घोषणा की। जिसकी तैयारी वह 15 अगस्त के भाषण से ही शुरू कर चुके थे। वैसे नरेंद्र मोदी जब भी रात के समय देश को संबोधित करते हैं तो देश की जनता के ऊपर तबाही ही लादते हैं। 
    
मोदी सरकार द्वारा 1 जुलाई, 2017 से अगस्त 2025 तक लगभग 128 लाख करोड़ रुपये जीएसटी से वसूल किए गए हैं। ऑक्सफैम के एक अनुमान के मुताबिक इसमें से लगभग 64 प्रतिशत यानी लगभग 80 लाख करोड़ टैक्स नीचे की आबादी के सबसे गरीब 50 प्रतिशत मजदूर मेहनतकशों से वसूला गया।
    
वहीं ऊपर के अमीरों से 3 प्रतिशत यानी लगभग चार लाख करोड़ वसूले गए। इसी से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि मोदी सरकार ने गरीब मेहनतकशों से किस तरीके से टैक्स की वसूली की। 
    
ये 8 साल मजदूरों-मेहनतकशों के लिए सबसे भयंकर तबाही लाने वाले साल रहे। इन आठ सालों में नोटबंदी के असर से गरीब मेहनतकशों के साथ-साथ, स्वरोजगार और छोटे दुकानदार-व्यापारी और लघु उद्यमी तबाह-बर्बाद हुए। उसके बाद जीएसटी की मार भी इसी तबके पर सबसे ज्यादा हुई।
    
इन्हीं 8 सालों के दौरान कोरोना महामारी आई और इसमें सरकार की नाकामी और बाद में देशभर में लगे लॉकडाउन के कारण मजदूरों-मेहनतकशों के काम धंधे छूट गए। और पहले से ही तबाह-बर्बाद लोगों की कमर और ज्यादा टूट गई। स्थिति कितनी भयंकर है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सरकार खुद मान रही है कि वह 80 करोड लोगों को 5 किलो राशन मुफ्त दे रही है। यानी लोग दो वक्त की रोटी के लिए भी मोहताज हो चुके हैं। 
    
इस स्थिति में भी पिछले 8 वर्षों में सरकार ने जीएसटी के लगभग 64 प्रतिशत यानी लगभग 80 लाख करोड़ रु. टैक्स सबसे गरीब 50 प्रतिशत मजदूरों-मेहनतकशों से वसूला। 
    
आज देश की गिरती अर्थव्यवस्था और बढ़ती महंगाई के कारण मोदी सरकार को जीएसटी की दरों में बदलाव करना पड़ रहा है और वह इसे एक महोत्सव के रूप में प्रचारित करने की कोशिश कर रही है। और इसमें पूरी भाजपा को लगा दिया गया है जो महंगाई घटने को मोदी का दिवाली तोहफा बता प्रचार कर रही है। दरअसल जीएसटी कम करने के पीछे ट्रम्प द्वारा भारतीय मालों पर थोपे गये टैरिफ भी एक कारण है। जी एस टी कम कर सरकार भारतीय मालों की खपत भारतीय बाजार में बढ़ाना चाहती है। इस तरह अमेरिका को घटे निर्यात से पूंजीपतियों को होने वाले नुकसान को वह भारतीय बाजार में उनकी बिक्री बढ़ाकर पूरा करना चाहती है। जीएसटी महोत्सव दरअसल भारतीय जनता को अधिक से अधिक खरीद करने की ओर धकेलना है जिसका लाभ पूंजीपतियों को पहुंचना है। 
    
हिंदू फासीवादी अपनी हरकतों से बाज नहीं आते। यहां भी वह हिंदुओं को लुभाने के लिए पहली नवरात्रि के दिन से इसे लागू कर रहे हैं।
    
पर यह ‘‘महोत्सव’’ भी एक जुमला ही साबित होगा क्योंकि व्यापारियों ने जीएसटी में मिली ‘‘छूटों’’ का लाभ उठाने के लिए पहले से ही वस्तु की कीमतें बढ़ानी शुरू कर दी हैं।

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