परेशान हाल अंधभक्त और उनके आका

Published
Sun, 08/16/2026 - 15:50
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आजकल ‘अंधभक्त’ शब्द सड़कों से लेकर संसद तक चर्चा का विषय बना हुआ है। सड़क तो क्या संसद में भी इसा शब्द के कारण बवाल मच गया। सड़क हो या संसद बवाल इसलिए मचा कि अंधभक्तों की कहीं भी कमी नहीं है। संसद में तो खैर इनका बहुमत है परन्तु सड़कों की बात और है। सड़कों में अब अंधभक्त संभल कर चलते हैं। कुछ समय पहले तक ये सड़कों के बादशाह थे। अब अंधभक्त उपहास के पात्र हैं। इन पर मीम्स, रील बनते हैं। और जो कोई मोदी सरकार की कुछ तारीफ करता है तो उसे तुरंत ‘अंधभक्त’ का तमगा मिल जाता है। अब अंधभक्त ही नहीं बल्कि अंधभक्ति की फैक्टरी चलाने वाले भी तर्क, संवाद, प्रश्न पूछने आदि की बातें करने लगे हैं। हर कोई आसानी से जान सकता है कि यह सब एक पैंतरा है। हालिया छात्र-युवा उभार के बाद संघ परिवार के प्रमुख जो कि अपने को अपने परिवार का ही नहीं बल्कि देश का अभिभावक कहलवाना पसंद करते हैं, ने जेन-जी, जेन-अल्फा पीढ़ी को सम्बोधित किया। उन्होंने यह पैंतरा इसलिए चला ताकि अंधभक्तों की नयी पीढ़ी पैदा की जा सके। उन्हें ढंग से पता है यदि यह पीढ़़ी उनके हाथ से निकल गयी तो उनका सब कुछ चला जायेगा। भविष्य में अस्तित्व भी मिट जायेगा। 
    
मोदी हो या भागवत इनकी राजनीति और संगठन के विकास की शर्त ही अंधभक्ति है। अंधभक्त का अर्थ क्या है? अंधभक्त का अर्थ ही एक ऐसा व्यक्ति है जो अपने दिमाग का इस्तेमाल या तो करता ही न हो या कम से कम करता हो। तर्क करना, तथ्यों की जांच-पड़ताल करना, विरोधी की बात को सुनना, अपनी गलत बातों, तथ्यों व तर्कों पर खेद व्यक्त करना और उन्हें सुधारना, इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या करना, धर्म या आस्था को व्यक्ति की पसंद या उसका अधिकार मानना, खुले दिलो-दिमाग का होना, जनवादी (डेमोक्रेट) होना जैसे गुण अंधभक्तों में नहीं मिलते हैं। इसके उलट वे अपने नेता, अपनी पार्टी, अपने संगठन, अपने मत के अंधे अनुयायी होते हैं। इस तरह से अंधभक्त गैर जनवादी होते हैं और समाज के पिछड़े विचारों, सड़ी-गली मान्यताओं, इंसान विरोधी रीति-रिवाजों व सामंती संस्कृति के कट्टर अनुयायी होते हैं। और इस तरह से कूपमंडूकता, संकीर्णता, जिद्दीपन, आक्रामकता, कट्टरता, हिंसा इनमें कूट-कूट कर भरी होती है। इस सब की नुमाइश आये दिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ-भाजपा और उनसे जुड़े संगठन-संस्थाओं के लोग करते हैं। बजरंग दल, गौ रक्षा दलों के आतंक के शिकार लोगों की संख्या तो सैकड़ों में है। 
    
अंधभक्ति वैसे तो किसी भी देश, किसी भी राष्ट्र, किसी भी समाज के लिए खतरनाक है परन्तु यह अपने आप में उस व्यक्ति के भी खिलाफ है जो जाने-अनजाने अंधभक्त बन जाता है। अंधभक्तों में एक बहुत बड़ी संख्या आम लोगों की है। वे जानते ही नहीं हैं कि वे एक ऐसी साजिश के शिकार हैं जिसका लक्ष्य तर्क, विज्ञान को तिलांजलि देकर मध्ययुगीन मूल्यों से संचालित एक फासीवादी समाज बनाना है। जैसा समाज हिटलर ने जर्मनी में तो मुसोलिनी ने इटली में पिछली सदी के तीसरे-चैथे दशक में बनाया था। मजे की बात यह है कि संघ-भाजपा के संस्थापक उन्हीं के अनुयायी थे। आज इन्होंने भले ही कोई बाना ओढ़ लिया हो परन्तु इनके मूल विचार व मूल उद्देश्य आज भी नहीं बदले हैं। ये अपनी विचारधारा को हिन्दुत्व व मूल उद्देश्य भारत में हिन्दू राष्ट्र कायम करना बतलाते रहते हैं। 
    
अंधभक्त और उनके प्रभु नेता भारत के अतीत का अंधा गुणगान करते हैं। और ये अक्सर भूल जाते हैं कि भारत की प्राचीन ज्ञान व दार्शनिक परम्परा विविधता से भरी थी और उसमें निरीश्वरवादी परम्पराओं का वर्चस्व था। मीमांसा, न्याय, वैशेषिक, योग, सांख्य, बौद्ध, जैन व लोकायत तो निरीश्वरवादी थे। सिर्फ वेदान्त को मानने वाले ही ईश्वरवादी थे। और कदाचित, अंधभक्त महात्मा बुद्ध के ‘केस मुत्ति सुत्त’ या ‘कालाम सुत’ को पढ़ लें तो ये उन्हें आज की भाषा में ‘अरबन नक्सल’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग का सदस्य’, ‘धर्म-राष्ट्र-संस्कृति विरोधी’ और न जाने क्या-क्या घोषित कर देंगे। 
    
महात्मा बुद्ध कहते हैं कि ‘हे कालमाओ किसी बात को इसलिए मत मान लो कि तुमने सुना है कि ऐसी परम्परा है कि वह एक अफवाह है कि वह तुम्हारे धर्मग्रंथ में लिखी है कि वह तुम्हारे गुरू ने जो कि अपने आप प्रमाण है ने कही है कि वह स्वयंसिद्ध है आदि। फिर आगे वे कहते हैं कि वह बात अगर तुम्हारे तर्क से शुभ व सही है तब उसे स्वीकार करो।’ महात्मा बुद्ध की बात आज के संदर्भों से जोड़ कर देखी जाए तो एक वैज्ञानिक दृष्टि देती है। विज्ञान का तकाजा है कि पहले संदेह करो (डाउट एवरीथिंग), तर्क करो और प्रयोग की कसौटी पर कसो और फिर तब उसे स्वीकार करो। 
    
अंधभक्त को न तो तर्क से, न विज्ञान से, न भारत की महान ऐतिहासिक दार्शनिक व ज्ञान परम्परा से और न ही भारत के वर्तमान या भविष्य से कोई लेना-देना है। और यह भी सच है कि अंधभक्त जिनका अनुयायी है उनका भी इससे कोई लेना-देना नहीं है। वे पौराणिक कथाओं को इतिहास का दर्जा देना चाहते हैं और अपने कुटिल हितों को आस्था का आवरण पहनाकर परम सत्य का दर्जा दिलाना चाहते हैं। मोदी-योगी-भागवत आदि की अधिकांश बातें ऐसी ही हैं। इनके श्रीमुख से यह सब सुनकर अंधभक्त इनका सड़कों का उन्मादी सिपाही बन जाता है। 
    
एक सदी से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ धर्म व राष्ट्र के नाम पर अंधभक्तों की पीढ़ी दर पीढ़ी तैयार करता रहा और असल में उसका न तो धर्म से और न ही कथित राष्ट्र से कोई लेना-देना है। वर्तमान छात्र-युवा उभार ने अंधभक्तों को छकाया-परेशान किया है; उपहास का पात्र बनाया है; कईयों को अंधभक्ति के चंगुल से भी छुड़ाया है परन्तु जब तक अंधभक्तों के आका और उन आकाओं को पालने वाले बड़े आका बने रहेंगे तब तक अंधभक्ति का कारोबार खत्म नहीं हो सकता है। यानी इनके आकाओं के आका भारत का एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग है। इसमें सबसे बड़े नुमांइदे अडाणी, अम्बानी, बिड़ला, मित्तल आदि हैं। ये सभी भारत के सबसे बड़े पूंजीपति आये दिन वही धार्मिक कूपमंडूकता व प्रपंच का खेल खेलते है जो मोदी-योगी-भागवत खेलते हैं। इसलिए अंधभक्तों को निशाना बनाना तो आसान है पर उन्हें निशाने पर लेना कठिन है जो अंधभक्तों के आका हैं। पर उससे भी कठिन है आकाओं के आका को निशाने पर लेना। इनको निशाने पर लेना एक ऐसे इंकलाब की मांग होगी जिसके निशाने पर पूरी पूंजीवादी व्यवस्था होगी।
    
दुनिया में ऐसे अनेकोनेक उदाहरण मिलते हैं जब समाज के छात्र-युवाओं ने पुरानी सड़ती-गलती समाज व्यवस्था के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया था। और समाज के मजदूर-किसानों, शोषित-उत्पीड़ित आदमी-औरतों को जगा दिया था। समाज में बदलाव की शुरूवात छात्र-युवाओं के विद्रोही तेवरों से हुयी और फिर समाज के मजदूर-मेहनतकश इंकलाब के लिए तैयार हो गये। हमारे देश के पड़ोसी देश चीन में पिछली सदी में 4 मई का आंदोलन एक ऐसा ही आंदोलन था। भारतवर्ष को भी एक ऐसे बदलाव, इंकलाब की जरूरत है जो भारत में शोषण-उत्पीड़न-दमन के सभी किलों को ध्वस्त कर दे। 
    
आज का भारत दोराहे पर खड़ा है। फासीवादी बर्बरता अपना मुंह बाये खड़ी है। अंधभक्ति उसका एक औजार और तरीका है। ज्ञान नहीं वह अज्ञान का पोषक है। और हमेशा ही अज्ञान मानव जाति पर विपदा, अभिशाप या त्रासदी के रूप में कहर बरपाता रहा है। कभी काल माक्र्स ने कहा था, ‘‘अज्ञान एक राक्षसी शक्ति है और हमें डर है कि यह कई त्रासदियों का कारण बनेगा।’’ माक्र्स की यह चेतावनी आज के भारत के लिए भी है जहां सड़क से लेकर संसद तक अज्ञान का अंधभक्ति का बोलबाला है। बस सुकून की बात इतनी है कि फिलवक्त, किसी तरह से, अंधभक्त ‘जेन-जी’ व ‘जेन-अल्फा’ पीढ़ी के निशाने पर आ गये हैं। 
    

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