आर एस एस के कार्यक्रम में जाने के लिए सरकारी कर्मचारियों पर लगा प्रतिबंध हटा

9 जुलाई को कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने एक पत्र जारी किया जिसके अनुसार केंद्र सरकार के कर्मियों पर आर एस एस के कार्यक्रमों में शामिल होने पर लगे प्रतिबंध को हटा लिया गया है। 30 नवंबर 1966, 2 जुलाई 1970 और 28 अक्टूबर 1980 को जारी किये पत्रों के जरिये आर एस एस के कार्यक्रमों में जाने पर कर्मचारियों के जाने पर रोक लगायी गयी थी। हालांकि इसमें जमाते इस्लामी भी शामिल था। नये फैसले में जमाते इस्लामी पर प्रतिबंध जारी रहेगा।

कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के द्वारा जारी किये गये पत्र के बाद देश में इस पर अलग-अलग कोणों से विरोध होना शुरू हो गया है। आर एस एस पर सरदार बल्लभ भाई पटेल द्वारा गांधी की हत्या के बाद लगाए गये प्रतिबंध की बात उठाते हुए कहा जा रहा है कि आर एस एस एक हिंदू राष्ट्र की सोच वाला संगठन है और इसके कार्यक्रमों में जाने पर कर्मचारियों का इसकी विचारधारा से प्रभावित होना निश्चित है और फिर कर्मचारी संविधान की भावना (धर्मनिरपेक्षता) के अनुरूप काम नहीं कर पाएंगे।

इसी तरह कुछ लोग कह रहे हैं कि आर एस एस और मोदी के बीच चल रहे अंतर्विरोध को दूर करने के लिए मोदी ने आर एस एस को खुश करने के लिए यह कदम उठाया है। ताकि आने वाले समय में हरियाणा, महाराष्ट्र आदि राज्यों में होने वाले चुनावों में उसे आर एस एस का समर्थन मिल सके।

कुछ लोग आर एस एस को संविधान विरोधी सोच का मानते हैं और मोदी सरकार द्वारा 400 सीटें हासिल कर संविधान न बदल पाने की कोशिश नाकाम होने पर इस फैसले को लागू कर कर्मचारियों के जरिये संविधान विरोधी कार्य करने की कोशिश करना मानते हैं।

वहीं कोई ऐसे भी निष्कर्ष निकालते हैं कि इस फैसले से कोई खास असर नहीं पड़ेगा। उनके ऐसा मानने के पीछे तर्क है कि देश में राज्य और केंद्र के कर्मचारियों की संख्या 1.40 करोड़ है। इसमें केंद्र के करीब 32-35 लाख कर्मचारी हैं। राज्यों में जहां भाजपा की सरकारें हैं वहां कर्मचारी वैसे भी आर एस एस के कार्यक्रमों में शामिल होते हैं और जहाँ भाजपा की सरकारें नहीं हैं वहां कर्मचारी वैसे भी आर एस एस के कार्यक्रमों में भाग नहीं ले पाएंगे। वे इस फैसले को राजनीतिक फैसला मानते हैं जो राजनीतिक परिद्वंदिता (मोदी-योगी) के कारण लिया गया है। चूँकि मोदी कमजोर हो रहे हैं इसलिए वे आर एस एस का समर्थन पाने के लिए ऐसा कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश या अन्य राज्यों में कांवड यात्रा के दौरान नाम लिखने के लिए दिये गये कई मुख्यमंत्रियों के आदेशों के बाद मोदी को यह काम करने के लिए जल्दबाजी में उठाया गया कदम है, ऐसा वे मानते हैं।

कुछ का कहना है चूँकि आर एस एस भले ही अपने आपको सांस्कृतिक संगठन कहता है और चुनाव नहीं लड़ता है परन्तु वह भाजपा के लिए एक जमीन बनाता है। ऐसे में यह आदेश गलत है।

दरअसल मध्य प्रदेश की अदालत में एक याचिका (सरकारी कर्मचारियों के आर एस एस के कार्यक्रमों में शामिल होने पर प्रतिबंध के सम्बन्ध में) पर चल रहे मुकदमे के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार से यह जानना चाहा था कि आर एस एस के कार्यक्रमों में शामिल होने पर प्रतिबंध के सम्बन्ध में क्या स्थिति है। इसके जवाब में कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने यह आदेश जारी किया है जिसके अनुसार 1966, 1970 और 1980 में जारी किये ज्ञापनों से आर एस एस का नाम हटा लिया गया है और इसके बाद आर एस एस के कार्यक्रमों में जाने को सरकारी कर्मचारियों को छूट मिल जाएगी।

अलग-अलग कोण से उठ रहे सवालों में कुछ सच्चाई भी है जो तत्काल परिस्थितियों में दिखाई दे रही है। लेकिन मोदी या भाजपा और संघ को अलग-अलग देखना और यह मानना कि मोदी और संघ में कोई अंतर्विरोध है ठीक नहीं है। वरन मोदी ने पिछले 10 सालों में संघ की विचारधारा को बखूबी आगे बढ़ाया है। एक तरफ पूंजी और दूसरी तरफ आर एस एस के एजेंडों को पूरा करने के लिए मोदी ने 18-18 घंटे काम किया है।

हाँ, यह बात सच है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत नहीं मिला और उसे गठबंधन की सरकार बनानी पड़ी लेकिन इसकी वजह यह नहीं है कि आर एस एस ने भाजपा के लिए प्रचार नहीं किया। उत्तर प्रदेश में उसे जरूर झटका लगा है लेकिन इसकी पूर्ति बाकी राज्यों में बढ़े मत प्रतिशत ने दिखाया है कि हिंदू फ़ासीवादियों का प्रभाव कहीं से कमतर नहीं हुआ है। अगर कहीं झगड़ा है तो इस बात का कि सत्ता पर नियंत्रण किसका रहे। संघ का या भाजपा का। इसी तरह भाजपा के अंदर भी झगड़ा इसी बात का है कि सत्ता की मलाई कौन ज्यादा खायेगा। भाजपा का बहुमत में न आना मोदी के आगे बाकी प्रतिद्वंदियों को मज़बूती दे देता है। लेकिन यह बात तय है कि सत्ता में जो कोई भी आएगा वह हिटलर की तरह ही तानाशाह होगा क्योंकि आज पूंजीपति वर्ग को उसी की जरूरत है। मोदी को सत्ता तक पहुँचाने में जितनी भूमिका आर एस एस की है उससे कहीं ज्यादा भूमिका पूंजी की है। और जितने भी कोणों से 9 जुलाई को आदेशित पत्र में बातें उठ रही हैं उनमें पूंजी का चरित्र का कहीं जिक्र तक नहीं है।

आज अगर ऐसे आदेश पारित हो रहे हैं तो वे निश्चित रूप से आर एस एस की जकड़ को सरकारी सिस्टम पर और ज्यादा मज़बूत करेंगे लेकिन आर एस एस ऐसा करके पूंजी की व्यवस्था की रखवाली कर रहा होगा यह बात स्पष्ट होना बहुत जरूरी है।

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