9 मई को पं.बंगाल का नया मुख्यमंत्री एक पूर्व कांग्रेसी, एक पूर्व तृणमूली बन चुका है। इस आदमी का नाम शुभेन्दु अधिकारी है। इससे पहले असम का मुख्यमंत्री एक पूर्व कांग्रेसी हिमंत बिस्वा सरमा ही था और आगे भी रहेगा। पूरा जीवन संघ व भाजपा में खपाने वाले ‘अविवाहित’, ‘कर्मठ’, ‘जुझारू’, ‘ईमानदार’, ‘समर्पित’ कार्यकर्ता व नेता अंदर ही अंदर सोचते होंगे कि पेड़ लगाया हमने और फल खा रहा है कोई और।
ऐसा सिर्फ अभी पं. बंगाल-असम में नहीं हो रहा है बल्कि अभी हाल में बिहार में हो गया। संघ-भाजपा के महान-महान कर्मठ-समर्पित कार्यकर्ताओं को छोड़कर एक पुराने लालू के भक्त रहे सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बना दिया गया। संघ-भाजपा के हिसाब से सम्राट चौधरी का राजनैतिक जीवन का जन्म तब हुआ जब बिहार में कथित तौर पर ‘जंगल राज’ था। जंगल राज में जन्मा चौधरी भाजपा राज में बिहार का मुख्यमंत्री है।
शुभेन्दु अधिकारी, हिमंत बिस्वा सरमा, सम्राट चौधरी आदि का उत्थान संघ-भाजपा की एक बहुत बड़ी कमजोरी को दिखलाता है कि इनकी पाठशाला बेकार हो गयी है। इनकी जमीन उपजाऊ नहीं रही। बेचारों को नेता बनाने के लिए पुराने घाघ कांग्रेसी या विपक्षी पार्टी के नेता ही मिलते हैं। असम, बंगाल, बिहार में एक भी ऐसा खरा संघी-भाजपाई नहीं है जिसे मुख्यमंत्री बनाया जा सके। वैसे तो केन्द्र से लेकर अनेकों-अनेक राज्यों में जहां-जहां भाजपा की सरकार है वहां के कई-कई मंत्री पुराने घाघ कांग्रेसी ही हैं।
अब तक तो भाजपा का मोदी-शाह काल में काफी कांग्रेसीकरण हो गया है। कहीं ऐसा न हो, किसी दिन ऐसा हो कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को अपना सर संघ संचालक भी किसी पुराने-धुराने कांग्रेसी को ही बनाना पड़े। वैसे तो ऐसे कई कांग्रेसी रहे हैं जिन्हें संघ अपनी प्रातः वंदना में याद करता रहता है। मदन मोहन मालवीय, सरदार बल्लभ भाई पटेल जैसे अनगिनत कांग्रेसी संघ की आत्मा के हिस्से हैं। ऐसे में कोई पुराना कांग्रेसी संघ प्रमुख बन जाये तो क्या आश्चर्य की बात होगी। बस तब ‘कर्मठ’, ‘समर्पित’, ‘ब्रह्मचारी’ संघी अपना सिर धुनते हुए नजर आयेंगे।
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