बिजली वितरण को निजी हाथों में सौंपे जाने का विरोध करते कर्मचारी
हरियाणा के गुरुग्राम और नुंह में बिजली वितरण का काम इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड को सौपें जाने का विरोध करते हुए बिजली कर्मचारियों ने तीन दिनी (22-24 अक्टूबर) हड़ताल करने का एलान कर दिया है। हरियाणा बिजली विनियामक आयोग (हरियाणा इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन) ने 19 अक्टूबर को इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड को वितरण का लाइसेंस दे दिया है। यह पहली निजी क्षेत्र की वितरण कम्पनी है जिसे हरियाणा में बिजली वितरण का जिम्मा सौंपा गया है।
बिजली कर्मचारियों के अनुसार ऐसा करके सरकार बिजली विभाग में निजीकरण की राह खोल रही है। वे हरियाणा बिजली कर्मचारी एवं इंजीनियरिंग संयुक्त मोर्चा के बैनर तले यह हड़ताल कर रहे हैं। उनकी मांग इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड को दिये गये बिजली वितरण के लाइसेंस को रद्द करने और निजीकरण पर रोक लगाने की है।
हालांकि हड़ताल के दौरान उन्होंने कहा है कि वे बिजली काटेंगे नहीं लेकिन आने वाले फॉल्टो को ठीक नहीं करेंगे। इसके साथ ही कुछ अति आवश्यक सेवाओं जैसे अस्पताल, पेयजल आपूर्ति, जेल और मिनी सचिवालय की बिजली प्रभावित नहीं होगी।
सरकार इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड को लाइसेंस दिये जाने में अपनी भूमिका से इंकार कर रही है। उसका कहना है कि हरियाणा बिजली विनियामक आयोग एक स्वायत्त संस्था है। और वे इसके खिलाफ 5-6 दिन में विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण जाएंगे। ऐसा करके वे बिजली कर्मचारियों से हड़ताल ख़त्म करने की बात कर रहे हैं।
इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड, मेदांता ग्रुप के इलेवन समूह का हिस्सा है। इस लाइसेंस के मिलने के बाद गुरुग्राम और नुंह (सोहना और मानेसर सहित) के 8.3 लाख उपभोक्ता तक इलेवन पावर की पहुंच हो जाएगी। अभी तक हरियाणा में बिजली वितरण का काम दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम करता है। एक तरफ सरकार कह रही है कि वह इस फैसले के खिलाफ है और अपीलीय न्यायाधिकरण जाएगी दूसरी तरफ यह तर्क पेश किये जा रहे हैं कि दो वितरण कम्पनियां होने से कम्पटीशन बढ़ेगा और उपभोक्ताओं को अच्छी सुविधा मिलेगी।
लेकिन बिजली कर्मचारी जानते हैं कि इस निजीकरण के बाद सरकारी कर्मचारियों की छंटनी स्वाभाविक है। किसान संगठन भी इसका विरोध कर रहे हैं। क्योंकि अभी तक देहाती क्षेत्रों में मिल रही क्रॉस सब्सिडी के बंद होने का खतरा पैदा हो गया है। इससे किसानों और देहात की गरीब आबादी पर बिल का बोझ बढ़ेगा।
ऊर्जा मंत्री अनिल बिज और मुख्यमंत्री भले ही यह कह रहे हैं कि वे निजीकरण के खिलाफ हैं लेकिन सच्चाई यही है कि वे ऐसा करके अपने आपको भोला साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। अगर वे निजीकरण के खिलाफ ही होते तो फिर पहले से ही इसे रोकने के लिए कदम उठाते। असल में निजीकरण की राह खोल वे सरकारी कम्पनी दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम के बंद होने की राह खोल रहे हैं।
और ऐसा हो भी क्यों न। जब नीति ही उदारीकरण और निजीकरण की हो तो सरकार सरकारी संस्थानों का निजीकरण ही करेगी। उत्तर प्रदेश भी बिजली कर्मचारी निजीकरण के खिलाफ लड़ाई रहे हैं। अभी हाल में आई डी बी आई का निजीकरण भी इसी नीति के अनुसार हुआ है। इससे पहले और आगे भी निजीकरण की प्रक्रिया जारी रहनी है जब तक कि निजीकरण उदारीकरण की नीतियों को पलट न दिया जाए। और इसके लिए किसी एक संस्थान या विभाग के मज़दूर-कर्मचारी नहीं देश के व्यापक मज़दूर वर्ग की एकजुटता जरूरी होगी।