जंगल में मोर नाचा किसने देखा

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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आर एस एस) को अपने जन्म शताब्दी वर्ष में एक काम यह करना चाहिए कि उन्हें अपना नाम, भारत में बदल देना चाहिए। उन्हें अपने नाम के आगे से ‘राष्ट्रीय’ शब्द हटाकर ‘हिन्दू’ कर लेना चाहिए। असल में अमेरिका, कनाडा में तो उनका नाम ‘हिन्दू स्वयं सेवक संघ’ (एच एस एस) ही है। ऐसा करने से उन्हें वह सब पाखण्ड-प्रपंच, वर्तमान में व अतीत के साथ भी नहीं करना पड़ेगा जो उन्हें ‘राष्ट्रीय’ शब्द के कारण करना पड़ता है। 
    
राष्ट्रीय शब्द के कारण बेचारों को कितनी मुसीबत उठानी पड़ती है। राष्ट्रीय आजादी, राष्ट्रीय एकता, राष्ट्रीय सौहार्द शब्द उनके पीछे पड़ जाते हैं। राष्ट्रीय एकता व सौहार्द के लिए बेचारे भागवत जी जैसे चितपावन ब्राह्मण को अपने बुढ़ापे में मौलवियों के साथ उठना-बैठना पड़ता है। भारत के मुसलमानों का ‘डी एन ए’ अपना जैसा बताना पड़ता है। खैर! सबसे ज्यादा मुसीबत इनके लिए राष्ट्रीय आजादी की लड़ाई को लेकर आ जाती है। कैसे साबित करें कि जब पूरा भारत आजादी की लड़ाई लड़ रहा था तब वे क्या कर रहे थे। भारी मशक्कत के बाद एक किस्सा ‘जंगल सत्याग्रह’ का उछाला गया। 
    
बताया जा रहा है आर एस एस के संस्थापक आदिगुरू डा. हेडगेवार ने ‘21 जुलाई 1930 को यवतमाल जिले के लोहारा जंगल में सत्याग्रह किया था। इस सत्याग्रह के कारण उन्हें 9 महीने की कठोर कैद की सजा हुई’। और इस 9 महीनों में हेडगेवार ने आर एस एस के विस्तार और शाखाओं को बढ़ाने की योजना बनाई। अब मोदी सरकार यवतमाल जिले में एक संग्रहालय का निर्माण ‘‘जंगल सत्याग्रह’’ की घटनाओं को समर्पित करते हुए करा रही है। 
    
इस ‘‘जंगल सत्याग्रह’’ और ‘‘9 महीने की कैद’’ के बाद हेडगेवार साहब ने और क्या-क्या किया इसका विवरण बेचारे आर एस एस के इतिहासकार नहीं दे पाते हैं। बड़ी खोजबीन के बाद तो पता चला था कि उनकी आजादी की लड़़ाई का मोर जंगल में नाचा था। हो सकता है मोर की निगाह अपने पांव में पड़ गयी होगी तभी वह आगे नहीं नाचा होगा। अब मोदी सरकार सबको वह नाच दिखाने के लिए संग्रहालय बना रही है ताकि कोई यह न कह सके कि आजादी की लड़ाई के दिनों में आर एस एस कहां था। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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