कोई भी बात उठाओ, बात इंकलाब तक जायेगी

/koi-bhi-baat-uthaao-baat-inqlab-tak-jayegi

भारत का चुनाव आयोग सवालों से घिरा हुआ है। विडम्बना यह है कि चुनाव आयोग पर जो सवाल उठाए गये हैं, उन सवालों का उसके पास कोई ठीक जवाब नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपनी प्रेस कान्फ्रेस को फिल्मी वह भी हिन्दी बम्बईया फिल्मी डायलाग में बदल दिया। उनके पास न तो विपक्षी पार्टी खास तौर पर राहुल गांधी के सवालों का जवाब था और न ही प्रेस कांफ्रेस में चुभते सवाल उठाने वाले पत्रकारों के सवाल का जवाब था। इस प्रेस कांन्फ्रेस के बाद चुनाव आयोग ने अपने को और ज्यादा बेपर्दा कर दिया। चुनाव आयोग ने अपनी गिरती साख को और गिरा दिया। 
    
चुनाव आयोग के साथ ऐसा क्यों हुआ? ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि चुनाव आयोग में ऐसे लोग ही चुन-चुन कर बिठाये गये हैं जो मोदी व शाह के इशारे पर नाचें। और ऐसे में चुनाव आयोग की साख पर बट्टा लगना ही था और वह लग गया। 
    
जो चुनाव आयोग के साथ हो रहा है या हुआ है, क्या वह अन्य संवैधानिक संस्थाओं या पदों के साथ नहीं हो रहा है। ठीक ऐसा ही हो रहा है। चंद रोज पहले ही भारत के उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का मामला ऐसा ही है। भारत में राष्ट्रपति के पद के बाद दूसरा बड़ा पद उप राष्ट्रपति का है। वे राज्य सभा के सभापति भी होते हैं। जिस तरह से ‘टूटी खाट’ किसी काम की नहीं होती ठीक उसी तरह धनखड़ जी को बता दिया गया कि अब आप किसी काम के नहीं हो। अब काम के आदमी को खोजा गया है। 
    
ठीक ऐसा ही कुछ हाल भारत के अन्य संवैधानिक पदों का भी है। राज्यपाल जो कि केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त किये जाते हैं विपक्षी पार्टियों की जहां सरकारें हैं वहां वे एक ही काम करते हैं कि कैसे सरकार को न चलने दिया जाये। कैसे उसके काम में रोड़े लगाये जायें और कैसे भाजपा को प्रत्यक्ष या परोक्ष ढंग से फायदा पहुंचाया जाये। 
    
क्या भारत की संसद या महान उच्चतम न्यायालय का हाल कुछ ठीक है। संसद को मोदी जी ने वहां पहुंचा दिया है जहां या तो उनकी प्रशंसा में नारे लगें या फिर हिन्दू फासीवादी एजेण्डा और उससे भी ज्यादा देशी-विदेशी पूंजी के फायदे के विधेयक पास हों। यह तो गनीमत है कि पिछले आम चुनाव में चार सौ पार नहीं हुए अन्यथा भारत ‘‘चुनावी निरंकुशशाही’’ से ‘‘बंद निरंकुशशाही’’ में बदल जाता। यानी मोदी जी रूस के पुतिन या कुवैत के शेख में तब्दील हो जाते।
    
जहां तक भारत के महान उच्चतम न्यायालय का हाल है वहां ‘मोदी काल’ में एक के बाद एक ऐसे कई मुख्य न्यायाधीश हुए हैं जिन्होंने बार-बार साबित किया कि वे भी रंजन गोगोई बनने को तैयार हैं। पिछले एक मुख्य न्यायाधीश ने अपने यहां गणेश पूजा के वक्त जितनी भगवान गणेश की पूजी की उससे कम मोदी जी की पूजा नहीं की। देश को उन्होंने संदेश दिया कि यही हमारा काल है, और यही हमारी मर्यादा है। 
    
ऐसा क्यों हो रहा है कि भारत की संवैधानिक संस्थाएं या पद क्रमशः बौने और खोखले साबित हो रहे हैं। इसी सवाल को भारत की विपक्षी पार्टियां और कई विद्वान व बुद्धिजीवी ‘लोकतंत्र खतरे में है’ या ‘‘संविधान खतरे में है’’ के रूप में उठाते हैं। और एक ज्यादा बेहतर सुलझे रूप में यह प्रश्न इस रूप में सामने आता है कि ‘भारत में हिन्दू फासीवाद का खतरा मंडरा रहा है’। 
    
मामले को ठीक और वैज्ञानिक रूप से समझने में यही बात सबसे ज्यादा मदद करती है कि वास्तव में आज का भारत, हिन्दू फासीवाद की दहलीज पर खड़ा है। और आज के भारत की तकदीर, इस बात से ही तय होनी है कि इस संकट का मुकाबला कैसे कर किया जाता है। वे कौन सी ताकतें हैं जो इस हिन्दू फासीवादी मायावी राक्षस की गिरफ्त में भारत को जाने से रोक सकती हैं। 
    
भारत में कम ही लोग हैं जो इस बात को ढंग से विवेचित और प्र्रस्तुत कर पाते हैं कि भारत को हिन्दू फासीवादी नागपाश में लेने के लिए मुख्य हिन्दू फासीवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने पूरी एक सदी लगा दी है। हिन्दू फासीवादी संगठन ने भारतीय समाज को अपनी गिरफ्त में लेने के लिए रात-दिन एक कर दिया। समाज के हर क्षेत्र में हर अंग में उसने बिलकुल योजनाबद्ध ढंग से पैठ की और एक-एक करके हर संस्था को निगलना शुरू कर दिया। आज हिन्दू फासीवादी भारतीय राजसत्ता के पोर-पोर में या तो घुस गये हैं या फिर घुसने की तैयारी में लगे हैं। क्या तो न्यायालय, क्या तो नौकरशाही, क्या तो सेना-पुलिस।
    
हिन्दू फासीवाद को संसाधनों की कमी न हो इसका बंदोबस्त आजादी की लड़ाई के दिनों में सबसे प्रतिक्रियावादी तत्वों-सामंती राजे-रजवाड़ों-धन्ना सेठों व हिन्दू बड़े व्यापारियों ने किया। और आजादी के कुछ समय तक तो ये लोग ही उसके मुख्य पैरोकार थे। परन्तु अस्सी का दशक आते-आते, उसे, भारत के बड़े-बड़े उद्योगपतियों-पूंजीपतियों का भी संरक्षण मिलने लगा। आज स्थिति क्या है? आज भारत के सबसे बड़े आठ-दस पूंजीवादी एकाधिकारी घराने (अम्बानी-अडाणी-टाटा आदि) उसके सबसे बड़े वित्त पोषक हैं। हिन्दू फासीवादी आंदोलन की सारी तड़क-भड़क, दबंगई इन्हीं के बूते है। अगर ये आज अपना हाथ पीछे खींचे लें तो हिन्दू फासीवादी आंदोलन अपनी चमक खो बैठेगा। वहीं पहुंच जायेगा जहां वह पचास-साठ के दशक में था। रोता-बिसूरता हुआ। किसी के भी साथ जाने को तैयार जो कि उसे थोड़ी सी जगह दे दें। 
    
‘लोकतंत्र खतरे में है’ या ‘संविधान खतरे में है’ के नारे भारत के भविष्य के दुश्मन की पहचान ठीक से नहीं कर पाते हैं। असल में वे चुनावी जीत व हार को ही सब कुछ समझ लेते हैं। और फिर ऊपर से वे भारत के लोकतंत्र व संविधान के पूंजीपरस्त चरित्र पर एक सुनहरा पर्दा डाल देते हैं। भारत का लोकतंत्र खुद एक पूंजीवादी लोकतंत्र है। जहां पूंजी का राज है और श्रम उसका गुलाम है। और वह ऐसा ही रहे, इसका पूरा बंदोबस्त संविधान में किया गया है। किसी को शक हो तो इस संविधान की आत्मा को टटोल लें। या फिर संविधान सभा में चली बहस को पढ़-सुन ले। या फिर ‘इंकलाब जिन्दाबाद’ का नारा देने वाले हसरत मोहानी की बात को सुन ले। वे ही एकमात्र ऐसे आदमी थे जो संविधान सभा में थे पर उन्होंने संविधान की मूल प्रति में हस्ताक्षर नहीं किये थे। वे उसी समय समझ गये थे कि यह पूंजी के राज और श्रम की गुलामी का ऐसा सुनहरा दस्तावेज है जो बातें तो बहुत करता है परन्तु असल में देता बहुत कम है। संविधान सभा में जो मंथन हुआ उसमें अमृत पूंजीपतियों को और विष मजदूरों-किसानों-मेहनतकशों के गले में उतारा गया। मजदूरों-मेहनतकशों का कंठ इस विष से नीला है। और विष के प्रभाव से मुक्त होने के लिए उन्हें भगतसिंह की बात माननी पड़ेगी। ताण्डव नृत्य करना होगा। विनाश (पूंजीवाद का) और सृजन (समाजवाद का) का अद्भुत करिश्मा करना होगा।
    
ऐसे में जब ‘अद्भुत करिश्मे’ की जरूरत हो तब छोटे-मोटे मदारियों की कला से काम नहीं चल सकता है। तत्काल तो इस बात की एक आवश्यकता बनती है कि हिन्दू फासीवादी आंदोलन को चुनौती और शिकस्त दी जाए परन्तु यह ‘अद्भुत करिश्मे’ का एक अंक होगा। क्योंकि आज के सारे ‘लोकतंत्र खतरे में है’ या ‘‘संविधान खतरे में है’’ की पुकार लगाने वाले कभी नहीं चाहेंगे भारत के मजदूर-मेहनतकश ऐसा ‘अद्भुत करिश्मा’ करें जो उनका भी विनाश कर दे।     
    
किसी को लग सकता है बात इतनी बड़ी और गूढ़ नहीं है बल्कि सीधी-सादी है कि ऐसे लोग सत्ता में आ जायें जो भारत की संवैधानिक संस्थाओं या पदों या उससे भी बढ़कर व्यवस्था में गौरवपूर्ण अतीत की वापसी कर दें। एक तो ऐसा ‘‘गौरवपूर्ण अतीत’’ कभी रहा नहीं। जब भी हिन्दू फासीवादियों को अपने काले कारनामों का उत्तर देना होता है तो वे उसी ‘सुनहरे’ अतीत की मिसालें देते हैं जिसकी वापसी उनके विरोधी चाहते हैं। मजदूर-मेहनतकश जिस दिन अतीत को ढंग से समझ जायेंगे, उस दिन वे वर्तमान को बदलने में उतने ही सक्षम होंगें। और भविष्य का निर्माण भी उतनी ही कुशलता से कर सकेंगे। 

आलेख

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

/ameriki-iimperialism-ka-trade-war-cause-&-ressult

लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?

/iran-par-mandarate-yuddha-ke-badal

इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं

/prashant-bhushan-ka-afsos-and-left-liberal-ka-political-divaliyapan

गत 26 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि थी। सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस अवसर पर एक ट्वीट कि