फ्रांस में बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता

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फ्रांस में 2022 में मैक्रों के दूसरी बार राष्ट्रपति चुने जाने के बाद से शुरू हुई राजनीतिक अस्थिरता समाप्त होने का नाम नहीं ले रही है। फ्रांस में पिछले सवा साल के भीतर दो प्रधानमंत्री इस्तीफा दे चुके हैं। और अब 8 सितम्बर को संसद में विश्वास मत के प्रस्ताव के बाद तीसरे प्रधानमंत्री का इस्तीफा तय माना जा रहा है। यह राजनीतिक अस्थिरता फ्रांस में पहले से मौजूद आर्थिक संकट को और तीखा कर रही है। 
    
फ्रांस, यूरोप की एक महत्वपूर्ण शक्ति है। लेकिन यह तेजी से इसकी कमजोर कड़ी बनने की तरफ बढ़ रहा है। फ्रांस का यह ताजा संकट तब पैदा हुआ जब प्रधानमंत्री फ्रांस्वा बांयरो ने 25 अगस्त को विश्वास मत हासिल करने के लिए 8 सितम्बर की तारीख की घोषणा की। बांयरों के अनुसार फ्रांस को यूरोप की सबसे ज्यादा कर्ज और घाटे की स्थिति से निकालने के लिए यह जरूरी है। 8 सितम्बर को बांयरों जो बजट प्रस्तुत करेंगे उसमें 44 अरब यूरो के खर्च कटौती और दो राष्ट्रीय अवकाश समाप्त करने का प्रावधान है। इन प्रस्तावों ने फ्रांस में भारी आक्रोश को जन्म दिया है। इस वजह से विपक्षी पार्टियों ने इस बजट प्रस्ताव के विरोध में मत देने की घोषणाएं की हैं। इससे बांयरो की सरकार का गिरना तय माना जा रहा है।
    
फ्रांस का बजट घाटा 2024 में 168.6 अरब यूरो था। यह इसके सकल घरेलू उत्पाद का 5.8 प्रतिशत है। इस तरह यह यूरोपीय संघ के द्वारा तय तीन प्रतिशत की अधिकतम सीमा को लांघ गया है। बजट घाटा बढ़ने में कोविड महामारी के दौरान बढ़ा सरकारी खर्च और रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पैदा हुये ऊर्जा संकट से बढ़ा सरकारी खर्च प्रमुख भूमिका निभा रहा है। इस वर्ष की पहली तिमाही में फ्रांस का कर्ज बढ़कर 3.3 ट्रिलियन यूरो हो गया। यह इसके सकल घरेलू उत्पाद का 114 प्रतिशत है। बांयरो इस सब का बोझ फ्रांस की जनता पर ठेलना चाह रहे हैं। लेकिन यह इतनी आसानी से होता नहीं दिख रहा है। 
    
फ्रांस में राजनीतिक अस्थिरता के तीखे होने का बुरा असर आर्थिक जगत पर भी पड़ रहा है। एक ही दिन के भीतर पेरिस का सी ए सी 40 सूचकांक 2 प्रतिशत गिर गया। फ्रांस के दो प्रमुख बैंक बी एन पी पैरिबास और सोसाइटी जनरल के शेयर 5 प्रतिशत गिर गये। 10 वर्षीय बांडों की ब्याज दरें बढ़कर 3.5 प्रतिशत से ऊपर चली गयीं। यह बढ़ती ब्याज दरें कर्जों की अदायगी को और महंगा बनाएंगी। 
    
फ्रांस में 2017 से इमैनुएल मैक्रों राष्ट्रपति हैं। उनके पहले कार्यकाल (2017 से 2022) में भी ढेरों जन विरोधी कदम उठाये गये थे। ईंधन की कीमतों में और करों में वृद्धि की गयी। पेंशन सुधार लाने की कोशिश की गयी। इस कार्यकाल में भी इन जन विरोधी कदमों का जनता के द्वारा व्यापक विरोध हुआ। लेकिन राष्ट्रपति मैक्रों की पार्टी को संसद में बहुमत हासिल था। इसलिए उस वक्त आज के जैसी राजनीतिक अस्थिरता कायम नहीं हुई। 
    
2022 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में मैक्रों दुबारा राष्ट्रपति चुने गये। लेकिन संसद में इनकी पार्टी अल्पमत में आ गयी। मई 2022 से जुलाई 2024 तक एलिजाबेथ बोर्न प्रधानमंत्री रहीं। पेंशन सुधार इन्हीं के कार्यकाल में पास हुआ। इसके तहत सेवानिवृत्ति की उम्र 62 से बढ़ाकर 64 कर दी गयी। संसद में बहुमत नहीं होने की वजह से इन्हें कई बार अपनी सरकार के प्रस्तावों को पास कराने के लिए संविधान की धारा 49.6 का इस्तेमाल करना पड़ा। इस प्रावधान के इस्तेमाल से संसद में मत विभाजन के बगैर प्रस्ताव पास हो जाता है। एलिजाबेथ बोर्न को अंततः अपनी अलोकप्रियता की वजह से जुलाई 2024 में इस्तीफा देना पड़ा। राष्ट्रपति मैक्रों ने संसद में अपनी पार्टी को बहुमत में लाने के मकसद से समय पूर्व चुनाव करवाए। लेकिन इनकी पार्टी की सीटें और कम हो गयीं। दो माह तक मैक्रों जोड़-तोड़ करते रहे। सितम्बर 2024 में मिशेल बार्नियर प्रधानमंत्री बने। लेकिन ये फ्रांस के इतिहास में सबसे कम अवधि के प्रधानमंत्री साबित हुए। इन्हें तीन माह के भीतर इस्तीफा देना पड़ा। इन्होंने भी धारा     49.3 का इस्तेमाल कर अपने कटौती प्रस्तावों को पास कराने की कोशिश की। इसकी वजह से विपक्षी पार्टियां इनके खिलाफ अविश्वास मत ले आईं। 577 सदस्यीय संसद में इस अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 331 वोट पड़े। इस बजट से बार्नियर को 4 दिसम्बर 2024 को इस्तीफा देना पड़ा। 
    
अब नौ महीने के भीतर फ्रांसीसी संसद में फिर से वैसी ही स्थिति पैदा हो गयी। फ्रांस्वा बांयरो संसद में अपनी तरफ से विश्वास मत लेकर आए हैं। उन्होंने मसीहाई अंदाज में घोषणा की है कि फ्रांस को कयामत से बचाने के लिए कर्ज पर नियंत्रण जरूरी है। उन्होंने एक जुआरी की तरह अपनी प्रधानमंत्री की कुर्सी को दांव पर लगाया है। अगर वे विश्वास मत हासिल कर लेते हैं तो एक समय तक बेखटके कटौतियां करते रह सकते हैं। विश्वासमत हासिल न कर पाने की स्थिति में वे प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर फ्रांस की आर्थिक गिरावट का ठीकरा विपक्षी पार्टियों के मत्थे मढ़ सकते हैं। 
    
फ्रांस की राजनीतिक-आर्थिक अस्थिरता आगे और भी करवटें बदलेंगी। फ्रांस जैसा ताकतवर देश भी आज अपने संकटों का समाधान नहीं कर पा रहा है। यह वैश्विक संकट की विकरालता की एक बानगी है।  

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