नेपाल में बहुप्रतीक्षित चुनाव सम्पन्न हो गये। चुनाव में 4 वर्ष पूर्व बनी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को भारी बहुमत से जीत हासिल हुई। 165 सीटों पर हुए प्रत्यक्ष चुनाव में यह पार्टी 125 सीटें जीतने में सफल रही। आनुपातिक प्रणाली को मिलाकर इसे कुल 275 सदस्यीय सदन में 183 सीटें प्राप्त हुईं। शेष परम्परागत पार्टियों नेपाली कांग्रेस, नेकपा-माओवादी व एमाले आदि बेहद कम सीटों पर सिमट गयीं। काठमांडू के पूर्व मेयर बालेन्द्र शाह का प्रधानमंत्री बनना तय हो चुका है।
4 वर्ष पूर्व टी वी शो संचालक रवि लिमिछाने ने राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी गठित की थी। तब प्रचण्ड के नेतृत्व वाली सरकार में वे उप प्रधानमंत्री भी बने थे। उस वक्त इस पार्टी को 20 सीटें हासिल हुई थीं। बाद में रवि लिमिछाने के अमेरिकी नागरिकता लिए होने की बात पता चलने पर उन्हें पद छोड़ना पड़ा। बाद में इन्हें कुछेक अन्य आरोपों का भी शिकार होना पड़ा।
इस चुनाव से पहले जेन जी आंदोलन के एक प्रमुख चेहरा रहे हामी नेपाल के सुदान गुरंग व काठमांडू के मेयर बालेन्द्र शाह लिछिमाने की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी में शामिल हो गये। इनके इस पार्टी में शामिल होने के चलते यह पार्टी भी चुनावी लड़ाई में मजबूत टक्कर में आ गयी। पर उसके इस स्तर की भारी जीत की उम्मीद किसी को नहीं थी।
नेपाल में 2006 में 7 दलों के गठबंधन के द्वारा राजशाही के विरुद्ध जनवादी क्रांति सम्पन्न हुई थी। प्रचण्ड के नेतृत्व वाली नेकपा (माओवादी) द्वारा 10 वर्षों तक चलाये गये जनयुद्ध की पृष्ठभूमि में यह क्रांति सम्पन्न हुई थी और नेकपा (माओवादी) ही इस क्रांति की प्रमुख नेतृत्वकारी ताकत थी। इस क्रांति से जहां नेपाली राजनीति से राजा को तो रुखसत कर दिया गया। पर अधिकतर पुरानी पार्टियां व राजा समर्थक पार्टियां नेपाली पूंजीवादी लोकतंत्र की प्रमुख भागीदार बनी रहीं। नेकपा (माओवादी) के एक क्रांतिकारी पार्टी से संशोधनवादी पार्टी में तब्दील होने से नेपाली पूंजीवादी राजनीति शीघ्र ही उन बीमारियों का शिकार हो गयी जिनकी दुनिया के ज्यादातर देशों की राजनीति शिकार है। पार्टियों के बीच सत्ता के लिए अवसरवादी गठबंधन, नेताओं का व्यक्तिगत भ्रष्टाचार, पूंजीपतियों-साम्राज्यवादियों की चाकरी व मजदूरों-मेहनतकशों-युवाओं की आकांक्षाओं की अनदेखी आदि नेपाली राजनीति में बढ़ते गये। ऊपर से राजनीतिक उठापटक व प्रधानमंत्रियों के बारम्बार बदलने-सरकारों के बदलने ने जनता खासकर युवाओं में इस भ्रष्ट पूंजीवादी राजनीति ने असंतोष पैदा किया।
नेपाल में युवाओं के बीच मौजूद भारी बेकारी, देश से पलायन आदि की स्थिति में नेताओं के भ्रष्टाचार, उनकी औलादों के अय्याशी भरे जीवन ने सितम्बर 2025 में युवाओं के आक्रोश को सड़कों पर उतार दिया। इस विस्फोट का तात्कालिक कारण सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर पाबंदी बना। तीनों प्रमुख राजनैतिक दलों (नेपाली कांग्रेस, नेकपा (माओवादी) व एमाले) के नेता युवाओं के आक्रोश के शिकार बने और इनके घरों-मुख्यालयों के साथ संसद-न्यायालय आदि पर हमले बोले गये। अंततः प्रधानमंत्री ओली के इस्तीफे व पूर्व मुख्य न्यायधीश सुशीला कार्की के अंतरिम प्रधानमंत्री बनने से विद्रोह षांत हुआ। इस विद्रोह में कुल 76 लोग मारे गये।
इस युवा विद्रोह के बाद मार्च 26 में चुनाव सम्पन्न हुए। इस चुनाव में स्थापित तीनों पार्टियों को पीछे छोड़ते हुए राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने भारी जीत दर्ज की। इस पार्टी ने जेन जी को आकर्षित करते हुए भ्रष्टाचार, रोजगार, स्वास्थ्य सेवा आदि के मामलों में जनपक्षधर कामों का वायदा किया। इसने अमेरिका सरीखी प्रत्यक्ष मतदान से राष्ट्रीय व प्रांतीय प्रमुख चुनने की प्रणाली लाने का वायदा किया है। रैपर से काठमांडू मेयर बने बालेन्द्र शाह को इसने प्रधानमंत्री के चेहरे के बतौर पेश किया।
इस पार्टी का उत्थान भारत की केजरीवाल एण्ड कम्पनी की आम आदमी पार्टी के उत्थान से मिलता-जुलता है। इसके लोकरंजक वायदे व जेन जी आंदोलन में भागीदारी ने इसे नेपाली सत्ता के शीर्ष पर पहुंचा दिया है। पर इसकी आगे की राह आसान नहीं होने वाली। कल्याणकारी राज के खात्मे के दौर में लोकरंजक वायदे पूरे करना खासकर नेपाल में युवाओं के लिए रोजगार पैद करना आसान नहीं होने वाला। ऐसे में इसी की अधिक संभावना है कि शीघ्र ही यह पार्टी जनता में अलोकप्रिय हो जाये। लामिछाने-गुरांग व बालेन्द्र शाह की परस्पर टकराहट भी पार्टी को डुबोने की ओर ले जा सकती है।
जहां तक भारत या चीन से सम्बन्धों का सवाल है तो पार्टी ने अभी तक दोनों से समान दूरी बनाकर चलने के संकेत दिये हैं। पर चीनी साम्राज्यवादियों व भारतीय विस्तारवाद की तिकड़मों से निपटना आसान नहीं होगा। लामिछाने के अमेरिकी सम्बन्धों व गुरांग के एनजीओ अतीत को देखते हुए इस सरकार के अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रभाव में चलने की भी बातें की जा रही हैं।
इस नयी नेपाली सरकार के प्रति मोहभंग ही नयी पीढ़ी के युवाओं को इस हकीकत से रूबरू करायेगा कि पूंजीवाद के किसी सेलिब्रिटी-रैपर से उनकी समस्या हल नहीं होने वाली। उनकी समस्याओं के हल के लिए पूंजीवाद का अंत व समाजवाद की स्थापना जरूरी है। समाजवादी क्रांति ही उन्हें बेहतर भविष्य दे सकती है।