नीतिश कुमार और राज्यसभा

Published
Mon, 03/16/2026 - 07:05
/nitish-kumar-and-raajysabhaa

बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने जैसे ही राज्यसभा चुनाव के लिए पर्चा दाखिल किया वैसे ही बिहार की राजनीति एक बार फिर चर्चा में आ गयी। कयास लगाये जाने लगे कि भाजपा ने बाकी राज्यों की तरह बिहार में भी अपने सहयोगी को पटखनी दे दी। मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन ली। 
    
भाजपा का बीते दो दशक का यह इतिहास रहा है कि उसने अपने विरोधियों से अधिक अपने सहयोगी दलों की जड़ खोदने का काम अधिक किया है। सहयोगियों के माध्यम से संघ-भाजपा ने उन प्रदेशों में घुसपैठ बनायी जहां उनका कोई नामलेवा तक नहीं था और बाद में तीन तिकड़म से उसने सहयोगियों को किनारे लगा राज्य के मुखिया की कुर्सी हथिया ली। मोदी-शाह के जमाने में तो इसमें इतनी तेजी आ गयी कि हर सहयोगी दल को यह हकीकत समझ में आने लगी। 
    
सहयोगियों को किनारे लगाने के लिए अपनी हिन्दुत्व की साम्प्रदायिक राजनीति का प्रचार-प्रसार जहां एक जरिया बना वहीं सीबीआई, आईबी के जरिये धमकाना दूसरा जरिया बना। महाराष्ट्र की तरह तोड़-फोड़ तीसरा जरिया बना। यानी किसी भी तरीके से साम-दाम-दण्ड-भेद से सत्ता हथियाना अमित शाह का प्रिय शगल बन गया। 
    
भाजपा के इस करतब से नीतिश कुमार दो दशक तक खुद को बचाने में कामयाब रहे। दल बदलने की उनकी महारत बारम्बार भाजपा के मंसूबों पर पानी फेरती रही। पर नीतिश बाबू भी अंततः आत्मसमर्पण को मजबूर हो गये। भाजपा उन्हें राज्यसभा भेज गद्दी हथियाने की बिसात बिछाने में सफल हो गयी। 
    
अभी यह स्पष्ट नहीं है कि यह कारनामा चंद माह पूर्व मुख्यमंत्री पद पर फिर से काबिज हुए नीतिश कुमार के साथ भाजपा ने कैसे किया। क्या केन्द्र के बड़े पद का प्रलोभन देकर यह सफलता पायी गयी या ईडी-सीबीआई की धमकी से यह अंजाम दिया गया। आने वाले वक्त में इसका पता चलेगा। 
    
वैसे नीतिश कुमार कम मंझे खिलाड़़ी नहीं हैं वे कब पलटी मार जायें ये कोई नहीं जानता। पर अमित शाह से मुकाबले में वे कब तक टिकते हैं और कब तक अपनी पार्टी को, उसके आधार को बचाये रखते हैं, ये देखने की बात है। खैर! कुछ भी हो एक-दूसरे को लंगड़ी मारते, एक-दूसरे को गिराने के लिए शतरंज की बिसात बिछाते ये नेता जनता का कुछ मनोरंजन तो कर ही रहे हैं। अन्यथा तो ये कुर्सी पर बैठकर या उससे उतर कर जनता का गला ही रेतने का काम करते रहे हैं। 

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।