छात्रों में अच्छे संस्कार

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विगत 20 अगस्त को काशीपुर, उत्तराखण्ड में कक्षा नौ के छात्र ने स्कूल में अपने शिक्षक को गोली मार दी। छात्र आए दिन शिक्षक की डांट-फटकार से आहत था। शिक्षक की शिकायत पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया। शिक्षक, स्कूल, पुलिस, फारेंसिक, मनोचिकित्सक आदि छात्र में धैर्य, अनुशासन आदि ‘‘संस्कारों’’ की कमी बता रहे हैं। छात्रों को समझाने और सबक सिखाने की तरकीबें बताई जा रही हैं। ऐसे में भविष्य में समाज का क्या होगा। 
    
मध्य प्रदेश में 12वीं के छात्र ने प्रेम प्रस्ताव ठुकराने पर शिक्षिका पर पैट्रोल डालकर आग लगा दी। आपसी झगड़े में छात्र चाकूबाजी में घायल हो गये। यानी व्यक्तिगत अपराध के हर रूप की छाया छात्रों पर है। ये व्यक्तिगत अपराध संस्थागत अपराध का हिस्सा भी बन सकते हैं। चोरी, नशाखोरी, वेश्यावृत्ति, गुंडागर्दी (बाउंसर) आदि इस व्यवस्था से नाभिनालबद्ध अपराध हैं। 
    
ऐसे में ‘समाज का तो कुछ नहीं हो सकता बस हम बच्चों को बचा लें’ यह सोचना मासूमियत या धूर्तता है। यह बीमारी की जड़ को खत्म किये बिना बीमारी से छुटकारा पाने की कामना है। यानी सब यह मानते हैं कि छात्रों-नौजवानों में गुस्सा, हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ी है, पर यह कब नहीं थी। समाज में कुछ अपराध घटित होता है तो हम सबको आक्रोशित करना चाहते हैं। 
    
आक्रोश व्यक्तिगत इच्छा या कुण्ठा से प्रेरित है या सामाजिक हितों से फर्क इसी बात का है। व्यक्तिगत हितों के लिए आक्रोश-हिंसा से कुछ हासिल नहीं होता है जबकि सामाजिक हितों के लिए हर तरह से जूझने-लड़ने की जरूरत है। अक्सर कहा जाता है ‘लोगों को भगत सिंह (क्रांतिकारी) चाहिए पड़ोसी के घर में’। भगत सिंह सामाजिक हितों-क्रांति के लिए शहीद हो जाने का प्रतीक हैं। जाहिर है कि पड़ोसी के लिए ऐसी कामना का अर्थ है कि हम अपने घर में व्यक्तिगत हितों के लिए जीने और लड़ने वाले लम्पट की कामना कर रहे हैं। अनजाने ही पड़ोसी के भले और अपने बुरे की कामना कर रहे हैं। 
    
क्रांति की स्मृतियों से प्रेरणा लेने की आज जरूरत है। सामाजिक उन्नति के लिए हर चीज पर कब्जा कर मालिक बन जाने वाले पूंजीपतियों, उनकी सरकार-अफसरशाही-न्यायाधीशों की व्यवस्था से आक्रोशित होने की जरूरत है। यही व्यवस्था चंद को धनकुबेर तो करोड़ों को कंगाल बना चलती है। ऐसी व्यवस्था से आक्रोशित और उसे बदलने में लगा छात्र हिंसा में नहीं लगेगा और जब लगेगा तो वह इतिहास में नाम कमाने वालों में शुमार होगा।  

आलेख

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?