विविध

‘‘एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य’’

यह एक जानी-पहचानी बात है कि शासक वर्ग जब जिस वक्त जो नारे उछालता है हकीकत में वह स्वयं या तो उस पर यकीन नहीं रखता है या फिर वह अपने नारे के जरिये हकीकत पर पर्दा डालने का

जिन्दगी और मौत

जिन्दगी और मौत के बीच फासला बहुत कम रह जाता है। यह तब महसूस हुआ जब किसी को केवल मुसलमान होने पर मारा जा सकता है। 31 जुलाई को नूंह में हुई साम्प्रदायिक हिंसा को आधार बनाकर

अविश्वास प्रस्ताव : बहुमत को नहीं दोष गोसाईं

पूंजीवादी राजनीति में जब थोक के भाव विधायक-सांसद खरीदे जाने लगे, तो मुद्दा-आधारित अविश्वास प्रस्ताव के दौरान किसी विचारोत्तेजक बहस की अपेक्षा नहीं की जा सकती। आठ अगस्त से

सैनिक तख्तापलट के बाद नाइजर - साम्राज्यवादियों के बीच टकराव का एक क्षेत्र

26 जुलाई के सैनिक तख्तापटल के बाद नाइजर में कई तरह ही ताकतें सक्रिय हो गयी हैं। एक तरफ, अमरीकी साम्राज्यवादी, फ्रांस और यूरोपीय संघ है। ये साम्राज्यवादी ताकतें इकोवास (पश

बर्बरता की ओर

जब चेतन सिंह चौधरी ने चलती रेल के अलग-अलग डिब्बों में अपने अधिकारी टीकाराम मीना और तीन मुसलमान यात्रियों की चुन-चुन कर हत्या की तो हिन्दू फासीवादी सरकार और उसके समर्थकों

नूंह दंगे : एक रिपोर्ट

6 अगस्त 2023 को इंकलाबी मजदूर केंद्र से योगेश और राजू, राष्ट्रीय मतदाता परिषद से सतीश मराठा जी और स्वराज इंडिया से तनवीर अहमद जी की एक सामूहिक टीम फैक्ट फाइंडिंग के लिए न

शहतूत के गिरने के बाद

शहतूत के गिरने के बाद
जमीन लाल रंग के निशानों से भर जाती है
और नुकीले टुकड़ों पर
रक्त और लिपटा मांस
गिरने की पीड़ादायी यंत्रणा को 
बयां करता है

शहतूत

फैक्टरी में सीमेंट की चादरें बदलनी हैं, काम पर ठेकेदार ने जल्दी बुलाया है। अर्जुन को ठेकेदार के अंडर में काम करते हुए एक लम्बा अरसा हो गया था। अलग-अलग फैक्टरियों में काम

प्रोटेरियल (हिताची) के मजदूरों का जुझारू संघर्ष के बाद समझौता संपन्न

प्रोटेरिअल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (हिताची), प्लाट नं 94-95, सेक्टर-8, आईएमटी मानेसर के ठेका मज़दूरों का 23 दिन की जुझारू हड़ताल के बाद समझौता सम्पन्न हुआ। 22 जुलाई 2023 को

सीमा-अंजू और पुरुष प्रधान मीडिया

आज देश की सारी समस्यायें गरीबी, बेकारी, महंगाई खत्म हो गयी हैं। खेतों में दिन-रात मेहनत करते-घाटे की खेती करते गरीब किसान की बदहाली गायब हो गयी है। अब देश की इकलौती सर्वप

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?