अमेरिकी शह पर इस्राइल का सीरिया पर हवाई हमला

    5 मई को इस्राइली लड़ाकू विमानों ने सीरिया पर बम बरसा कर एक बार फिर भारी तबाही पैदा करने का काम किया है। इस्राइली हवाई हमले का निशाना सीरिया का सैन्य रिसर्च सेण्टर व दमिश्क हवाई अड्डा बना। इस्राइल के इस हमले का जहां अमेरिका-ब्रिटेन ने समर्थन किया है वहीं ईरान-लेबनान-रूस ने इस पर चिन्ता जतायी है।<br />
    लीबिया में गद्दाफी को मार गिराने के बाद से ही सीरिया की असद सरकार को ठिकाने लगाने के लिए पश्चिमी साम्राज्यवादी प्रयासरत हैं। सीरिया में रूस के सैन्य अड्डे व उसके सीरिया को ज्यादा खुले समर्थन के चलते पश्चिमी साम्राज्यवादियों की यहां सीधे हवाई हमले की हिम्मत नहीं हुई इसलिए उन्होंने दूसरा रास्ता अपनाया। उन्होंने अरब विद्रोह की सीरिया में असद सत्ता के खिलाफ उठी लहरों का फायदा उठा अलकायदा के लड़ाकों के सहयोग से फ्री सीरियन आर्मी का गठन कर डाला और उसे हथियार आदि की मदद के जरिये असद सरकार को हटाने के लिए आगे किया। पिछले 3 वर्षों से जारी संघर्ष में 70 हजार लोगों के मरने के बावजूद फ्री सीरियन आर्मी को कोई बड़ी सफलता नहीं मिली।<br />
    इसके बाद अमेरिकी साम्राज्यवादी दूसरे विकल्पों की तलाश में जुट गये। इराक हमले की तरह के झूठ यानि सीरिया द्वारा रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल का उन्होंने प्रचार करना शुरू कर दिया। इस प्रचार के जरिये पश्चिमी साम्राज्यवादी सीरिया में सीधे हस्तक्षेप का कोई बहाना ढूंढना चाहते थे। परन्तु उनके इस झूठ पर किसी को यहां तक कि अमेरिकी जनता तक ने विश्वास नहीं किया। इस झूठ के लिए इस बात की भी आशंका जतायी जा रही है कि अमेरिका खुद विद्रोहियों को रासायनिक हथियार उपलब्ध करा इस्तेमाल करवा रहा है। प्रारम्भिक जांच रिपोर्टों ने सीरिया की ओर से किसी तरह के रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल का खण्डन किया है। परन्तु अमेरिका और उसके साम्राज्यवादी मीडिया ने इस झूठ को सच बनाने का प्रयास नहीं छोड़ा है और यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ के जांच दल ने भी रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल का आरोप विपक्षी सेना के लड़ाकुओं पर लगाया है। इस बीच लेबनान के हिजबुल्लाह ने अमेरिका-इस्राइल को हस्तक्षेप का नया बहाना जरूर मुहैय्या करा दिया है। हिजबुल्लाह ने सीरिया में साम्राज्यवादी हस्तक्षेप की स्थिति में सीरिया में मौजूद अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए असद सरकार के पक्ष में अपने लड़ाके उतारने की घोषणा कर डाली। हालांकि अभी उसने इसकी धमकी ही दी थी और कहा था कि हिजबुल्लाह के सदस्य व्यक्तिगत तौर पर ही सीरिया में सक्रिय हैं।<br />
    हिजबुल्लाह की इस पहलकदमी को साम्राज्यवादी बाह्य हस्तक्षेप के तौर पर प्रचारित कर अपने हस्तक्षेप की सम्भावना तलाशने में जुट गये। इस्राइल को आगे कर अमेरिका ने जनवरी में लेबनान सीमा से सटे सैन्य रिसर्च सेण्टर पर हिजबुल्लाह पर हमले के बहाने हमला किया था। अब दुबारा इसी बहाने से इस्राइल हमलावर है। इस बार तर्क ईरान द्वारा हिजबुल्लाह को मिसाइलें दिये जाने का बनाया गया है। हमले में खबरों के मुताबिक करीब 300 सीरियाई सैनिक मारे गये हैं और ढे़रों अन्य इमारतें तबाह हो गयी हैं। हमले के वक्त सीरिया में मौजूद विद्रोहियों ने आगे बढ़ने का प्रयास किया पर उन्हें कोई विशेष सफलता नहीं मिली।<br />
    3 वर्षों से युद्धतरत सीरियाई विद्रोही जिन्हें पश्चिमी साम्राज्यवादियों की हर मदद हासिल है, इतनी लम्बी लड़ाई के बावजूद असफल रहने के चलते खुद भारी मतभेदों का शिकार हो चुके हैं। खुद इस्राइल के जियनवादी शासकों के प्रति उनके रुख में भारी अन्तर है। इस्राइल का हालिया हमला खुद उनके भीतर के झगड़े को बढ़ा रहा है। अलकायदा के लड़ाकों की भागीदारी से बनी यह विद्रोही सेना इस्राइल का खुल कर समर्थन नहीं कर सकती है।<br />
    इस्राइल के हालिया हमले से पूर्व ही इसका माहौल बनाया जाना शुरू हो गया था। हमले से पूर्व ही अमेरिकी सरगना ओबामा ने इस्राइल की पीठ थपथपाते हुए कहा था कि अपनी सुरक्षा के लिए इस्राइल को किसी भी कार्यवाही का अधिकार है। हमले का समर्थन करते हुए अमेरिकी रक्षा मंत्री ने कहा कि अमेरिका सीरिया में सीधे हस्तक्षेप के विकल्प पर विचार कर रहा है। ब्रिटेन ने भी इस्राइल की कार्यवाही का समर्थन कर उसे आत्मरक्षा की कार्यवाही करार दिया है।<br />
    संयुक्त राष्ट्र के अध्यक्ष बान की मून जो लम्बे समय से साम्राज्यवादियों के पक्ष से असद सरकार को हटाने का वैकल्पिक रास्ता तलाश रहे हैं उन्होंने भी इस हमले पर चुप्पी साधकर प्रकारान्तर से इसका समर्थन किया है।<br />
    वहीं सीरिया ने इस हमले का वक्त पर जवाब देने की बात दोहरायी है तो लेबनान, ईरान ने अरब के बाकी देशों का इस्राइल के खिलाफ खड़े होने का आह्वान किया है। रूस ने भी हमले का विरोध किया है।<br />
    कुल मिलाकर, सीरिया आज पश्चिमी साम्राज्यवादियों के लिए अपना वैश्विक वर्चस्व साबित करने के लिए नाक का सवाल बन चुका है। रूस-चीन का सीरिया के पक्ष में आ डटने की सम्भावना के बाद वे असद को हटाने के हर हथकण्डे अपना रहे हैं।<br />
    सीरिया की जनता तीन सालों से साम्राज्यवादियों द्वारा थोपी गयी इस लड़ाई में तानाशाह असद व पश्चिमी साम्राज्यवादियों के बीच पिस रही है। अनगिनत मौतों से वह इस जख्म को झेल रही है।

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