जमुई बिहार में नाबालिग बच्ची के साथ हुई छेड़छाड़ और यौन हिंसा की खबर ने महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा के सवाल को एक बार फिर उठा दिया। ऐसा नहीं है कि ऐसी घटनाएं नहीं होती रही हैं, पर उनके बारे में पता नहीं चलता। एक तथ्य के अनुसार देश में यौन अपराध के 58 से 70 प्रतिशत मामले दर्ज नहीं होते हैं।
जमुई की घटना पर भी लोगों का गुस्सा तब भड़का जब सोशल मीडिया में इस संबंध में वीडियो आई, अन्यथा घटना आई-गई हो जाती। महिलाओं पर बढ़ती हिंसा, यौन हिंसा, बलात्कार, यहां तक कि गैंगरेप की घटनाओं को ‘आम सा’ बना दिया गया है।
जमुई की घटना के बारे में शोर मचा ही था कि कुछ दिनों बाद बिहार के ही समस्तीपुर में ऐसी एक और घटना हो गई। इसी दौरान दिल्ली में भी एक लड़की के साथ गैंगरेप की घटना सामने आ गई। इन घटनाओं के विरोध में दिल्ली व देश के अन्य क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन की खबरें आने लगी हैं।
इन विरोध प्रदर्शनों ने एक बार फिर निर्भया सामूहिक बलात्कार कांड (2012) की भयावह घटना को याद दिला दिया। जब दिल्ली की एक छात्रा के साथ बस में सामूहिक बलात्कार किया गया और क्रूर घिनौनी हरकत कर शारीरिक यातनाएं दी गईं जिस कारण बाद में उसकी मौत हो गई।
4 अगस्त 2026 की रात को ही निर्भया सामूहिक बलात्कार जैसी घटना सामने आई थी। जब उत्तर प्रदेश के मैनपुरी की रहने वाली 16 वर्षीय एक नाबालिग छात्रा के साथ ग्रेटर नोएडा के परी चैक से दिल्ली के कश्मीरी गेट के बीच लगभग 50 किलोमीटर तक चलती स्लीपर बस में गैंगरेप की घटना सामने आयी थी। कश्मीरी गेट पहुंच अपराधियों ने बच्ची को बस से बाहर फेंक दिया।
इन लगातार होती दुर्घटनाओं और उनके प्रचारित होने के कारण महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा और स्वतंत्रता का मुद्दा एक बार फिर जेरे बहस है। एक बार फिर बलात्कारी और अपराधियों को फांसी या ऐसी सजा देने की बात हो रही है। कहा जा रहा है कि कठोर सजा अपराधियों के अंदर डर पैदा करेगी और दूसरों के लिए नजीर बनेगी।
दिसंबर 2012 में निर्भया के साथ हुए क्रूर सामूहिक बलात्कार और हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। हजारों छात्र-नौजवान सड़कों पर उतर आए और तत्कालीन यूपीए सरकार पर त्वरित कार्रवाई करने का दबाव बनाया।
सरकार ने न्यायमूर्ति जे.एस.वर्मा की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। वर्मा समिति की अधिकांश सिफारिशों के आधार पर 2013 में आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम पारित किया गया, जिसने बलात्कार की परिभाषा को व्यापक बनाया और सजा को और अधिक कठोर बना दिया।
2013 के अधिनियम ने अधिकांश यौन उत्पीड़न मामलों में कारावास की सजा बढ़ा दी और बलात्कार के उन मामलों में मृत्युदंड का भी प्रावधान किया, जिनके कारण पीड़िता की मृत्यु हो जाती है या वह कोमा जैसी स्थिति में चली जाती है। (हालांकि वर्मा समिति ने मृत्युदंड का विरोध किया था, यह मानते हुए कि इससे अपराधियों द्वारा सबूत मिटाने के लिए पीड़िताओं की हत्या का खतरा बढ़ सकता है)।
इसके अलावा, इसने कुछ नए अपराधों को भी परिभाषित किया, जैसे कि किसी महिला को निर्वस्त्र करने के इरादे से उस पर आपराधिक बल का प्रयोग करना, ताक-झांक करना और पीछा करना।
सामूहिक बलात्कार की सजा को पहले के 10 साल के आजीवन कारावास से बढ़ाकर 20 साल का आजीवन कारावास कर दिया गया था। इसके साथ ही जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन) एक्ट, 2015 के तहत यदि 16 से 18 वर्ष की आयु के बीच का कोई किशोर किसी जघन्य (गंभीर) अपराध में संलिप्त पाया जाता है, तो जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड यह आकलन करता है कि उस पर एक बच्चे की तरह या वयस्क (बालिग) की तरह मुकदमा चलाया जाये।
2013 में निर्भया मुकदमे में दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई और बाद में उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया।
वर्ष 2012 में निर्भया सामूहिक बलात्कार के विरोध में हुए बड़े जुझारू आंदोलन के दबाव में बने कठोर कानून और सख्त सजा यानी फांसी के 14 साल बाद देश में महिलाओं के साथ यौन हिंसा और बलात्कार की क्या स्थिति है?
आज महिलाओं के साथ यौन हिंसा और बलात्कार की घटनाएं पहले के मुकाबले और ज्यादा बढ़ गई हैं। या यह कहा जाए कि ज्यादा भयावाह हो चुकी है।
देश में महिलाओं के साथ बढ़ती यौन हिंसा और बलात्कार की घटनाओं को रोकने के लिए हमें इसके मूल कारणों पर हमला करना होगा। देश में महिलाओं पर यौन हिंसा और बलात्कार की बढ़ती घटनाओं की एक बड़ी वजह सामंती पितृ सत्तात्मक-पुरुष प्रधान मानसिकता है। जिसमें महिलाएं दोयम दर्जे की होती हैं जिन्हें पैर की जूती समझा जाता है। महिलाओं को कोई अधिकार और स्वतंत्रता नहीं होती। यहां महिलाओं को घर के पुरुष पिता, भाई, पति, बेटे के अधीन रहना पड़ता है।
इसके साथ ही पतित पूंजीवादी-साम्राज्यवादी अश्लील संस्कृति कोढ़ में खाज का काम करती है। यह संस्कृति महिलाओं को एक माल के रूप में प्रस्तुत करती है। अश्लील फिल्मों, गानों और विज्ञापनों में महिलाओं को उपभोग की वस्तु बना दिया गया है। इंटरनेट में अश्लील वेबसाइट की भरमार है। इन्होंने सामंती पुरुष प्रधान मानसिकता की कुंठाओं को और ज्यादा उद्वेलित किया है। क्षेत्रीय स्तर व भाषाओं में बढ़ते अश्लील गाने इन्हें और ज्यादा हवा देते हैं। आज नौजवानों-बुजुर्ग के साथ-साथ छोटे बच्चे भी अश्लील गानों में डांस करते नजर आते हैं।
जब से देश की सत्ता में हिंदू फासीवादी आए हैं इन्होंने महिलाओं की आजादी को और ज्यादा कैद किया है। फासीवादी यह तय कर रहे हैं कि महिलाएं कब, कहां और किस के साथ जाएंगी, किससे मिलेंगी, किसके साथ शादी करेंगी। महिलाओं की आजादी और अधिकार इन्हें बर्दाश्त नहीं। इनके द्वारा पैदा किए गए लम्पट मोरल पुलिसिंग के नाम पर शहर और गांव के हर चैक-चैराहों पर महिलाओं की आजादी और अधिकारों पर पहरा लगाए बैठे हैं।
जब देश की सत्ता के शीर्ष पर हत्यारे और बलात्कारी बैठे हों। बलात्कारियों को सत्ता का संरक्षण प्राप्त हो, तो नीचे के लंपट लोगों को पनाह मिल ही जाती है। इन लम्पटों का साहस इतना बढ़ गया है कि यह ऐसी हरकतें करते हैं और उसका वीडियो सोशल साइट में डालते हैं। यह बढ़ते हुए अपराधों और अपराधियों के बढ़ते साहस को दिखाता है।
यदि हमें महिलाओं के खिलाफ बढ़ती यौन हिंसा और बलात्कार की घटनाओं को रोकना है तो हमें सामंती-पितृसत्तात्मक और पुरुष प्रधान मान्यताओं और पतित अश्लील पूंजीवादी-साम्राज्यवादी संस्कृति को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा।
यह स्थिति पाने तक महिला यौन हिंसा के अपराधियों और बलात्कारियों को जल्द से जल्द सजा दिलाने के लिए संघर्ष करने होंगे। -हरीश, गुड़गांव