22 जून 2026 को पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी बलूचिस्तान प्रांत की एक आतंकवाद विरोधी अदालत ने बलूच कार्यकर्ता डा. महरंग बलूच और सिबघतुल्लाह शाह को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। बलूच यखजेटी कमेटी (बलूच एकता कमेटी, ठल्ब्) की नेता डा. महरंग बलूच को बलूच सरकार ने 22 मार्च, 2025 को गिरफ्तार किया था। उन्हें व अन्य नेताओं को औपनिवेशिक काल के कानून लोक व्यवस्था रख-रखाव अध्यादेश के तहत 90 दिन के लिए हिरासत में लिया गया था। हिरासत अवधि खत्म होने के बाद उन पर आतंकवाद विरोधी अधिनियम की धारायें जोड़ दी गयीं।
अब महरंग और सिबघतुल्लाह शाह को 2024 में ग्वादर में हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान एक अर्द्धसैनिक सिपाही की हत्या करने वाली भीड़ को उकसावे के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाई गयी है।
दरअसल बलूचिस्तान पाकिस्तान की एक उत्पीड़ित राष्ट्रीयता रही है पाक सरकार यहां के नागरिकों का निर्मम दमन करती रही है। बलूच छात्र-कार्यकर्ता-नागरिकों को राज्य द्वारा जब तब गायब कर दिया जाता रहा है। उनको कैद कर क्रूर उत्पीड़न किया जाता रहा है। बलूच प्रांत में अपने अधिकारों के इस हनन के खिलाफ संघर्ष लम्बे समय से जारी रहा है।
मूल संघर्ष की इसी पृष्ठभूमि में बलूच महिलाओं के नेतृत्व में बलूच एकता कमेटी संगठन पैदा हुआ जो मूलतः गुमशुदा लोगों के दस्तावेजीकरण, उनके लिए न्याय व जवाबदेही की मांग उठाने के साथ शुरू हुआ। लापता लोगों की सूची बना उनके बारे में राज्य की जवाबदेही की मांग इस संगठन का प्रमुख काम बन गया। जहां बलूच सरकार घोषित करती रही कि लापता लोग सशस्त्र संगठनों में शामिल हो गये हैं वहीं कमेटी राज्य द्वारा इन लोगों को गायब किये जाने का आरोप लगाती रही। 33 वर्षीया डा. महरंग इस कमेटी की मजबूत आवाज बनकर उभरीं और उन्होंने लापता बलूचों के मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाने में भूमिका निभायी।
सशस्त्र संघर्ष चला रहे बलूच संगठनों की तुलना में पाक शासकों के लिए बलूच एकता कमेटी के शांतिपूर्ण संघर्ष से निपटना कठिन होता गया। ऐसे में सरकार ने षड्यंत्रकारी ढंग से इस संघर्ष को कुचलने के लिए इसके प्रमुख नेताओं को पहले जेल में डाला और फिर आजीवन कारावास की सजा दिलवा दी। सरकार सोचती थी कि नेताओं को कैद कर वह बलूच लोगों की न्यायपूर्ण आवाज को कुचल देगी पर इस सजा का बलूचिस्तान में जिस तरह विरोध हो रहा है वह दिखाता है कि एक महरंग की जगह लेने सैकड़ों महरंग सामने आ जायेंगी।
बलूच संघर्ष के दमन के हालात बहुत कुछ भारत में कश्मीरी अवाम के संघर्ष के दमन सरीखे हैं। दोनों जगहों पर जुल्मी सरकारें बंदूक के दम पर जनता की आवाज को दबाना चाहती हैं। पर दोनों जगह महरंग सरीखी बहादुर महिलायें-युवा सरकार की आंखों में आंखें डाल लड़ने को खड़े हो जाते हैं और बताते हैं कि जुल्मो सितम से किसी न्यायपूर्ण आवाज को कुचला नहीं जा सकता।