केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों द्वारा आहूत आम हड़ताल 9 जुलाई को सफल हो गई। इस हड़ताल में केन्द्रीय फेडरेशनों ने करोड़ों मजदूरों की भागीदारी का दावा कर हड़ताल को सफल घोषित कर दिया। इस हड़ताल की कुछ बातें गौर करने लायक रहीं।
बीते कुछ वर्षों से आम हड़तालों में औद्योगिक मजदूरों की भागीदारी कमतर बनी हुई है। इस हड़ताल में भी यही स्थिति बनी रही। सरकारी क्षेत्र के बैंक-बीमा कर्मी सुधारवादी केन्द्रीय फेडरेशनों के तहत संगठित रहे हैं। ये हड़ताल में बढ़-चढ़कर भागीदारी करते रहे हैं। पर कुछेक वर्षों से इनकी भागीदारी भी घटती नजर आ रही है। या तो ये हड़ताल में भागीदारी के नाम पर संस्थान गेट पर कुछ नारेबाजी कर फिर से काम पर जुट जा रहे है या फिर हड़ताल में भागीदारी को छुट्टी मान घर बैठ जा रहे हैं। स्कीम वर्कर (आशा, आंगनबाड़ी, मिड डे मील वर्कर्स आदि) की बड़े पैमाने पर हड़ताल में भागीदारी के साथ कुछ जगहों पर विद्युत कर्मियों, सरकारी संविदाकर्मी, सफाईकर्मी आदि की हड़ताल में भागीदारी देखी गयी। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की भागीदारी भी बढ़ती दिखी।
ये बातें क्या बतलाती हैं। कोई ऊपरी तौर पर देख कर कह सकता है कि स्कीम वर्कर्स, सरकारी संविदा कर्मी या असंगठित क्षेत्र के मजदूर ही आज सबसे लड़ाकू मजदूर हैं क्योंकि इनकी स्थिति सबसे ज्यादा बुरी है। निश्चय ही ये बेहद कम तनख्वाह पर बुरी स्थितियों में जीवन जीने को मजबूर हैं पर बुरी जीवन परिस्थितियों से मजदूरों का अगुवा या लड़ाकू होना तय नहीं होता। आज भी औद्योगिक मजदूर ही मजदूर वर्ग का सबसे अधिक लड़ाकू और नेतृत्वकारी हिस्सा है। अपने ट्रेड यूनियन संघर्षों में वह जगह-जगह स्वतः स्फूर्त तरीके से लड़ भी रहा है। पूंजीपति वर्ग और सरकार को वही सर्वाधिक हैरान-परेशान कर सकता है। इसके बाद रेलवे सरीखे बड़े सरकारी संस्थानों के मजदूरों का स्थान आता है जो अपने तेवरों से समाज में उथल-पुथल पैदा कर सकते हैं।
फिर क्या कारण है कि उद्योग व बड़े सरकारी संस्थान के मजदूर हड़ताल में कम भागीदारी कर रहे हैं। इसकी पहली वजह केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों की सुधारवाद व समझौतापरस्ती है। ये फेडरेशनें इन क्षेत्रों के मजदूरों के ढेरों जगह नेतृत्व में होने के बावजूद इनका हड़ताल हेतु आह्वान ही नहीं करतीं। ये सरकार या पूंजीपति वर्ग को किसी बड़ी परेशानी में डालने से बचते हुए वर्ग सहयोगी रुख अपनाती हैं। दरअसल हड़ताल का इनका लक्ष्य मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी संघर्ष को आगे बढ़ाने के बजाय मजदूर वर्ग के गुस्से को सालाना रस्मी आयोजनों के जरिये व्यवस्था की चौहद्दी में समेटना होता है। इसीलिए मजदूर वर्ग में क्रांति की बातें, मजदूर वर्ग की क्रांति में नेतृत्वकारी भूमिका, मजदूर वर्ग के ऐतिहासिक मिशन की बातें कम्युनिस्ट नामधारी ये सुधारवादी काफी पहले ही छोड़ चुके हैं। इस क्षेत्र के मजदूरों के हड़ताल में आने से ये सुधारवादी भयभीत होते हैं कि कहीं मजदूर उनके नेतृत्व को दरकिनार कर वास्तविक संघर्ष की ओर न बढ़ जायें। इनके इस क्षेत्र के मजदूरों के प्रति इस रुख का यह भी असर हुआ है कि भले ही मजदूर इनकी यूनियनों में लामबंद हों पर वे इन पर भरोसा करना बंद कर चुके हैं। इसीलिए अब स्थिति वहां पहुंच गयी है कि ये चाह कर भी इन मजदूरों को ऐसे आयोजनों में भागीदारी नहीं करा सकते। मजदूर लड़ना चाहते हैं पर पतित नेतृत्व उन्हें बार-बार दगा देकर अपनी साख गिराता जा रहा है। स्पष्ट ही है कि औद्योगिक मजदूर वर्ग के नेतृत्व व भागीदारी के बगैर मजदूर आंदोलन को उभार की दिशा में नहीं ले जाया जा सकता। जरूरी है कि इस क्षेत्र के मजदूरों को क्रांतिकारी राजनीति पर लामबंद किया जाये और सुधारवादी नेतृत्व को प्रतिस्थापित कर क्रांतिकारी नेतृत्व कायम किया जाये।
जहां तक बैंक-बीमा कर्मियों की घटती भागीदारी का प्रश्न है तो अपने इस पुराने आधार को सुधारवादी केन्द्रीय फेडरेशनें अर्थवाद के दलदल में धकेले हुए हैं। किसी हद तक इस क्षेत्र के कर्मियों की बेहतर स्थिति-अभिजातता इन्हें संघर्ष से दूर कर रही है। ये न केवल आम हड़ताल बल्कि अपने आर्थिक संघर्षों में भी छुट्टी की मानसिकता में दिखाई देते हैं। ऐसे में इनको क्रांतिकारी राजनीति पर खड़ा कर ही स्थिति को सुधारा जा सकता है।
स्कीम वर्कर्स, संविदा कर्मी आदि बेहद असुरक्षित व बेहद कम सुविधाओं के साथ काम करने वाले मजदूर हैं। ये 90 के दशक के बाद के उदारीकरण के दौर में पैदा हुए मजदूर हैं। किसी हद तक गिग वर्कर्स भी इसी श्रेणी में आते हैं। ये जगह-जगह स्वतः स्फूर्त व असंगठित तरीके से लड़ रहे हैं। ऐसे में केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों ने जगह-जगह इन्हें लामबंद किया है व सुधारों हेतु इनके कुछ संघर्ष भी लड़े हैं। ये ही आजकल इनकी कार्यवाहियों के मुख्य संख्या बल बन रहे हैं। इनकी सुधारवादी राजनीति बहुत जल्द इन्हें इस क्षेत्र के मजदूरों के बीच भी बेपर्दा कर देगी। ये अक्सर ही इनकी मांगों के लिए लड़ते हुए उदारीकरण वैश्वीकरण की नीतियों को निशाने पर नहीं लेते। जबकि इन नीतियों को पलटे बिना इस क्षेत्र के मजदूरों के जीवन में कोई बुनियादी बदलाव नहीं हो सकता। जरूरत है कि इस क्षेत्र के मजदूरों को भी क्रांतिकारी राजनीति पर लामबंद किया जाये और इन्हें जनविरोधी नीतियों के साथ व्यवस्था विरोधी संघर्ष के लिए तैयार किया जाये।
औद्योगिक मजदूरों में काम कठिन पाकर कुछ सुधारवादी-एनजीओ मार्का संगठन ही नहीं क्रांतिकारी संगठन भी असंगठित मजदूरों को एकजुट करने में लग गये हैं। असंगठित मजदूरों को निश्चय ही संगठित किया जाना चाहिए। पर एनजीओ-पूंजीवादी विशेषज्ञों के इन तर्कों का शिकार नहीं होना चाहिए कि चूंकि इस क्षेत्र के मजदूरों की हालत-उत्पीड़न कहीं ज्यादा है, इसीलिए ये ही लड़ाकू या अगुवा मजदूर हैं। यही चीज खेतिहर व ग्रामीण मजदूरों पर भी लागू होती है। पूंजीपति वर्ग व उसके टुकड़खोर बुद्धिजीवी इनके असंगठित होने, बेहद कम वेतन व उत्पीड़न की दशा में काम करने का विवरण दे इनके संगठित होने पर जोर देते हैं। ऐसा करके वे औद्योगिक मजदूरों के संघर्ष को कमतर व उन पर पूंजी द्वारा किये जा रहे हमले के खिलाफ संघर्ष को कमतर साबित करते रहते हैं। यही चीज 4 श्रम संहिताओं के संदर्भ में भी वे बताते हैं कि क्या हुआ अगर बेहतर स्थिति वाले औद्योगिक मजदूरों के कुछ हक छीन भी लिये तो व्यापक असंगठित मजदूरों के लिए नयी संहिताओं ने सामाजिक सुरक्षा, न्यूनतम वेतन का इंतजाम कर दिया है।
दरअसल श्रम संहितायें इस पाखण्ड के हल्ले के साथ बनायी गयी हैं कि इससे असंगठित मजदूरों का कल्याण होगा। जबकि वास्तविकता यही है कि कानून में चाहे कुछ भी लिखा हो व्यवहार में यही होता है कि अगर औद्योगिक संगठित मजदूरों के अधिकार छीने जायेंगे, उन पर हमला तेज होगा, उनका जीवन स्तर गिरेगा तो इसका सीधा असर असंगठित मजदूरों पर भी पड़ेगा और उनका उत्पीड़न और तेज होगा, व जीवन स्तर और गिरेगा। इसीलिए असंगठित मजदूरों को इस समझ पर खड़ा करते हुए श्रम संहिताओं के विरोध में संघर्ष व औद्योगिक मजदूरों के संघर्ष में साथ खड़ा करना जरूरी है।
कुल मिलाकर इस आम हड़ताल ने एक बार फिर देश के पैमाने पर मजदूर वर्ग के संघर्षों के जज्बे को दिखाया। ये मजदूर वर्ग का संघर्ष ही है जिसने शासकों के मनमाने हमलों को रोका नहीं तो विलम्बित जरूर किया है। साथ ही इस हड़ताल ने संघर्ष से किनाराकशी करती केन्द्रीय फेडरेशनों के चरित्र को भी उजागर किया। वक्त की मांग है कि जल्द से जल्द क्रांतिकारी ट्रेड यूनियनें व उनकी फेडरेशनें खड़ी की जायें और रस्मी आयोजन के बजाय वास्तविक क्रांतिकारी संघर्ष में मजदूरों को उतारा जाये। जिन मांगों के लिए 9 जुलाई की आम हड़ताल बुलायी गयी थी, सुधार की ये मांगें भी क्रांतिकारी संघर्ष के दम पर ही हासिल की जा सकती हैं। मजदूरों के जीवन में वास्तविक बुनियादी बदलाव पूंजीवादी व्यवस्था के अंत व मजदूर राज समाजवाद कायम करने के जरिये ही संभव है।