क्रांतिकारी संगठनों को कुचलने का विधेयक

/revolutionary-sangathanon-ko-kuchalane-kaa-vidheyak

विशेष जन सुरक्षा विधेयक (महाराष्ट्र)

महाराष्ट्र सरकार ने 9 जुलाई को विधानसभा में विशेष जन सुरक्षा विधेयक पारित करा दिया। सरकार ने ‘वामपंथी उग्रवादी संगठनों’ पर लगाम लगाने के उद्देश्य से यह कानून बनाने की बात कही। इस तरह के कानून छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश व उड़ीसा में पहले से लागू हैं। इस कानून के निशाने पर स्वभाविक तौर पर क्रांतिकारी-प्रगतिशील-जनवादी सभी संगठन आयेंगे।
    
एक ओर महाराष्ट्र सरकार दावा कर रही है कि महाराष्ट्र में माओवाद केवल दो तालुका में बचा है वहीं दूसरी ओर माओवाद से निपटने के नाम पर नया सख्त कानून बना रही है। स्पष्ट है कि सरकार के निशाने पर माओवादी संगठनों के साथ-साथ हर संघर्षशील संगठन व आम जन हैं। 
     
इस विधेयक के लागू हो जाने के बाद सरकार मनमाने तरीके से किसी भी संगठन को गैर कानूनी घोषित कर सकती है। ‘गैर कानूनी गतिविधि’ की विधेयक में बहुत व्यापक परिभाषा दी गयी है जिसमें कार्यवाही, लिखित, संकेतों से सार्वजनिक व्यवस्था, शांति-सौहार्द को खतरा पैदा करना, सार्वजनिक व्यवस्था के रख रखाव में हस्तक्षेप करना सरीखी बातें हैं। स्पष्ट है कि इन पैमानों पर हर तरह के संघर्ष व संगठन को गैर कानूनी घोषित किया जा सकता है। 
    
मुख्यमंत्री फड़नवीस ने ‘अर्बन नक्सल’ का जिक्र करते हुए 64 संगठनों के महाराष्ट्र में सक्रिय होने का दावा किया और इन पर प्रतिबंध लगाने की वकालत की। इस विधेयक के तहत प्रतिबंधित संगठन के सदस्य होने पर उसे 2 से 7 वर्ष तक सजा का प्रावधान है। सरकार उनकी धन-संपत्ति जब्त कर सकती है। 
    
दरअसल महाराष्ट्र में फासीवादी सरकार जनसंघर्षों को कुचलने पर उतारू है। वह साथ ही विपक्षी दलों को भी डरा-धमका कर रखना चाहती है। उसके निशाने पर क्रांतिकारी संगठनों के साथ प्रगतिशील जनवादी संगठन, किसान संगठन, ट्रेड यूनियनें, दलितों-अल्पसंख्यकों के संगठन सभी हैं। यानी सरकार का लक्ष्य अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज को खामोश करना है। 
    
फासीवादी अपने कुकर्मों के खिलाफ उठी हर आवाज को कानून-व्यवस्था की समस्या मानते हैं और कानून-कड़े कानून के दम पर उन्हें कुचल डालने के मंसूबे पालते हैं। फड़नवीस के रूप में महाराष्ट्र में पल रहा छोटा मोदी भी इसी गलतफहमी का शिकार है कि वह जनता को, उसके संघर्ष को खामोश कर देगा। जबकि हकीकत यही है कि देर सबेर जनता व उसके संघर्ष बड़े-छोटे मोदी व उनके संगठन को खत्म कर देंगें 

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?